डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश सरकार खेलों को प्रोत्साहन के नाम पर भले ही लाखों करोड़ों खर्च करने का दावा करती हो, लेकिन धरातल पर ये दावे हवाई साबित होते हैंदेहरादून में करीब ढाई सौ करोड़ की लागत से बना राजीव गांधी इन दिनों बदहाल स्थिति में है. 2016 में इस स्टेडियम का उद्घाटन किया था. स्टेडियम इस लिहाज से बनाया गया था कि उत्तराखंड में क्रिकेट प्रेमियों को नेशनल और इंटरनेशनल मैच देखने का मौका मिलेगा और यहां की प्रतिभाओं को भी खेलने का मौका मिल सकेगा. रखरखाव न होने की वजह से इन दिनों यह स्टेडियम बदहाल स्थिति में है. राज्य सरकार की इस पहल से देहरादून में नेशनल और इंटरनेशनल लेवल के मैच होंगे और यह वही ग्राउंड है जिसे अफगानिस्तान ने अपना होम ग्राउंड बनाया था और यहीं पर आयरलैंड बांग्लादेश और अफगानिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय मैच भी हुए थे. लेकिन इन दिनों यह स्टेडियम पूरी तरह से बदहाल स्थिति में है. रखरखाव न होने की वजह से कुर्सियां टूट गई हैं. मैदान में बड़ी-बड़ी घास उग आई है इतना ही नहीं पूरे ग्राउंड में बरसात के पानी से काई लग गई है. आलम यह है कि, जंगली घास उग जाने से स्टेडियम की पिच भी पूरी तरह से तबाह हैउत्तराखंड की रणजी टीम ने महज 7 वर्षों में बीसीसीआई से मान्यता मिलने के बाद रणजी ट्रॉफी 2025-26 के सेमीफाइनल में पहुंचकर इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि राज्य के क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है। लेकिन यह ऐतिहासिक उपलब्धि अपने ही राज्य में नहीं, बल्कि बाहर जाकर खेलने को मजबूर है। वजह साफ है, देहरादून का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम अब क्रिकेट के लिए नहीं, बल्कि बड़े-बड़े कॉन्सर्ट और इवेंट कराने के लायक ही बचा है। जिस कारण उत्तराखंड क्रिकेट को एक बड़ा झटका लगा है। सेमीफाइनल जैसे बड़े मुकाबले को अपने ही घरेलू मैदान पर खेलने का सपना अब टूट गया।रणजी ट्रॉफी में इतिहास रचने वाली उत्तराखंड क्रिकेट टीम को बड़ा झटका लगा है. पहली बार सेमीफाइनल में पहुंचने के बावजूद उत्तराखंड से मेजबानी छीन ली गई. खराब स्टेडियम और सरकारी लापरवाही ने राज्य से ऐतिहासिक मैच छीन लिया. दरअसल, देहरादून का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, जिसे विश्व स्तरीय सुविधाओं का दावा किया जाता रहा, आज वही स्टेडियम उत्तराखंड क्रिकेट के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गया.बीसीसीआई के पिच क्यूरेटर के निरीक्षण में पिच और ग्राउंड की हालत बेहद खराब पाई गई. निरीक्षण में सामने आया कि पिच असमान है. आउटफील्ड में जगह-जगह खराब पैच हैं और पानी निकासी की व्यवस्था भी नाकाफी है.इन खामियों के चलते बीसीसीआई ने रणजी ट्रॉफी सेमीफाइनल मैच उत्तराखंड से बाहर शिफ्ट करने का फैसला लिया. अब यह मुकाबला उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित इकाना स्टेडियम या कानपुर के ग्रीन पार्क में कराए जाने की तैयारी है जबकि उत्तराखंड के लिए यह घरेलू मैदान पर इतिहास रचने का सुनहरा मौका था. उत्तराखंड क्रिकेट के लिए यह एक बेहद दुखद और निराशाजनक घटनाक्रम है। राज्य की क्रिकेट टीम ने रणजी ट्रॉफी 2025-26 में इतिहास रचते हुए पहली बार सेमीफाइनल में जगह बनाई थी, लेकिन मेजबानी के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।सेमीफाइनल में उत्तराखंड का मुकाबला केएल राहुल की अगुवाई वाली मजबूत कर्नाटक टीम से होने वाला था, जिसमें 5 टेस्ट खिलाड़ी शामिल थे। इस मैच की मेजबानी देहरादून में होती तो राज्य के क्रिकेट प्रेमियों, युवा खिलाड़ियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भारी फायदा पहुंचता। स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी से पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता और क्रिकेट का स्तर ऊंचा उठता। लेकिन स्टेडियम की बदहाल स्थिति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।बता दें खेल विभाग कई बार दावा कर चुका है कि देहरादून का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम विश्व स्तरीय सुविधाओं से लैस होगा। खेल मंत्री कई बार क्रिकेट और खेल इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देने की बात कह चुकी हैं, बावजूद इसके जमीनी हकीकत कुछ और ही है। स्टेडियम अब ज्यादातर कॉर्पोरेट लीग मैचों, नाच-गाने के कार्यक्रमों या छोटे आयोजनों तक सीमित रह गया है। रखरखाव पर ध्यान न देने से पिच और बुनियादी ढांचा लगातार बिगड़ता जा रहा है।उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों ने इस फैसले पर गहरा खेद जताया है। उन्होंने कहा कि वे स्टेडियम को जल्द अपग्रेड करने की दिशा में प्रयास करेंगे। लेकिन सवाल वही है क्या अब सरकार जागेगी? क्या खेल सुविधाओं को वास्तविक प्राथमिकता दी जाएगी? उत्तराखंड क्रिकेट ने मैदान पर साबित कर दिया कि वह बड़े मंच के लिए तैयार है, लेकिन प्रशासन और सरकार उसी स्तर की तैयारी नहीं दिखा पाई। अब सवाल यह है कि, क्या स्टेडियम के रखरखाव को गंभीरता से लिया जाएगा? क्या भविष्य में उत्तराखंड अपने ही घर में बड़े मुकाबलों की मेजबानी कर पाएगा? अगर समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धियां बार-बार अधूरी रह जाएंगी। यह मामला सिर्फ एक मैच की मेजबानी का नहीं, बल्कि राज्य की खेल व्यवस्था और प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।राज्य की अर्थव्यवस्था, पर्यटन और स्थानीय कारोबार को नुकसान हुआ है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम सरकार के अधीन है और इसके रखरखाव व पिच की गुणवत्ता पर गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में उत्तराखंड को ऐसे बड़े और ऐतिहासिक मुकाबलों की मेजबानी से वंचित न होना पड़े।लेकिन सवाल यह है कि जिम्मेदारों की लापरवाही का खामियाजा खिलाड़ियों को ही भुगतना पड़ रहा है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं












