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रीठा प्राकृतिक साबुन, बालों और चर्म के लिए उपयोगी

24/12/19
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
रीठा या अरीठा एक वृक्ष है जो लगभग हर जगह भारतवर्ष में पाया जाता है। इसके पत्ते गूलर के पत्तों से बड़े, छाल भूरी तथा फल गुच्छों में होते हैं। इसकी दो जातियाँ हैं। पहली सापीन्दूस् मूकोरोस्सी और दूसरी सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् सापीन्दूस् मूकोरोस्सी के जंगली पेड़ हिमालय के क्षेत्र में अधिक पाये जाते जाते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में तथा आसाम आदि में लगाये हुए पेड़ बाग-बगीचों में या गांवों के आसपास पाये जाते हैं। इसके फलों को पानी में भिगोने और मथने से फेन उत्पन्न होता है और इससे सूती, ऊनी तथा रेशमी सब प्रकार के कपड़े तथा बाल धोए जा सकते हैं। आयुर्वेद के मत में यह फल त्रिदोषनाशक, गरम, भारी, गर्भपातक, वमनकारक, गर्भाशय को निश्चेष्ट करनेवाला तथा अनेक विषों का प्रभाव नष्ट करेनवाला है।
संभवतः वमनकारक होने कारण ही यह विषनाशक भी है। वमन के लिए इसकी मात्रा दो से चार माशे तक बताई जाती है। फल के चूर्ण के गाढ़े घोल की बूंदों को नाक में डालने से अधकपारी, मिर्गी और वातोन्माद में लाभ होना बताया गया है। सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् के पेड़ दक्षिण भारत में पाए जाते हैं, इसमें 3.3 फल एक साथ जुड़े होते हैं। इसके फलों की आकृति वृक्काकार होती है और अलग होने पर जुड़े हुए स्थान पर हृदयाकार चिन्ह पाया जाता है। ये पकने पर लालिमा लिए भूरे रंग के होते हैं। दूसरे प्रकार के वृक्ष से प्राप्त बीजों से तेल निकाला जाता है, जो औषधि के काम आता है। इस वृक्ष से गोंद भी मिलता है। इसकी नर्सरी तैयार कर जनवरी माह में इसका रोपण किया जा सकता है। एक बार पौधा पनप जाय तो उसके बाद इसे सिंचाई की जरूरत भी नहीं होती। यह किसी भी तरह की उपयोगी भूमि पर उगाया जा सकता है। इसके फल एंव बीज का उपयोग किया जाता है। रीठा का उपयोग वैसे तो सौंदर्य प्रसाधन जैसे साबुन बनाने तथा सैम्पू के रूप मे किया जाता है, लेकिन मिर्गी अपस्मार के उपचार, जुकाम, छाल रोग अत्यधिक लार बहने में भी इसका उपयोग किया जाता है हर किसी की चाहत होती है। इसके लिए हम न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं और थेरेपिस्टा से ट्रीटमेंट लेते हैं लेकिन हमें अपेक्षित रिजल्ट नहीं मिल पाता। केमिकलयुक्तै शैंपू, कंडिशनर के इस्तेटमाल और ट्रीटमेंट की वजह से बालों को फायदे की जगह नुकसान होता है। इनका असर भी ज्या‍दा लंबे समय तक नहीं रहता है। ऐसे में बेहतर होगा कि आप प्राकृतिक चीजों की मदद लें।
बालों के लिए रीठा से बेहतर और कुछ नहीं होता। इससे बाल सुंदर, मजबूत और चमकदार बनते हैं। मार्केट में उपलब्धक शैंपू और कंडिशनर में भी रीठे का ही प्रयोग किया जाता है लेकिन इनके साथ और भी कई केमिकल्सउ होते हैं जो बालों को नुकसान पहुंचाते हैं बाजार में इसका सूखा फल मिलता है और यही प्रयोग किया जाता है। रीठा एक नेचुरल साबुन है। इसमें बहुत झाग होता है। पानी के साथ मिलकर इसका ऊपरी छिलका झाग बनता है। इसे बहुतायत से बालों को धोने यानि हेयर वाश और शैम्पू की तरह इस्तेमाल किया जाता है। रीठा अकेला या फिर शीकाकाई के साथ मिलकर शैम्पू की तरह इस्तेमाल होता है। ईश्वर ने धरती पर सब कुछ हमारी जरूरत के अनुसार ही बनाया है। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी पुरातन सभ्यता को भूल ही गए हैं। ऐसे ही एक जड़ी बूटी है रीठा, रीठा के पेड़ से कीड़े.मकोड़े और सांप एवं चूहे दूर रहते हैं, इसलिए धान की खेती करने वाले अपने खेतों में रीठा लगाते हैं ताकि उनकी फसल चूहों से बची रहे।
साथ ही रीठा में मौजूद एंटी.वेनम से सांप या बिच्छू के काटे का जहर उतारा जा सकता है।रीठा के वृक्ष भारत के प्रायः सभी इलाकों में पाए जाते हैं। यह वृक्ष आकार में काफी बड़े होते हैं। इसके पत्ते गूलर के पत्तों से थोड़े बड़े होते हैं। यह पेड़ साधारण होने के साथ गुणों से भरा होता है। साबुनों की अपेक्षा रीठा ज्यादा लाभ दायक होता है। शैम्पू की जगह रीठा बालों के लिए ज्यादा श्रेष्ठ होता है, एक शैम्पू और इसकी सफाई गुण के रूप में दुनिया भर में उपयोगकर्ताओं द्वारा सराहना कर रहे हैं। एक निर्माता, निर्यातक, और आपूर्तिकर्ता समीरा पाउडर, कंपनी के एक ठीक गुणवत्ता पाउडर प्रदान करता है कि कोई साइड इफेक्ट है। आगे, समीरा के पाउडर अमला की तरह अन्य बालों की देखभाल जड़ी बूटियों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। औषधीय महत्व के इस पौधे की खेती करने से काफी मुनाफा कमाया जा सकता है। रीठा की खेती करने के लिए उद्यान विभाग की भेषज ईकाई काश्तकारों को तकनीकी जानकारी व कृषिकरण का प्रशिक्षण दे रही है। हमारे प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है। प्राकृतिक आपदा.यथा बाढ़ व सूखा से फसल नष्ट होने पर कृषकों को आर्थिक क्षति पहुँचती है तथा उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूट जाती है।
उत्पादन अधिक होने पर मूल्य न्यून हो जाने से कृषक को लागत भी प्राप्त नहीं होती है। कृषि के साथ वृक्ष रोपित करने से उपयुक्त समय व बाजार मूल्य प्राप्त होने पर काटने व बेचने की सुविधा है। इसके साथ ही फसल के साथ रोपित वृक्ष प्राकृतिक आपदा को झेलते हुए कृषक के लिए निवेश व बीमा जैसे लाभकारी सिद्ध होते हुए कृषक की आवश्यकता.यथा शादी जैसे पारिवारिक उत्सवों. पर धन उपलब्ध करवाते हैं। कृषि वानिकी को अपनाकर कृषक खेती में विविधता लाकर अनाज के साथ ही जलौनी लकड़ी, कृषि औजारों की लकड़ी, पशुओं के लिए चारा आदि निवास के समीप खेतों से प्राप्त कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ ही अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर सकते हैं। ईंधन के रूप में प्रयुक्त किए जाने वाले गोबर को जलाने से बचा कर खाद के रूप में प्रयुक्त किये जाने से कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ ही रासायनिक ऊर्वरक में व्यय होने वाली धनराशि की बचत कर सकते हैं। वृक्षावरण में वृद्धि कर भूमि एवं जल संरक्षण व पर्यावरण संतुलन स्थापित करने के साथ ग्रामीण आंचल में उद्यमियों को प्रोत्साहन तथा वन आधारित लघु व कुटीर उद्योग की अर्थव्यवस्था को सशक्त किया जा सकता है। एक प्रगतिशील के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

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