डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की नदियाँ आज सिर्फ बहती हुई जलधाराएँ नहीं रहीं, बल्कि वे पहाड़ों की पीड़ा और मनुष्य की लापरवाही की मूक गवाह बन चुकी हैं। रेत, बजरी और पत्थरों की अंधाधुंध लूट ने इन नदियों को भीतर से खोखला कर दिया है। जो नदियाँ कभी जीवन देती थीं, आज वही विनाश का कारण बनती जा रही हैं, और इसके पीछे प्रकृति नहीं, मानव हस्तक्षेप है।
अवैध खनन के कारण नदी तल को बेरहमी से खोदा जा रहा है। भारी मशीनें नदियों की प्राकृतिक संरचना को तोड़ रही हैं, जिससे जलधाराओं की दिशा बदल रही है। नतीजा यह है कि नदी किनारे बसे गाँव कटाव की चपेट में हैं, खेत बह रहे हैं और घरों की नींव कमजोर हो रही है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोगों की जान और आजीविका से जुड़ा सवाल बन चुका है।
2013 की केदारनाथ आपदा ने पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ के खतरनाक परिणाम साफ दिखा दिए थे। 2021 की ऋषिगंगा त्रासदी ने चेताया कि संतुलन टूटने पर प्रकृति कितना विनाशकारी रूप ले सकती है। 2023 में जोशीमठ का धंसना इसी असंतुलन की अगली कड़ी था। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित खनन नदियों के बहाव को अस्थिर करता है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएँ और अधिक घातक हो जाती हैं।
खनन से बने गहरे गड्ढे बाढ़ के समय पानी को आबादी की ओर मोड़ देते हैं। नदियों की स्वाभाविक शक्ति खत्म होने से वे अपने रास्ते तोड़ने लगती हैं। इसका असर खेती, पशुपालन और पर्यटन पर साफ दिख रहा है। जैव विविधता नष्ट हो रही है, मछलियाँ और प्रवासी पक्षी अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब प्रशासन की निगरानी में कैसे हो रहा है? रात के अंधेरे में चलती मशीनें दिन के उजाले में व्यवस्था की कमजोरी उजागर करती हैं। जहाँ रोक होनी चाहिए, वहाँ मौन दिखाई देता है। जहाँ सख़्ती ज़रूरी है, वहाँ ढील दी जा रही है। अदालतों के आदेश और नियम काग़ज़ों तक सीमित न रह जाएँ, यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है।
नदियों को बचाने के लिए स्थानीय समुदायों को संरक्षण का भागीदार बनाना होगा। तकनीक के माध्यम से निगरानी, पारदर्शिता और सख़्त कार्रवाई ही समाधान है। विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। नदियाँ केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवित सभ्यताएँ हैं। क्योंकि नदियाँ बचेंगी तभी पहाड़, खेत और आने वाली पीढ़ियाँ सुरक्षित रहेंगी।
अब फैसला हमें करना है,
खनन या भविष्य? लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।











