डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
धरती के रहस्यों को खोलने के लिए कृत संकल्प मध्य हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक परिस्थिति, परिवेश से विश्व समुदाय को नवीनतम जानकारी देने वाले अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भारतीय भूविज्ञानी, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.खडग सिंह वल्दिया, 20 मार्च 1937 को तब के बर्मा में जन्मे प्रो. वाल्दिया का बचपन वहीं बीता। जब वह बच्चे थे, तभी विश्वयुद्ध के दौरान एक बम धमाके में उनकी सुनने की क्षमता लगभग समाप्त हो गई थी। जीवनभर इसके साथ उन्हें रहना पड़ा, पर लोगों को आश्चर्य होगा कि प्रोफेसर ने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उनकी कही एक बात आज के युवाओं और विशेष रूप से सक्षम लोगों को हमेशा प्रेरणा देती रहेगी- मुझे सुनने से ज्यादा दुनिया को अपनी बात सुनानी है। यह किस्सा उस समय का है जब वह पहली बार प्रवक्ता पद का साक्षात्कार देने के लिए विश्वविद्यालय पहुंचे। उनसे कहा गया कि आप ठीक से सुन नहीं पाते तो बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे। इस पर उन्होंने कहा था कि मैं वैसे ही पढ़ाऊंगा जैसे मैंने खुद शिक्षा ग्रहण की और वैसे भी मुझे सुनने से ज्यादा दुनिया को अपनी बात सुनानी है।बचपन में दूसरे बच्चे उनका मजाक बनाते थे, पर वह कभी नकारात्मकता में नहीं जिए। उनका मनोबल ऊंचा था और अपने कठिन परिश्रम से उन्होंने देश में सम्मान हासिल किया। आज के बच्चों को ताज्जुब होगा कि उस समय हियरिंग मशीन जैसी चीजें नहीं थी। ऐसे में वह बचपन में हाथ में एक बड़ी बैटरी लिए चलते थे और उसकी मदद से थोड़ा बहुत सुन पाते थे। कुछ इसी तरह की मुश्किलों का सामना करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की।सादगी ऐसी थी कि कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए भी वह कभी कुर्सी पर नहीं बैठे। बगल में वह एक साधारण कुर्सी लगाकर बैठते थे और अपना काम करते थे। काम के प्रति समर्पण इसी से समझा जा सकता है कि वह फालतू की बातों में समय व्यर्थ नहीं करते थे। जब किसी बैठक में विषय से हटकर बात होने लगती तो वह अपनी सुनने की मशीन उतारकर मेज पर रख देते थे। इस तरह से वक्ताओं को भी संकेत मिल जाता कि वह फालतू बातों को पसंद नहीं करते। हिमालय के भूगर्भ की गहरी समझ ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति तो दिलाई। मूल रूप से ड्योडार गांव के रहने वाले प्रो. वल्दिया का जन्म 1937 में वर्मा (म्यांमार) में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बदली परिस्थितियों में वे अपने पिता देव सिंह वल्दिया और मां नंदा वल्दिया के साथ पिथौरागढ़ आ गए। नगर के अपने पैतृक घर घंटाकरण में रहते हुए उन्होंने 1953 तक पिथौरागढ़ में ही स्कूलिंग की। लखनऊ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे विश्वविद्यालय में ही भू विज्ञान के प्रवक्ता नियुक्त हो गए। 1963 में उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि हासिल की।हिमालय के तमाम क्षेत्रों में गहन शोध ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें पहचान दिलाई। वर्ष 1966 में वे अमेरिका के जॉन हापकिन्स विश्विद्यालय में फैलोशिपि के लिए चुने गए। अमेरिका से लौटने के बाद 1969 में वे राजस्थान युनिवर्सिटी में भू-विज्ञान के रीडर बने। वर्ष 1970 से 76 तक उन्होंने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालया जियोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर रहे। 1981, 84 और जी बी पंत इंस्टिट्युट आफ हिमालयन एनवायरमैंट एंड डेवलेपमैंट, कुमांऊ विश्वविद्यालय जियोजिकल विभाग जैसे भू-गर्भीय संस्थानों की स्थापना मे भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। हिमालय का यह महानायक, अद्भुत व्याख्याता के साथ-साथ, भू-विज्ञान जैसे विषय को भी, साहित्यिक शैली में समझाने मे सिद्धहस्त था।शोध और शिक्षण के इस आजीवक साधक द्वारा, बीस से अधिक अकादमिक पुस्तकों की रचना की गई थी। 110 से अधिक शोधपत्र। नो किताबो का संपादन तथा विज्ञान को आमजन तक पहुचाने हेतु, हिंदी मे नियमित लेख नवनीत, धर्मयुग, त्रिपथा, विज्ञान जगत और हिन्दुस्तान इत्यादि मे लिखे थे। उक्त उल्लेखनीय लेख व शोधकार्य, शोधार्थियों के लिए भविष्य मे मार्गदर्शन का काम करेगे,अटूट विश्वास के साथ, व्यक्त किया जा सकता है। 1992 में कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति का जिम्मा संभाला।हिमालय के भूगर्भ पर उन्होंने 10 शोध पत्र लिखे। 14 महत्वपूर्ण किताबों के साथ ही 40 बेहद महत्वपूर्ण लेख तमाम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए। भू- विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 1976 में उन्हेें विज्ञान के प्रतिष्ठित शांतिस्वरू प भटनागर पुरस्कार सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय खनिज अवार्ड, एल.रामाराव गोल्ड मैडल पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष 1983 में प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य बने। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2007 में पद्मश्री से सम्मानित किया।देश के प्रतिष्ठित भू-वैज्ञानिक होने के बावजूद वे बेहद सादगीपूर्ण व्यक्ति थे। जीवन पर्यन्त वे अपने काम खुद ही करने पर जोर देते रहे। पिथौरागढ़ से लगाव रखने वाले प्रो.वल्दिया हर वर्ष गंगोलीहाट में हिमालय ग्राम विकास समिति ने साइंस आउटरीच कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पहुंचते थे। इस दौरान वे मेधावी विद्यार्थियों के साथ दो दिन बिताते, उन्हें विज्ञान की बारीकियां समझाते और नए शोधों पर उनके बातचीत करते। इस दौरान वे बच्चों को अपने कार्य खुद करने के लिए प्रेरित करते और उनके साथ जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करते। मीडिया से वे अक्सर दूरी बनाए रखते। बहुत जोर देने पर ही बातचीत के लिए तैयार होते थे। वे समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए हमेशा प्रयास करते रहे। उनके साथ पहल में कार्य कर चुके डॉ अशोक पंत का कहना है कि डॉ वल्दिया ने भू-वैज्ञानिक के रूप में काम करके जिले का नही बल्कि उत्तराखंड और देश का नाम रोशन किया है। लेकिन अगर उनको ये सम्मान उत्तराखंड से मिलता तो ज्यादा अच्छा लगता। पंत का कहना है कि डॉ वल्दिया की पहचान पूरे विश्व में हिमालय भूगर्भ वैज्ञानिक की रही है और उनकी कर्म भूमि भी उत्तराखंड ही रही है। 1995 में वह बेंगलुरु स्थित संस्थान चले गए। दुर्गम जिले के छात्रों तक साइंस का ज्ञान पहुंचाने के लिए उन्होंने अपने स्तर पर प्रयास किए। पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्वर, चमोली, रुद्रप्रयाग में उन्होंने हजारों छात्रों और शिक्षकों को लाभान्वित किया। एक भू-वैज्ञानिक के रूप में प्रो. खड़क सिंह बल्दिया हिमालय पर्यावरण के बदलते मिजाज के प्रति बहुत संवेदन शील थे. वे कहा करते थे कि जब तक सरकार की मंशा विकास के प्रति गंगा के पानी जैसी निर्मल और स्पष्ट नहीं होगी तब तक पर्यावरण सुरक्षा की बात करना बेईमानी ही होगी. उन्होंने स्पष्ट कहा कि “व्यवस्थाएँ कौन बनाता है? नीतियाँ कौन बनाता है? बजट की व्यवस्था कौन करता है? राज्य के नफा-नुकसान का हिसाब किताब कौन रखता है? वगैरह. यदि इन मुद्दों पर सरकारें गम्भीर नहीं तो मौसम भी तेजी से बदलेगा, लोग प्राकृतिक आपदाओं के संकट में आ जायेगें.पानी, पेड़ व हवा उपभोग की वस्तु बन जायेगी. वर्षा व साल की ऋतुओं का मिजाज बदल जायेगा.ऐसी परिस्थिति में लोगों की सांसे रुकनी आरम्भ हो जायेगी. इसलिए समय रहते लोग एक बार फिर से अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व दोहन के बारे में सोचें.”प्रो. के.एस.वल्दिया,ने वर्ष 1990 के दशक में सूख रहें जल स्रोतों के पुनर्जीवन हेतु जल स्रोत अभयारण्य विकसित करने का भी सरकार को सुझाव दिया था. इस तकनीक के अन्तर्गत वर्षा जल का अभियान्त्रिक एवं वानस्पतिक विधि से जलस्रोत के जल समेट क्षेत्र में अवशोषण किया जाता है. इस तकनीक से भूमि के ऊपर वनस्पति आवरण एवं कार्बनिक पदार्थों से युक्त मृदा एक स्पंज की तरह वर्षा के जल को अवशोषित कर लेती है,जिससे कि तलहटी के भू जल स्रोतों (एक्वीफर्स) में वृद्धि हो सके.आज जब हिमालय का पर्यावरण ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है,ऐसे में प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया जैसे लब्धप्रतिष्ठ भूवैज्ञानिक और पर्यावरण विद का चला जाना केवल उत्तराखंड के लिए ही नहीं बल्कि समूचे देश और अंतरराष्ट्रीय जगत के लिए भी अपूरणीय क्षति है. परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि हिमालय पुत्र पद्मभूषण प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया जी की आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें तथा उनके कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहे प्रोफेसर वाल्दिया को पहाड़ और यहां के लोग कभी नहीं भूलेंगे। विज्ञान के पुरोधाओं के सान्निध्य में यह नूतन कल्पनाएं करता है, नई योजनाएं बनाता है और नए स्वप्न संजोता है. तीन-तीन बार कुलपति बनने के प्रस्तावों को ठुकराने का साहस भी इसने दिखाया क्योंकि जीवन की जिन पथरीली पगडंडियों पर चल कर यह अपने मुकाम तक पहुंचा, उन्होंने इसमें यह अदम्य साहस भर दिया. तभी तो खिज़ां के मौसम में भी अगर इस पर पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे पुष्प खिले तो भला क्या आश्चर्य! पहाड़ का यह सुर्ख बुरांश हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष से जूझने के अकूत साहस और कर्मठता का संदेश दे गया. उनकी पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन!.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











