डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड देवताओं की भूमि है. यही वजह है कि इस पावन भूमि को देवभूमि के नाम से जाना जाता है. यहां पर विराजमान आस्था के केंद्र इसे अलग ही पहचान दिलाते हैं. इन्हीं आस्था के केंद्रों में सिद्धपीठ मां कुंजापुरी का मंदिर भी है. जो टिहरी में स्थित है. इसे 52वें सिद्धपीठ के रूप में पूजा जाता है. जिसका वर्णन स्कंद पुराण के केदारखंड में भी मिलता है. मान्यता है कि जो श्रद्धालु माता के दरबार में आता है, वो कभी भी खाली हाथ नहीं लौटता है.देवभूमि उत्तराखंड में चारधाम, पंचबदरी, पंचकेदार, पंचप्रयाग विराजमान हैं. इसके अलावा कई सिद्धपीठ भी मौजूद हैं. इनमें एक सिद्धपीठ माता कुंजापुरी है. वैसे तो सालभर यहां देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्रि में इसकी विशेषता और बढ़ जाती है. इन दिनों भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं और अपनी मन्नतें मांग रहे हैं. देवभूमि उत्तराखंड में स्थित ऋषिकेश जिसे योगा कैपिटल के नाम से जाना जाता है, यह प्राचीन मंदिरों के लिए भी काफी प्रसिद्ध है. इन्हीं में से एक है कुंजापुरी माता मंदिर मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है बातचीत में मंदिर के महंत रामेश्वर गिरी जी बताते हैं कि यह मंदिर प्राचीन मंदिरों में से एक तो है ही, साथ ही इसका एक रोचक इतिहास भी है. इस मंदिर में भक्तों द्वारा मांगी गई मुरादें पूर्ण होती हैं. इसके साथ ही यहां सभी श्रद्धालु इच्छा पूर्ति के लिए मंदिर के पास स्थित पेड़ पर कलावा बांधते हैं.वह बताते हैं कि कुंजापुरी देवी मंदिर का काफी रोचक इतिहास है. इस मंदिर से जुड़ी एक कथा काफी प्रचलित है. मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव जब माता सती के वियोग को सह न सके, तो वह क्रोधित होकर माता सती का शव लेकर तांडव करने लगे. जिस कारण पूरे ब्रह्मांड में प्रलय होने लगी. यह देख विष्णु भगवान ने इस प्रलय को रोकने के लिए सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए. माता के शरीर के अंग और आभूषण 51 टुकड़ों में धरती पर अलग-अलग जगहों पर गिरे, जो शक्तिपीठ बन गए. इस स्थान पर माता सती के शरीर का ऊपरी भाग यानी कुंजा गिरा था, जिस कारण यह मंदिर एक शक्तिपीठ कहलाता है और कुंजापुरी देवी मंदिर के नाम से सभी के बीच प्रसिद्ध है. इस मंदिर को कुंजापुरी के साथ ही कुंचा देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है टिहरी गढ़वाल जिले में मां कुंजापुरी, मां सुरकंडा देवी और मां चंद्रबदनी के सिद्धपीठों का विशेष धार्मिक महत्व है। स्थानीय धार्मिक परंपरा में इन तीनों धामों को पवित्र शक्तित्रिकोण के रूप में देखा जाता है। इन मंदिरों में वर्षभर श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, लेकिन चैत्र और शारदीय नवरात्र में इनका आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।मां कुंजापुरी मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य का भी अनुपम स्थल है। मंदिर की पहाड़ी से गंगोत्री, बंदरपूंछ, चौखंबा और स्वर्गारोहिणी जैसी हिमालयी चोटियों के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। इसके साथ ही ऋषिकेश, हरिद्वार और दून घाटी का विहंगम नजारा पर्यटकों को आकर्षित करता है। नरेंद्रनगर से लगभग 11 किलोमीटर और ऋषिकेश से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह धाम धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। मां कुंजापुरी की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से वर्ष 1974 से शारदीय नवरात्र के दौरान श्री कुंजापुरी पर्यटन एवं विकास मेले का आयोजन किया जा रहा है। समय के साथ यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन गतिविधियों का प्रमुख हिस्सा बन गया है। मेले में धार्मिक आयोजनों के साथ स्थानीय लोकसंस्कृति, कला, खेल और सामाजिक गतिविधियों को मंच मिलता है। इससे स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर मिलने के साथ क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है। शारदीय नवरात्रि और मेले की स्वर्ण जयंती की शुभकामनाएं देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि 50वां श्री कुंजापुरी मेला लोक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली परंपराओं का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करना बेहद सुखद है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में कन्याओं को मां भगवती का स्वरूप माना गया है. ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने के साथ व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा देते हैं. मंदिर के अंदर पवेश करते हैं आपको मां दुर्गा के 2 शेरों के दर्शन, जो मां दुर्गा के चाहने की चाहत रखती है और जो भी महिला है इस मंदिर में ए वो अपने जीवन में इन्ही शेरों की तरह निडर रहे, कुंजापुरी शक्तिपीठ समुद्र तल से 1676 मीटर के वॉलपेप पर एक बेहद खूबसूरत पर्वत स्थित है | जहां से आपको हिमालय के सुंदरी, बंदरपूंछ, चौखंबा, हरिद्वार और दूनाघाटी के दृश्य दिखाई देते हैं। आदिवासियों से बीस किलोमीटर की दूरी पर आपको ये मंदिर मिल जाएगा, अब बात यह है कि ये बहुत सुंदर मंदिर है, इतनी ऊंची चोटी ने बनाया है, दोस्तों आदि गुरु देवता जो कि शिव अवतार थे, हिंदू सिद्धांत एवं संपूर्ण कलियुग के धर्मगुरु थे एवं जिनमें बौद्ध धर्म के सबसे महान निर्माताओं में जाना जाता है, वे न सिर्फ कुंजापुरी बल्कि भारत में अनेको मंदिर और मठो की स्थापना की आज आदि गुरु शिष्यों की वज़ह से हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को देखने और समझने के काबिल हुए हैं टिहरी के लोग इस देवी को अपना कुलदेवी मानते हैं कहा जाता है कि जब भी किसी बच्चे ए पर काली छाया भूत प्रेत आदि लगा हो तो कुंजापुरी सिद्ध पीठ के हवन कुंड की राख का टीका लगाने मात्र से कष्ट दूर हो जाता है अगर किसी के बच्चे नहीं हो रहे हैं तो वहां हवन करने से मनोकामना पूर्ण हो जाती है जिसकी शादी में दिक्कत आ रही है तो मंदिर के चुन्नी को के पेड़ पर बांधते है माता की चुन्नी बांध से कुछ ही समय में शादी हो जाती है इसलिए यहां मंदिर में बच्चे बूढ़े सब परिवार के साथ अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए माता के दर्शन के बेताब रहते हैं मंदिर समिति के प्रबंधक के अनुसार हिंडोलाखाल या आगराखाल से छोटे वाहनों के जरिए मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यहां पर प्रतिवर्ष नवरात्रि में नौ दिन का सिद्धपीठ कुंजापुरी पर्यटन व विकास मेले का आयोजन होता है जहां दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। श्रद्धालुओं को भी हर संभव सुविधाएं प्रदान की जाती है।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














