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उत्तराखंड में एक और चिपको आंदोलन की गूंज

18/03/21
in उत्तराखंड, बागेश्वर
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पर्यावरण और हरियाली को बचाने को लेकर जब भी बात की जाती है तो उत्तराखंड प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र में 1970 के दशक के चिपको आंदोलन का जिक्र होना स्वाभाविक है। पहाड़ के जंगलों को बचाने के लिए अलख जगाने वाली गौरा देवी और उनके सहयोगी इस आंदोलन के जनक और प्रेरणाश्रोत के रूप में देश.दुनिया में पहचाने जाते हैं। उत्तराखंड के दूर.दराज के जिले चमोली की ग्रामीण महिलाओं के अथक प्रयासों और चिपको की नीति पर आधारित लंबी लड़ाई के बाद जंगल माफियाओं और ठेकेदारों के साथ सरकार को भी अपनी नीति में बदलाव लाकर घुटने टेकने पड़े थे। यह एक बड़ा सच है कि जंगलों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की राह सदियों तक जनता के हक.हकूकों को हासिल करने के लिए एक मागदर्शी का काम करती रहेंगी।

दून घाटी में चूना पत्थरों की खुदाई से मसूरी और उसके आस.पास की पहाडि़यों को भारी नुकसान पहुंचने के साथ पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो रहा था। इस दौरान प्रकृति के स्वरूप और पर्यावरण को बचाने आगे आए पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने सड़क से लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई में जीत हासिल की। पूरे देश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिपको आंदोलन की तर्ज पर देशभर में हुए अन्य कई आंदोलन भी जनता की जीत के पर्याय बन गए। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि चिपको आंदोलन के जनक रहे उत्तराखंड में मानवीय आवश्यकताओं के बढ़ने से पर्यावरण का स्तर लगातार गिरता ही जा रहा है।

हरियाली को बचाना प्रदेश के पर्यावरणविदों, सामाजिक सरोकारों से जुड़े संगठनाें और बुद्धिजीवियों के बीच एक अहम चिंतनीय मुद्दा बन गया है चिपको आंदोलन की शुरुआत 1973 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी। चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले से हुई थी। उस समय उत्तर प्रदेश में पड़ने वाली अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में लोगों ने चिपको आंदोलन शुरू किया था। 1973 में वन विभाग के ठेकेदारों ने जंगलों में पेड़ों की कटाई शुरू कर दी थी। वनों को इस तरह कटते देख स्थानीय लोगों खासकर महिलाओं ने इसका विरोध किया। इस तरह चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई।

इस आंदोलन को 1980 में तब बड़ी जीत मिली, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्ष के लिए रोक लगा दी। बाद के वर्षों में यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य में विंध्य तक फैला था।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में रंगथरा.मजगांव.चौनाला मोटर मार्ग निर्माण में आ रहे पेड़ों को बचाने के लिए सेरी के बाद अब जाखनी की महिलाएं भी आगे आई हैं। महिलाओं ने चिपको की तर्ज पर आंदोलन शुरू कर दिया है। यहां की महिलाएं बांज और बुरांश के पेड़ों से लिपट गई। महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि देवी को चढ़ाए गए जंगल की बलि, सड़क निर्माण में नहीं दी जाएगी। महिलाओं ने आरोप लगाया कि वन विभाग ने सर्वे गलत किया है। उनके सर्वे में सड़क निर्माण में कुछ ही पेड़ आ रहे हैं। जबकि उनका हरा.भरा जंगल निर्माण में आ रहा है। पेड़ कटते ही उनके गांव में पानी का भी संकट गहरा जाएगा। मजगांव के लिए सड़क कट चुकी है। अब यहां से आगे निर्माण को सहन नहीं किया जाएगा। जंगल भगवती को चढ़ाया गया है। इस जंगल से वह खुद चारापत्ती आदि नहीं काटते हैं। ऐसे में जंगल में निर्माण कार्य नहीं होने देंगे। करीब 300 पेड़ सड़क निर्माण की जद में आ रहे हैं। इन पेड़ों को उन्होंने अपने बच्चों की तरह पाला है। अपने जंगल को उन्होंने देवी को समर्पित किया है। इस जंगल से वो चारा तक नहीं लाते। सड़क निर्माण के लिए वो अपने जंगल की बलि नहीं चढ़ने देंगी। चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों को बचाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया है। यहां की महिलाएं बांज और बुरांश के पेड़ों से लिपट गई हैं। उन्होंने अपने बेटे.बेटियों की तरह इनकी सुरक्षा का संकल्प लिया है। चौड़ी पत्तीदार पेड़ों से गांव के प्राकृतिक जल स्रोत सुरक्षित और संरक्षित हैं। अगर पेड़ काटे गए तो पानी स्रोत नष्ट हो जाएंगे। पानी की किल्लत शुरू हो जाएगी। चौड़ी पत्तीदार पेड़ों से गांव के प्राकृतिक जल स्रोत सुरक्षित और संरक्षित हैं। अगर पेड़ काटे गए तो पानी स्रोत नष्ट हो जाएंगे। पानी की किल्लत शुरू हो जाएगी। अपनी संस्कृति की रक्षा करेंगे तो पर्यावरण भी संरक्षित होता जाएगा। वहीं आनंद जैन ने बताया कि आज शहरों में आक्सीजन खरीदा जा रहा है और गांव में यह स्थिति निर्मित न हो, इसके लिए आवश्यक है कि हम जंगलों कीए पेड़ों की रक्षा के लिए आगे आएं। चिपको आन्दोलनष् के दौरान ये नारा भी बहुत मशहूर हुआ था। 48 साल पहले जंगल माफियाओं से वनों को बचाने को लेकर इस गांव सुर्खियाें में आया था। तब गांव की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में जंगल बचाने के लिए संघर्ष किया था। चिपको आंदोलन चलाया था। ये महिलाएं पर्यावरण की बर्बादी रोकना चाहती थीं।
क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

पहाड़ी राज्यों में नीतियां दिल्ली या उत्तर प्रदेश के समान नहीं हो सकती हैं। विकास को स्थानीय वास्तविकताओं और सीखों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यहीं पर चिपको आंदोलन की विचारधारा और कार्य अमूल्य प्रतीत होते हैं। जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए हर व्यक्ति को अपने और भावी पीढ़ी के अस्तित्व की खातिर आगे आना होगा। चिपको आंदोलन की तरह देश.दुनिया में पर्यावरण बचाने के लिए किए गए प्रयासों का अनुसरण करना होगा। हरित सोच और प्रकृति की अमूल्य धरोहरों को संजोकर पहाड़ी राज्यों में इन्हें जीविका और विकास मंत्र बनाया जा सकता है। तब यह निश्चित रूप से हिमालयी राज्यों के हित में सबसे समझदार बात होगी। हिमालयी राज्यों में रहने वाले लोगों के प्रति न्याय हित इसकी सीमाएं समझते हुए नीतियां बनानी होंगी। पहले तो हमें इसके आम आदमी की जरूरतों को ध्यान में रखना होगाए ना कि खास आदमी के ऐशो.आराम को। दूसरा इसके प्राकृतिक संसाधनों पर उतना ही बोझ डालना होगा जितना ये सह पाएं। हमारे जल.जंगल.जमीन हमारी विरासत हैं जिन्हें हमें संजोए रखकर अगली पीढ़ी को सौंपना होगा। देश और प्रदेश की सरकारों को अपनी हर नीति को दो कसौटियां पर कसने की जरूरत है। पहली कसौटी कि नई नीति कितने आम लोगों का भला कर पाएगी और दूसरी कि हमारे कुदरती संसाधनो पर कितना दबाव पड़ रहा है। जिस दिन हमारी सरकारें जनता की जरूरत और संसाधनों के इस्तेमाल के बीच स्थायी संतुलन बनाना सीख लेंगी उस दिन नीतियां जरूर कामयाब होगी। नीति निर्धारकों को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्राथमिकता और कड़े प्राविधानों को अमल में लाना होगा। हर देशवासी और प्रदेश के लोगों को अपने पेड़ों, जंगलों, जल और जमीन को नए सिरे से सर माथे से लगाना होगाए उनसे फिर से चिपकना हो। हरित सोच से ही हरियाली बचेगी और पर्यावरण बचाने की दिशा में किए गए हर एक देशवासी के प्रयास दुनियाभर में मिसाल कायम करेंगे।

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