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जीवन भर वंचितों के लिए लड़ते रहे स्व विपिन चंद्र त्रिपाठी

23/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

प्रखर समाजवादी उत्तराखंड क्रांति दल शिल्पी, चिंतक एवं पूर्व विधायक स्वण् बिपिन चन्द्र त्रिपाठी को उनकी 78वीं जयंती है। स्व०विपिन त्रिपाठी के आदर्शों और संघर्षों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। वन आंदोलन से लेकर नशा नहीं रोजगार दो। ताड़ीखेत में मजदूरों के आंदोलन को आगे बढ़ाया। इमरजेंसी के दौरान सरकार के खिलाफ अपने पाक्षिक अखबार द्रोणाचल प्रहरी में लिखा, उनके अखबार को सरकार ने प्रतिबंधित करके प्रेस सील कर दी तथा इमरजेंसी के दौरान 24 महीने जेल रहे। उक्रांद के शिल्पी कहे जाने वाले विपिन दा ने राज्य आंदोलन के दौरान कार्यक्रमों को आगे ले गये। उन कार्यक्रमों का बखूबी सफल संचालन किया। उनके ओजस्वी भाषणों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।विपिन दा ने अपने मूल्यों से कभी समझौता नही किया। दल के मुख्य रणनीतिकार की भूमिका विपिन दा की रहती थी। उन्ही के प्रयासों से द्वाराहाट में इंजीनियरिंग कॉलेज, पालिटेक्निक और आई टी आई बनी । विपिन दा ने 22 वर्ष की उम्र में आंदोलन में कूद गये थे। ताउम्र विपिन दा का संघर्ष अंतिम सांस तक रहा। विपिन चन्द्र त्रिपाठी जी का दिया गया भाषण आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वे केवल एक नेता ही नहीं बल्कि दूरदर्शी राजनीतिज्ञ भी थे। उत्तराखंड के थिंक टैंक के नाम से जाने जाने वाले बिपिन चंद्र त्रिपाठी जी के शब्द आज भी हमारा मार्ग दर्शन कर रहें हैं। जिन समस्याओं के समाधान के लिए वे खड़े हुए, वे समस्याएँ उनके जाने के 16 साल बाद भी वैसी ही बनी हुई हैं। बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी हमारी शिक्षा बदहाल, पर्यटन बदहाल, स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल, रोजगार बदहाल, सिर्फ पलायन ही बड़ा है। क्योंकि समाधान के लिए अच्छी नीयत, जन समस्याओं का बोध, पहाड़ और पहाड़ियों के लिए प्रेम और इस देवभूमि के लिए समर्पण की आवश्यकता है।आज जब राजनीति भ्रष्टाचार के दलदल में गोते लगा रही है तो ऐसे में सहसा याद आते हैं। जीवन भर समाज के दबे कुचले और वंचित वर्ग के लिए लडने में विपिन चंद्र त्रिपाठी ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया। चाहे वन बचाओ आंदोलन हो या चिपको आंदोलन, चांचरीधार आंदोलन हो या महंगाई के खिलाफ आवाज बुलंद करना हो अथवा उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लडाई सभी में हमेशा आगे रहे। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी विपिन चन्द्र त्रिपाठी विपिन दा जल, जंगल, जमीन के संघर्ष को लेकर उन्होंने भूख हड़ताल से लेकर आमरण अनशन तक किया और जेल भी गए। परंतु विपिन चंद्र त्रिपाठी आज भी हमारी स्मृतियों में विद्यमान हैं, श्री त्रिपाठी का जन्म 23 फरवरी 1945 में द्वाराहाट के ग्राम दैरी में हुआ था। उनके पिता मथुरादत्त त्रिपाठी डाक विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने अपने जीवन की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही ग्रहण की और इसके बाद वह माध्यमिक शिक्षा के लिए नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर चले गए।उच्च शिक्षा के दौरान ही उनके ऊपर प्रसिद्ध समाजवादी रहे डाo राम मनोहर लोहिया व आचार्य नरेन्द्र देव के विचारों का प्रभाव पड़ा। इनके विचारों से प्रभावित होकर वह वर्ष 1967 से ही आंदोलन में कूद गये। वर्ष 1972 में प्रजा सोशलिस्ट द्वारा चलाये गये भूमि आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय महंगाई के विरोध में आवाज बुलंद की। विपिन चंद्र त्रिपाठी ने वन अधिनियम, 1989 में भूमि संरक्षण आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के समय 06 जुलाई 1975 को जेल भी गये। 22 महीने जेल में सजा काटने के बाद बाहर निकले तो जनता पार्टी की सरकार सत्ता हासिल करने जा रही थी। तो उन्होंने युवा शाखा से इस्तीफा दे दिया। इतना ही नहीं वह हमेशा सत्ता सुख से दूर रहे। इसके बाद उन्होंने द्वाराहाट को अपनी कर्मभूमि बना लिया।उनकी बढती लोकप्रियता ही थी कि वह वर्ष 1989 में द्वाराहाट के ब्लाक प्रमुख बने। इस दौरान उन्होंने द्वाराहाट के लिए अनेक विकासकार्य करवाए। विपिन चंद्र त्रिपाठी का कार्यकाल देख चुके लोग बताते हैं कि ब्लाक प्रमुख होने के बावजूद अधिकारी उनकी ईमानदार और स्वच्छ छवि से घबराते थे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने छोटे से कस्बे द्वाराहाट में शासन पर दबाब बनाकर राजकीय इंजीनियरिंग कालेज, राजकीय पॉलिटेक्नीक, राजकीय महाविद्यालय खोलने के अलावा कई विकास कार्य किये। इसके लिए भूख हड़ताल व आमरण अनशन तक किया। वर्ष 1984 में नशा नहीं रोजगार दो अांदोलन में 40 दिन तक जेल रहे। वर्ष 1980 से उत्तराखंड क्रांति दल से जुड़ने के बाद महासचिव से अध्यक्ष पद तक का सफर तय किया। वर्ष 1992 में बागेश्वर में उन्होंने उत्तराखंड का ब्लू प्रिंट तैयार किया। उनके द्वारा तैयार किए इस प्रिंट पर ही पार्टी ने घोषणा पत्र तैयार किया।श्री त्रिपाठी ने वर्ष 1974 में बारामंडल सीट से पहला चुनाव लड़ा लेकिन अविभाजित उत्तर प्रदेश में बडे भौगोलिक और कई समीकरणों में उलझी सीट पर उन्हें हर बार हार का सामना करना पडा। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद द्वाराहाट सीट के अस्तित्व में आने पर राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में द्वाराहाट के विधायक बने। उन्होंने अपने विरोधियों को करारी शिकस्त दी। लेकिन सत्ता सुख से दूर रह कर समाज के लिए संघर्ष करने वाले इस महान क्रांतिवीर का उनके जन्म को 81 साल पूरे होने जा रहें हैं। जो क्रांति विपिन चंद्र त्रिपाठी जी और साथियों ने शुरू की थी, उसे हम उदेश्य तक पहुंचाकर उत्तराखंड को, उत्तराखंड के लोगों का उत्तराखंड बनाएं!। बिपिन दा को याद करने का मतलब इतिहास के एक समय को याद करना है। आंदोलनों के एक दौर के प्रतिनिधि रहे बिपिन दा। त्रिपाठी जी और आंदोलन एक दूसरे के पर्याय थे। एक जीवट व्यक्तित्व के रूप में तो हम विपिन दा को याद करना प्ररेणाप्रद हो सकता है। सिद्धान्तों के प्रति जिद्दी बिपिन दा से आप खीज भी सकते हैं। उनसे असहमत लोगों की एक बड़ी जमात है। ऐसे असहमत लोगों में उनके विपक्षी तो थे ही उनकी धारा के लोग भी थे। बिपिन दा के साथ उनके साथियों की भिडंत हर बार नये संदर्भों में हो जाती। अपनी सही बात को मनवाने की जिद वे हद से बाहर तक कर सकते थे। जो उनकी समझ में नहीं आता उसे स्वीकार नहीं करते। इसका बहुत नुकसान उन्हें अपने राजनीतिक जीवन में उठाना पड़ा।राजनीति में सुचिता और र्इमानदारी को जिस तरह उन्होंने गांठ बांध लिया उसका फल भी उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ा। वे हर चुनाव में भागीदारी करने की बीमारी से भी त्रस्त रहे। शायद ही कोर्इ चुनाव था जो उन्होंने छोड़ा। इसे वह अपनी बात कहने का मंच मानते थे। वे चुनाव तो राज्य बनने के बाद जीते उससे पहले सभी चुनाव हारे। लेकिन जब वे चुनाव प्रचार में जाते तो उन्हें सुनने के लिये हर पार्टी, हर तबके के लोग आते। चाहे वे उनसे सहमत हों या असहमत। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति को उन्होंने बहुत कस कर पकड़े रखा। इससे कोर्इ फर्क नहीं पड़ता की उनकी बात मानी ही जाये। गांधी के इस विचार को वे जीवन भर आत्मसात करते रहे कि- ‘साध्य को प्राप्त करने के लिये साधनों की पवित्रता आवश्यक है।’ इस पर वे जीवन भर चले। राज्य बनने के बाद पहली विधानसभा के लिये वे द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र से चुने गये। लेकिन उनके विचार और उनका जुझारू व्यक्तित्व आज भी समाज के लिए प्रासंगिक है। जननायक विपिन चंद्र त्रिपाठी ने अपनी पूरी ऊर्जा और उत्साह जनसमर्थन, विचारधारा, ईमानदारी और संघर्ष के साथ प्रदेश के विकास के लिए समर्पित किया। ..लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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