डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विकसित भारत- रोजगार और आजीविका गारंटी योजना (वीबी-जी राम-जी) आज यानी एक जुलाई से पूरे देश में लागू हो गयी है. इसके साथ ही केंद्र सरकार ने ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार योजना की नई मजदूरी दरें जारी कर दी हैं. उत्तराखंड के मनरेगा में सक्रिय 7.58 लाख श्रमिकों में से 92 फीसदी श्रमिकों की ई- केवाईसी भी हो चुकी है.उत्तराखंड के गांवों में वीबी जी रामजी योजना को लेकर ग्राम प्रधान संगठन और सरकार के बीच खींचतान बढ़ती जा रही है. संगठन का कहना है कि योजना में ऑनलाइन हाजिरी की व्यवस्था पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है. कई गांवों में नेटवर्क नहीं होने और ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी दिक्कतों के कारण श्रमिकों की हाजिरी दर्ज करने में परेशानी आ रही है. इसका असर गांवों में चल रहे कामकाज और मजदूरी की प्रक्रिया पर पड़ रहा है. ग्राम प्रधानों का आरोप है कि व्यवस्था में आ रही दिक्कतों का खामियाजा उन्हें गांवों में भुगतना पड़ रहा है, जबकि तकनीकी व्यवस्था उनके नियंत्रण में नहीं है. इसी समस्या को लेकर संगठन ने सरकार से मांग की है कि जिन क्षेत्रों में ऑनलाइन हाजिरी संभव नहीं है, वहां ऑफलाइन व्यवस्था लागू की जाए, ताकि काम और मजदूरी दोनों प्रभावित न हों प्रदेश प्रभारी, ग्राम प्रधान संगठन-पोर्टल कई बार इतना धीमा चलता है कि समय पर हाजिरी दर्ज करना मुश्किल हो जाता है. कभी सुबह की हाजिरी लग जाती है, लेकिन शाम की नहीं लगती और कई बार दोनों समय की हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती. ऐसे में मजदूर दिनभर काम करने के बाद भी हाजिरी पूरी नहीं होने की समस्या से जूझते हैं. जब मजदूर को लगता है कि उसने मेहनत की है, लेकिन उसकी मजदूरी की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो पाई, तो वह अपनी नाराजगी लेकर ग्राम प्रधान के पास पहुंचता है. गांव में मजदूरों और प्रधानों के बीच सीधा संपर्क होने के कारण लोगों का गुस्सा भी प्रधानों को ही झेलना पड़ता है.
-ग्राम प्रधान संगठन ने ऑनलाइन हाजिरी के साथ मानदेय बढ़ाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है. प्रदेश महामंत्री ने कहा कि मौजूदा 3500 रुपये के मानदेय में प्रधानों को ब्लॉक और जिला मुख्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. अधिकारियों से मिलने, पंचायत के कामकाज और ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए आने-जाने में खर्च होता है. कई बार यह खर्च प्रधानों को अपनी जेब से उठाना पड़ता है. ऐसे में सवाल यह है कि इतने कम मानदेय में प्रधान अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे करें. संगठन मानदेय को बढ़ाकर 25 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग कर रहा है. प्रधानों का तर्क है कि गांवों में विकास कार्यों से लेकर लोगों की समस्याओं तक, हर मामले में उनसे जवाब मांगा जाता हैजॉब कार्ड को लेकर भी एक व्यावहारिक समस्या उठाई. उन्होंने कहा कि अगर ग्राम प्रधान के परिवार या पत्नी के नाम पर जॉब कार्ड है, तो अपनी ही पंचायत में मजदूरी करने को लेकर परेशानी सामने आती है. ऐसी स्थिति में प्रधान के सामने नियमों और रोजगार से जुड़ी दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं. संगठन चाहता है कि इस तरह के मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश हों, जिससे प्रधानों को अनावश्यक परेशानी न उठानी पड़े. ग्राम प्रधान संगठन की मांग है कि सरकार केवल ऑनलाइन हाजिरी की समस्या तक सीमित न रहे, बल्कि मानदेय, रोजगार और पंचायतों के कामकाज से जुड़ी सभी व्यावहारिक समस्याओं पर एक साथ निर्णय ले. ग्राम प्रधान संगठन की मांगों और सरकार के आश्वासन के बीच अब एक सप्ताह का समय अहम हो गया है. हाजिरी दर्ज करने की जिम्मेदारी मेट्स की होती है और ग्राम प्रधानों की इसमें सीधे तौर पर भूमिका नहीं है. मंत्री ने यह भी दावा किया कि मनरेगा में जहां कई-कई महीने तक भुगतान नहीं हो पाता था, वहीं नई योजना में 15 से 20 दिन के भीतर लाभार्थियों को भुगतान मिल रहा है. मंत्री ने वीबी जी राम जी योजना को मनरेगा से बेहतर बताते हुए कहा कि रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किया गया है. मजदूरी की दर 252 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये किए जाने से श्रमिकों को लाभ मिलेगा. अगर ऑनलाइन हाजिरी की समस्या के समाधान और अन्य मांगों पर ठोस पहल होती है, तो आंदोलन टल सकता है. लेकिन अगर संगठन को संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो आने वाले विधानसभा सत्र के घेराव की तैयारी है. इसके साथ ही 2027 के विधानसभा चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भी अहम बना दिया है. अब देखना होगा कि सरकार और ग्राम प्रधान संगठन के बीच बातचीत से कोई रास्ता निकलता है या यह विवाद आगे और बढ़ता है. संगठन का कहना है कि इन मांगों को लेकर लंबे समय से सरकार को ज्ञापन दिए जा रहे हैं, लेकिन अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने मांगों पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो ग्राम प्रधान आंदोलन को तेज करने के लिए मजबूर होंगे. ग्राम प्रधानों का कहना है कि पहाड़ी और दुर्गम गांवों में मोबाइल नेटवर्क की स्थिति बेहद खराब है। कार्यस्थलों पर नेटवर्क नहीं मिलने के कारण मजदूरों की हाजिरी के लिए फोटो समय पर अपलोड नहीं हो पाती। इसका सीधा असर मजदूरों की मजदूरी पर पड़ रहा है। प्रधानों के मुताबिक कई जगह काम पूरा होने के बावजूद मजदूर भुगतान के लिए इंतजार कर रहे हैं।वीबी-जी रामजी योजना में ऑनलाइन हाजिरी ग्रामीणों के लिए रोजगार की राह में रोड़ा बन गई है। फेस कैप्चरिंग और रेटिना मैचिंग में आ रही तकनीकी दिक्कतों के चलते श्रमिकों की डिजिटल हाजिरी दर्ज नहीं हो पा रही है। नतीजा यह कि योजना शुरू होने के तीन महीने बाद भी जिले में पांच फीसदी ही जॉब कार्डधारक योजना का लाभ ले पाए हैं।एक जुलाई से मनरेगा का नाम बदलकर वीबी-जी रामजी योजना कर दिया है। इसमें एक परिवार को 125 दिन के लिए काम दिया जाना है लेकिन योजना के शुरुआत से ऑनलाइन हाजिरी जी का जंजाल बन गई है। श्रमिकों के लिए नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) ऐप के जरिए ऑनलाइन हाजिरी लगाना अनिवार्य है लेकिन तकनीकी कारणों से इसमें दिक्कतें आ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार जिले के आठ विकासखंडों में 41022 जॉब कार्डाें में 65885 श्रमिक पंजीकृत हैं लेकिन अब तक मात्र 3146 श्रमिक ही रोजगार पा सके हैं। !लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














