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पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर है लाल चावल

23/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड से हिमालय में जैविक रूप से उगाए गए लाल चावल, जिसे लाल चावल के नाम से भी जाना जाता है, कुरकुरे बनावट और एक विशिष्ट स्वाद के साथ एक अत्यधिक पौष्टिक चावल है। यह प्राकृतिक रूप से गैर प्रदूषित भीतरी इलाकों उत्तराखंड में उगाया जाता है। इसमें बहुत अधिक पोषण मूल्य, फाइबर सामग्री है और यह एंटी ऑक्सीडेंट का एक अच्छा स्रोत है। हिमालयन रेड राइस हृदय के लिए भी अच्छा है और मधुमेह में भी उपयोगी है।उत्तरकाशी जिले की गंगा व यमुना घाटी में लाल धान की खेती को बढावा देने के प्रयास फलीभूत हो रहे हैं। इस मुहिम को शुरू करने के लिए जिलाधिकारी ने खुद खेतों में उतर कर ग्रामीणों के साथ जुताई व रोपाई की थी। अब फसल तैयार होने के बाद लाल धान की पैदावार के नतीजे नई उम्मीदों को जगा रहे हैं। इससे उत्साहित किसानों ने पहली उपज को बीजों के लिए सहेज कर रखते हुए अगले खरीफ के दौर में बड़े पैमाने पर लाल धान की खेती करने का इरादा जताया है।जिले की यमुना घाटी में परंपरागत रूप से बड़े पैमाने पर लाल धान (चरधान) की खेती की जाती है। रवांईं क्षेत्र में पुरोला ब्लॉक की कमल सिरांई व रामा सिरांई को लाल धान का सर्वाधिक उत्पादन होता है। इसके साथ नौगांव व मोरी ब्लॉक के निचले इलाकों में भी लाल धान उगाया जाता है। इन इलाकों में लाल धान की सालाना उपज करीब 3000 टन है। पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर लाल चावल की रंगत और अनूठा स्वाद इसको आम चावलों की तुलना में खास और कीमती बनाता है। इसकी देश-विदेश में काफी मांग है। प्रसिद्धि और मांग में निरंतर वृद्धि तथा किसानों के फायदे को देखते हुए लाल धान का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत निरंतर महसूस की जा रही थी।किसानों की बेहतरी की व्यापक संभावना को देखते हुए जिलाधिकारी अभिषेक रूहेला की पहल पर कृषि विभाग ने पहली बार जिले की गंगा घाटी में भी लाल धान पैदा करने की योजना तैयार की थी। शुरूआती दौर में चिन्यालीसौड, डुंडा और भटवाड़ी ब्लॉक के पैंतीस गांवों के लगभग साढे चार सौ किसानों को इस प्रायोगिक मुहिम से जोड़ा गया। साठ कुंतल बीज की नर्सरी तैयार कर लगभग दो सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में लाल धान की रोपाई की गई थी।इस इस पहल को जमीन पर उतारने के लिए खुद जिलाधिकारी ने भटवाडी ब्लॉक के उतरौं गाँव के सिमूड़ी तोक के ‘सेरों’ में जुताई व रोपाई की थी। मुख्य कृषि अधिकारी भी मातहतों के साथ धान की रोपाई करने खेतों में उतरे। अब फसलों की कटाई संपन्न होने पर यह मुहिम अंजाम तक पहुँची तो नतीजे उत्साहजनक और उम्मीदों के अनुरूप देखने को मिले हैं। वैज्ञानिक ढंग से एकत्र किए गए क्रॉप कटिंग के आंकड़ों तथा काश्तकारों की प्रतिक्रिया के आधार पर गंगा घाटी में लालधान उगाने का शुरुआती प्रयोग सफल माना जा रहा है।
इस मुहिम से जुड़े उतरौं गांव के किसान पूर्व सैनिक उनकी माता श्रीमती शिव देई आदि लाल धान की पैदावार से काफी उत्साहित है उनके खेत में लालधान की पैदावार सामान्य धान के बराबर ही रही। लेकिन खाद व रसायनों की कम जरूरत तथा सामान्य धान की तुलना में दो से तीन गुना अधिक कीमत मिलने पर किसानों को इससे अधिक लाभ मिलना तय है। सिमूणी के ही वीरेन्द्र सिंह बताते हैं कि उनकी लाल धान की फसल तेज हवा या भारी बारिश के झोंकों में भी खड़ी रही और उपज लगभग दूसरे धान के बराबर ही रही, साथ ही इसकी पुआल पशुओं के चारे के लिए अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है। अन्य किसानों ने भी लाल धान की खेती को लाभप्रद मानते हुए इसे जारी रखने का इरादा जाहिर किया है। ज्यादातार किसानों ने अपनी पहली फसल को बीज के लिए सुरक्षित रख दिया है। इससे जाहिर होता है कि खरीफ के अगले दौर में यह मुहिम और रंग लाएगी गंगा घाटी में बड़े पैमाने पर लाल धान की फसल लहलहायेग जिओ टैगिंग के लिए भी आवेदन किया गया है। इससे जिले के लाल धान को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान मिलेगी और ब्रांडिंग व मार्केटिंग में लाभ मिलेगा।मुख्य कृषि अधिकारी बताते है कि उतरौं गांव में जसदेई देवी तथा अन्य किसानों के प्रदर्शन प्लॉटों की क्रॉप कटिंग से नतीजों के आधार पर इस क्षेत्र में धान की औसत पैदावार प्रति हेक्टेयर चालीस कुंतल से भी अधिक आंकी गई है। उन्होंने बताया कि सामान्य धान की बाजार कीमत 25 से 30 रू. प्रति किला है जबकि लाल धान 80 से 100 रू. प्रति किलाग्राम आसानी से बिक रहा है। लिहाजा लाल धान से किसान को न्यूनतम दुगुना फायदा होना तय है। उन्होंने कहा कि अगले दौर में लाल धान का रकवा बढ़ाने व किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग ने अभी से कोशिशों में जुट गया है। उत्तरकाशी के पुरोला क्षेत्र में लाल चावल जैविक रूप से उगाया जाता है। यह बेहद पौष्टिक चावल सख्त बनावट और पौष्टिक स्वाद के साथ आता है और इसे पकाने में सफेद चावल के समान ही समय लगता है। उच्च ऊंचाई वाली हिमालयी घाटियों में भारी बारिश इसकी ठोस बनावट और दिलचस्प स्वाद के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है।उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य उत्पादों की अपनी खास पहचान है. इन्हीं में से एक लाल चावल भी है. लाल चावल उत्तराखंड के बागेश्वर समेत कई पर्वतीय जिलों में उगाया जाता है. यह पोषक तत्व से भरपूर होता है. इसे हिमालयन रेड राइस या वीडी राइस भी कहा जाता है. इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट गुण भरपूर मात्रा में होते हैं. यह चावल उत्तराखंड के अलावा उत्तरी भारत और हिमालय के सीमावर्ती राज्यों में भी उगाया जाता है. यह ग्लूटेन फ्री होता है. इसमें प्रोटीन की मात्रा सफेद चावल से ज्यादा होती है.बागेश्वर की महिला व्यापारी से बातचीत में कहा कि जब से हमने लाल चावल बेचना शुरू किया है, तब से लोग सफेद चावल को कम खरीद रहे हैं. बागेश्वर में तो लाल चावल की खूब डिमांड रहती है क्योंकि इसमें सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं. उन्होंने कहा कि दुकान के अलावा हम जहां भी स्टॉल लगाते हैं, लोग वहां भी लाल चावल की खूब डिमांड करते हैं. खासतौर पर शुगर के मरीज लाल चावल को अधिक खरीदते हैं. उनके लिए यह काफी फायदेमंद होता है. बागेश्वर के अलावा दिल्ली, देहरादून और हल्द्वानी में भी इसकी काफी मांग रहती है. नगर की सरस मार्केट में लाल चावल 100 रुपये किलो बिकता है और मेले आदि में 120 रुपये किलो तक बिकता है. लाल चावल को पहाड़ के ऊपराऊ वाले स्थानों में उगाया जाता है. यह चावल तलाऊ वाले स्थानों में नहीं होता है. इसे हम दुकान में कुंतल के हिसाब से मंगाते हैं और कुछ ही दिन में यह बिक जाता है.उन्होंने आगे कहा कि पहाड़ के पुराने लोगों को लाल चावल की महत्ता के बारे में जानकारी है, इसलिए वे इसे अच्छे दामों में भी खरीदकर ले जाते हैं. आयुर्वेद के अनुसार, लाल चावल में आयरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीज, फाइबर, और मिनरल्स मौजूद होते हैं. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट और फ्री रेडिकल शरीर में कोलेस्ट्रॉल और वजन को कम करते हैं. यह चावल मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद करता है. लाल चावल दिल के स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है. यह पाचन क्रिया को अच्छा करने में मददगार होता है. यह त्वचा के लिए भी फायदेमंद होता है. इसमें कैल्शियम, आयरन, विटामिन बी1 और बी2 जैसे पोषक तत्व होते हैं. लाल चावल में मौजूद जिंक रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है. इसमें मोनाकोलिन k होता है, जो कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद करता है. लाल चावल में ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, इसलिए यह मधुमेह रोगियों के लिए अच्छा विकल्प है. आज यह सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है. स्वाद और सेहत के प्रति जागरूक लोगों की वजह से देहरादून, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी इसकी डिमांड कई गुना बढ़ गई है. लोग अब इसे ऑनलाइन ऑर्डर कर रहे हैं, जिससे किसानों को भी अच्छे दाम120 से 200 रुपये प्रति किलो) मिल रहे हैं.सर्दियों में पहाड़ों में लाल चावल की खीर तो हर घर में बनती है. इसे पारंपरिक तरीके से धीमी आंच पर दूध में पकाया जाता है और फिर गुड़ या शहद, देसी घी और मेवों के साथ परोसा जाता है. यह खीर शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देने के साथ-साथ बच्चों और बुजुर्गों के लिए बेहतरीन पौष्टिक आहार मानी जाती है. रात के भोजन में लाल भात खाना सेहत के लिए विशेष रूप से फायदेमंद माना जाता है. इसमें मौजूद फ्री रेडिकल्स शरीर में जमा खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं और वजन नियंत्रण में मदद करते हैं. आज जब लोग हेल्दी फूड की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में उत्तराखंड का यह पारंपरिक लाल चावल देश भर के लोगों के लिए सुपरफूड बनकर उभर रहा है. जिले की यमुना घाटी के रामा सिराई और कमल सिराई में परंपरागत रूप से बड़े पैमाने पर लाल धान की खेती की जाती है. रवांईं क्षेत्र में पुरोला ब्लॉक की कमल सिरांई और रामा सिरांई में लाल धान का सर्वाधिक उत्पादन होता है. इसके साथ नौगांव और मोरी ब्लॉक के निचले इलाकों में भी लाल धान उगाया जाता है. इन इलाकों में लाल धान की सालाना उपज करीब 3000 टन है. . इस चावल के उपयोग को देखते हुए हिमाचल, दिल्ली सहित अन्य राज्यों में भी इसकी अच्छी खासी डिमांड है, लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण लगातार इस फसल की जोत भूमि घट रही है. जिसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ रहा है.  लाल धान की खेती उनकी आजीविका का मुख्य साधन है. लाल धान की खेती ही हमारे परिवारों भरण पोषण का एकमात्र जरिया है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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