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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय

11/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत की भूमि पर समय-समय पर ऐसे महामानव का अवतरण होता रहा है, जो स्वयं के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए ही जीता और मरता है। उसका जीवन आने वाली पीढिय़ों के लिए आदर्श होता है, उसका चिंतन समाज के लिए मार्ग होता है और उसका कर्म देश को दिशा देने वाला होता है। ऐसे ही महामानव थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को आवश्यकता थी अपनी एक ऐसी मौलिक विचारधारा की, जिसमें देश के अंतिम व्यक्ति की ङ्क्षचता करते हुए राजनीति को सेवा का साधन बनाया जा सके।देश के गौरव की रक्षा करते हुए इसे संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए एक ङ्क्षचतन की। भारत माता की उर्वर धरती ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महान सपूत को जन्म देकर एक नई दिशा दिखाने वाले को खड़ा कर दिया। अपने आदर्शों एवं विचारों के कारण भारत के लोगों के दिलो-दिमाग में स्थान बनाने वाले और एकात्म मानववाद की विचारधारा देने वाले जनसंघ के संस्थापकों में शामिल पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति के पथ प्रदर्शक, महान ङ्क्षचतक, सफल संपादक, यशस्वी लेखक और भारत माता के सच्चे सेवक के रूप में स्मरणीय रहेंगे।25 सितम्बर 1916 उत्तर प्रदेश के मथुरा जिला के चंद्रभान में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म लेने वाले दीनदयाल उपाध्याय जी का बचपन विपत्तियों में बीता। संघर्ष ही साथी बना रहा और साहस संबल। जब उनकी आयु मात्र अढ़ाई साल की थी, तब उनके जीवन से पिता का साया उठ गया, 8 साल के हुए तो माता चल बसी। यानी पूरी तरह अनाथ हो गए। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना के यहां होने लगा, लेकिन दुर्भाग्यवश 10 वर्ष की आयु में उनके नाना का भी देहांत हो गया। अब अल्पायु में ही इनके ऊपर छोटे भाई को संभालने की भी जिम्मेदारी। कोई भी आदमी होता तो इन विपत्तियों के सामने हार मान लेता,लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे।1951 में डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित भारतीय जनसंघ में पहले महामंत्री बनाए गए। 1967 में जनसंघ के अध्यक्ष बने, लेकिन महज 44 दिनों तक ही कार्य कर पाए, जो देश के लिए दुखद रहा। उनकी प्रतिभा, सांगठनिक शक्ति और कार्यक्षमता को देखकर डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कहना पड़ा कि यदि मुझे ऐसे दो दीनदयाल मिल जाएं तो मैं देश का राजनीतिक मानचित्र बदल दूंगा। राष्ट्र निर्माण व जनसेवा में उनकी तल्लीनता के कारण उनका कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं रहा। उनके पास जो कुछ भी था, वह समाज और राष्ट्र के लिए था। उनके विचारों और त्याग की भावना ने उन्हें अन्य लोगों से अलग सिद्ध कर दिया।दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए एकात्म मानववाद की विचारधारा दी। उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख होना चाहिए। उनका कहना था कि ‘भारत में रहने वाला, इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।किसी भी व्यक्ति या समाज के गुणात्मक उत्थान के लिए आॢथक और सामाजिक पक्ष ही नहीं उसका सर्वांगीण विकास अनिवार्यता है। वर्तमान में नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार एकात्म मानववाद को केंद्र में रखते हुए गरीब से गरीब व्यक्ति के उत्थान एवं विकास के संकल्प के साथ समाज के कमजोर और गरीब वर्ग के उत्थान के लिए कार्य कर रही है। गत 11 वर्षों से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चल रही सरकार ने गरीब-कल्याण के अपने लक्ष्य से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के दर्शन और अंत्योदय की विचारधारा को साकार कर  दिखाया है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास, के लिए केंद्र सरकार लगातार काम कर रही है पंडित दीनदयाल उपाध्याय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। सादगी से जीवन जीने वाले इस महापुरुष में राजनीतिज्ञ, संगठन शिल्पी, कुशल वक्ता, समाज चिंतक, अर्थचिंतक, शिक्षाविद्, लेखक और पत्रकार सहित कई प्रतिभाएं समाहित थीं। ऐसी प्रतिभाएं कम ही होती हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक व्यक्तित्व को सब भली प्रकार जानते हैं। उन्होंने जनसंघ का कुशल नेतृत्व किया, उसके लिए सिद्धाँत गढ़े और राजनीति में शुचिता की नई लकीर खींची। हम उन्हें ‘एकात्म मानवदर्शन’ के प्रणेता के तौर पर भी जानते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ संस्करण में कहा कि किसी देश के युवा जैसे-जैसे अपनी पहचान और गौरव पर गर्व करते हैं, उन्हें अपने मौलिक विचार और दर्शन उतने ही आकर्षित करते हैं। दीनदयाल जी ने विचारों के संघर्ष और विश्व की उथल-पुथल को देखते हुए ‘एकात्म मानव दर्शन’ और ‘अंत्योदय’ का एक विचार देश के सामने रखा। यह विचार पूरी तरह से भारतीय है।उन्होंने कहा कि ‘एकात्म मानव दर्शन’ विचारधारा के द्वंद्व और दुराग्रह से मुक्ति दिलाता है और मानव मात्र को एक समान मानने वाले भारतीय दर्शन को दुनिया के सामने रखता है।मोदी ने कहा कि दीनदयाल जी का दर्शन हमें सिखाता है कि कैसे आधुनिक, सामाजिक और राजनीतिक परिपेक्ष में भारतीय दर्शन दुनिया का मार्गदर्शन कर सकता है। उन्होंने आजादी के बाद देश में पनपी हीन भावना से हमें आजादी दिला कर बौद्धिक चेतना को जागृत किया। वह कहते थे कि ‘हमारी आजादी तभी सार्थक हो सकती है दीनदयाल जी का दर्शन हमें सिखाता है कि कैसे आधुनिक, सामाजिक और राजनीतिक परिपेक्ष में भारतीय दर्शन दुनिया का मार्गदर्शन कर सकता है। उन्होंने आजादी के बाद देश में पनपी हीन भावना से हमें आजादी दिला कर बौद्धिक चेतना को जागृत किया। वह कहते थे कि ‘हमारी आजादी तभी सार्थक हो सकती है जीवन मूल्यों की जितनी जरूरत मनुष्य को है, उतनी ही मीडिया को भी है। यह संभव नहीं है कि समाज तो मूल्यों के आधार पर चलने का आग्रही हो और उसका मीडिया, उसकी फिल्में, उसकी प्रदर्शन कलाएं, उसकी पत्रकारिता नकारात्मकता का प्रचार कर रही हों। समाज और मनुष्य को प्रभावित करने का सबसे प्रभावी माध्यम होने के नाते हम इन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकते। इन्हें भी हमें अपने जीवन मूल्यों के साथ जोड़ना होगा, जो मनुष्यता और मानवता के विस्तार का ही रूप हैं। अगर हम ऐसा मीडिया खड़ा कर पाते हैं तो समाज के बहुत सारे संकट स्वयं दूर हो जाएंगें। फिर टीवी बहसों से निष्कर्ष निकलेगें, फिर फिल्में समाज में समरसता और ममता का भाव भरेंगीं, फिर खबरें डराने के बजाए जीने का हौसला देंगीं। फिर खबरों का संसार ज्यादा व्यापक होगा। वे जिंदगी के हर पक्ष का विचार करेंगीं। वे एकांगी नहीं होंगीं, पूर्ण होंगीं और शुभता के भाव से भरी-पूरी होंगीं। जाहिर है यहां किसी धार्मिक और आध्यात्मिक मीडिया की बात नहीं हो रही है। सिर्फ उस दृष्टि की बात हो रही है जो एकात्म मानवदर्शन हमें देता है। वह है सबको साथ लेकर चलने, सबका विकास करने और सबसे कमजोर का सबसे पहले विचार करने की बात है।जहां दुनिया को बनाने वाले सारे अववय एक दूसरे से जुड़े हैं। जहां सब मिलकर संयुक्त होते हैं और वसुधा को परिवार समझने की दृष्टि देते हैं। दीनदयाल जी की स्मृतियां और उनके द्वारा प्रतिपादित विचारदर्शन एक सपना भी है तो भी इस जमीं को सुंदर बनाने की आकांक्षा से लबरेज है। उसकी अखंड मंडलाकार रचना का विचार करें तो मनुष्यता खुद अपने उत्कर्ष पर स्थापित होती हुयी दिखती है। इसके बाद उसका समाज और फिल्में, उसका समाज और उसका मीडया, उसका समाज और उसके मूल्य, उसका राह और उसका मन सब एक हो जाते हैं। एकात्म सृष्टि से, एकात्म व्यक्ति से, एकात्म परिवेश से जब हम हो जाते हैं तो प्रश्नों के बजाए सिर्फ उत्तर नजर आते हैं। समस्याओं के बजाए समाधान नजर आते हैं। संकटों के बजाए उत्थान नजर आने लगता है। दुनिया एकात्म मानवदर्शन की राह पर आ रही है, अपने भौतिक उत्थान के साथ आध्यात्मिकता को संयुक्त करने के लिए वह आगे बढ़ चुकी है। यह होगा और जल्दी होगा, हम चाहें तो भी होगा, नहीं चाहे तो भी होगा। क्या हम घरती पर स्वर्ग उतारने के सपने को अपनी ही जिंदगी में सच होते देखना चाहते हैं, तो आइए इस विचार दर्शन को पढ़कर, जीवन में उतारकर देखते हैं। यह हमें इसलिए करना है क्योंकि हमारा जन्म भारत की भूमि पर हुआ है और जिसके पास पीड़ित मानवता को राह दिखाने का स्वाभाविक दायित्व सदियों से आता रहा है।केंद्र सरकार पिछले आठ वर्षों से खेती-किसानी पर जोर दे रही है। इस कड़ी में उत्तराखंड सरकार ने भी कदम बढ़ाए हैं और इसके लिए कई उपाय किए गए हैं। इसमें सहकारिता विभाग के माध्यम से संचालित दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता कल्याण योजना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।उत्तराखंड में किसानों की आय दोगुना करने की दिशा में दीनदयाल उपाध्याय सहकारिता किसान कल्याण योजना बड़ा संबल बनकर उभरी है। छह वर्षों में छह लाख से ज्यादा किसानों व स्वयं सहायता समूहों को 3512 करोड़ रुपये का ब्याजरहित ऋण सहकारी बैंकों के माध्यम से दिया जा चुका है।जब वो हमारी संस्कृति और पहचान की अभिव्यक्ति करें।’ जब वो हमारी संस्कृति और पहचान की अभिव्यक्ति करें।’एकात्म मानववाद और अंत्योदय के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय को पं. दीनदयाल उपाध्याय की पहचान एक महान चितंक के रूप में है, वो नई सोच और प्रगतिशील शोधक के रूप में लोगों के बीच में लोकप्रिय रहे हैं।जनसंघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष दीन दयाल उपाध्याय का क्षत-विक्षत शरीर भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” भारतीय सभ्यता से प्रचलित है। इसीके अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संस्कृति से किसी व्यक्ति, वर्ग, राष्ट्र आदि की वे बातें, जो उसके मन, रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता की सूचक होती हैं, पर विचार होता है। दीनदयाल जी ने एकात्म मानववाद के आधार पर एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की, जिसमे विभिन्न राज्यों की संस्कृतियां विकसित हों और एक ऐसा मानव धर्म उत्पन्न हो जिसमे सभी धर्मों का समावेश हो, जिसमें व्यक्ति को सामान अवसर और स्वतंत्रता प्राप्त हो जो एक सुदृढ़, सम्पन्न एवं जागरूक राष्ट्र कहलाए। हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केंद्र ‘मानव’ होना चाहिए। भौतिक चीजें मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं। पंडित जी का मानना था कि व्यक्ति का अर्थ सिर्फ उसका शरीर नहीं है, बल्कि उसका मन, बुद्धि, और आत्मा भी है। यदि इन चारों में से किसी एक की भी उपेक्षा की जाए तो व्यक्ति का सुख विकलांग हो जाएगा।11 फ़रवरी 1968 को पंडित जी इस संसार को छोड़ गये। इस महान नेता, पत्रकार, सहित्यकार, अर्थशास्‍त्री, चिंतक और विचारक का निधन सभी को अचंभित कर दिया था। उनके विचार आज भी देश को प्रगति के मार्ग पर ले जा रहे हैं और यह उनकी ही देन है कि देश में लोकतंत्र का मतलब सबके लिए एक समान है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री श्री अमित शाह जी उनके चिंतन को साकार कर रहे हैं। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने पर एकात्ममानववाद और अन्त्योदय को मूर्त रूप दिया गया। परमब्रह्म में विलीन होने के बाद भी पंडितजी अपनी लेखनी, ज्ञान, शिक्षा और उच्च विचारों से आज भी हमारे बीच जीवंत हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व को हम शत् शत् नमन करते हैं। पुण्यतिथि पर प्रेरणापुरुष पं. दीनदयाल उपाध्याय जी को विनम्र श्रद्धांजलि। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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