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बीमारियों से निजात दिलाने में कारगर सेमल

09/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
जिस राज्य ने देश को चिपको आंदोलन दिया और जहां सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट एवं गौरा देवी जैसे महान पर्यावरण विद पैदा हुए उसी राज्य उत्तराखंड में एक शख्स अपने जीवनकाल में 50 लाख से अधिक पेड़ लगाने के बावजूद हमेशा गुमनामी में जीता रहा। इस शख्स का नाम था विश्वेश्वर दत्त सकलानी जिन्हें वृक्ष मानव कहा जाता था और 1986 में जिन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सकलानी के लिये वृक्ष ही जीवन थे। वृक्ष उनके मित्र थे और पहला प्यार भी, इसलिए वृद्धावस्था में आंखों की रोशनी चले जाने के बाद भी वह वृक्षों से जुड़े रहे। विश्वेश्वर दत्त का जन्म टिहरी जिले की सकलाना पट्टी के पुजार गांव में दो जून 1922 को हुआ था। उनके बड़े भाई टिहरी जिले के क्रान्तिकारी अमर शहीद नागेन्द्र दत्त सकलानी थे, जो 1948 में राजशाही के खिलाफ चले आन्दोलन में शहीद हो गये थे। विश्वेश्वर दत्त ने अपने दादाजी से प्रकृति को सुंदर और हराभरा रखने के लिए पेड़ लगाने के महत्व को समझा और आठ साल की उम्र में पहला पेड़ लगाया, लेकिन 1948 में बड़े भाई और 1956 में पहली पत्नी की मौत के बाद वह दीन दुनिया से इस कदर विमुख हो गए कि उन्होंने वृक्षारोपण को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना दिया। उन्होंने पेड़ों से दोस्ती की जो डोर बांधी उसे इस साल 96 साल की उम्र में देहत्याग करने तक पूरे मन प्राण से निभाया। वन विभाग और एक निजी संस्था ने हालांकि 2004 में ही यह निष्कर्ष निकाल दिया था कि विश्वेश्वर दत्त ने अपने जीवनकाल में 50 लाख से अधिक पेड़ लगाये। विश्वेश्वर दत्त ने इस तरह से औसतन एक साल में 70 से 80 हजार पेड़ लगाये और टिहरी गढ़वाल की बंजर पड़ी सकलाना घाटी को हरे भरे जंगल में बदला। विश्वेश्वर दत्त का आदर्श वाक्य था,”वृक्ष मेरे माता-पिता, वृक्ष मेरी संतान, वृक्ष मेरे संगी साथी।” इसके प्रति उन्होंने हमेशा ईमानदारी, प्रतिबद्धता, जुनून और समर्पण दिखाया और टिहरी जिले की सकलाना घाटी की तस्वीर बदल दी। यह उनका जुनून ही था कि अपनी बेटी के विवाह में कन्यादान के समय भी वह वृक्षारोपण करने चले गये थे। कहते हैं कि उन्होंने बाद में सभी बारातियों से भी पेड़ लगवाये। सकलाना घाटी का अधिकतर इलाका करीब 60- 70 साल पहले बंजर था। विश्वेश्वर दत्त ने धीरे धीरे बांज, बुरांश, सेमल, भीमल और देवदार के पौधे लगाने शुरू किये। शुरू -शुरू में ग्रामीणों ने इसका काफी विरोध किया और यहां तक कि उनको पीटा भी लेकिन धरती मां के इस लाल ने अपना जुनून नही छोडा। इसी का परिणाम है आज करीब 1200 हेक्टेयर से भी अधिक क्षेत्रफल में उनके लगाये गये पेड़ पूरी शान से सीना ताने खड़े हैं। यह शाश्वत सत्य है कि जहां पेड़ होते हैं वहां पानी होता है और विश्वेश्वर दत्त के प्रयासों से सूखते जल स्रोतों को भी नया जीवन मिला। इस महान कार्य के लिये 19 नवंबर 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विश्वेश्वर दत्त जी को इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र पुरस्कार से सम्मानित किया था। उम्र बढ़ने के साथ उनकी नजर कमजोर हो गयी। चिकित्सकों ने उन्हें धूल मिट्टी से दूर रहने के लिये कहा लेकिन विश्वेश्वर दत्त को यह मंजूर नहीं था और आखिर में 2007 में उनके आंखों की रोशनी चली गयी। इस महान विभूति ने 17 जनवरी 2019 को धरती को हमेशा के लिये अलविदा कह दिया लेकिन अपने पीछे वह सदियों तक आने वाली नस्लों को प्रेरणा देते रहने वाली निशानी छोड़ गये। अफसोस यही है कि उनका जीवन हमेशा गुमनामी में बीता और उनके महान कार्य को कभी वह पहचान नहीं मिली जिसके वह हकदार थे। सेमल का वानस्पतिक नाम बॉम्बैक्स सेइबा है. हिंदी में इसे सेमल बोला जाता है. वहीं, अंग्रेजी में सिल्क कॉटन ट्री के नाम से जाना जाता है और संस्कृत में इसे शाल्मली कहा जाता है. सेमल के पेड़ 60 मीटर तक की ऊंचाई तक पहुंचने वाला पेड़ है. इस पर फूल आने के बाद पेड़ बहुत ही आकर्षक लगता है. लेकिन अब यह पेड़ बहुत ही कम देखने को मिलता है. यदि सेमल का संरक्षण नहीं किया गया तो बहुत ही जल्द यह विलुप्त हो जाएगा. सेमल के पेड़ को साइलेंट डाक्टर कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। इसके फूल, फल, छाल आदि कई बीमारियों से निजात दिलाने में कारगर होते हैं। सेमल महिलाओं के लिए तो किसी वरदान से कम नहीं होता है। इसके पत्ते रक्तशोधन का बेहतर जरिया होते हैं, जबकि जड़ को ल्यूकोरिया की बेहतर औषधि माना गया है। संस्कृत में सेमल वृक्ष का नाम ‘शाल्मली’ है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘बामवेक्स सेइबा’ है, जबकि सामान्य रूप से इसे अंग्रेज़ी में ‘काँटन ट्री’ के नाम से भी पुकारा जाता है। इसका यह नाम सेमल के सूखे फलों के अंदर पाए जाने वाले उन बेहद मुलायम रेशों के कारण पड़ा है, जो दिखने में कपास या रूई की तरह होते हैं। इस उष्णकटिबंधीय वृक्ष का सीधा उर्ध्वाधर तना होता है। इसकी पत्तियाँ डेशिडुअस होतीं हैं। इसके लाल पुष्प की पाँच पंखुड़ियाँ होतीं हैं। ये वसंत ऋतु के पहले ही आ जातीं हैं। इसका फल एक कैपसूल जैसा होता है। फल पकने पर श्वेत रंग के रेशे, कुछ कुछ कपास की तरह के निकालते हैं। इसके तने पर एक इंच तक के मजबूत कांटे भरे होते हैं। सेमल की लकड़ी इमारती काम के लिए प्रयोग नहीं होती।सेमल वृक्ष पाँच सौ मीटर की ऊँचाई से लेकर पन्द्रह सौ मीटर की ऊँचाई तक होता है। इसका पेड़ काफ़ी बड़ा होता है। अप्रैल के माह में इस पर फूल निकलते है। इनका उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। फूल निकलने के बाद इस पर जो फल लगता है, वह केले के आकार का होता है। इसका उपयोग कच्चा व सूखाकर सब्जी के रूप में किया जाता है। इसके फूलों की बाज़ार में भारी माँग है। फल के पकने पर जो बीज निकलते हैं, उन बीजों से रूई निकलती है, जो मुलायम व सफ़ेद होती है। इस रूई का प्रयोग कई कामों में किया जाता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि सेमल का उपयोग लोग पहले तो करते थे, लेकिन उस समय इसे व्यावसायिक रूप में प्रयोग नहीं किया जाता था। सेमल से कुछ समय के लिए लोगों को रोजगार भी मिल जाता है। इसके फूल बाज़ार में 15 से 20 रुपये कि.ग्रा. तक बिकते हैं। इसके अतिरिक्त फल भी 10 से 15 रुपये और बीज तो 50 से 70 रुपये कि.ग्रा. तक आसानी से बेचे जा सकते हैं। सेमल वृक्ष से व्यवसाय करने वाले लोग एक सीजन में तीस से चालीस हज़ार रुपया तक कमा लेते हैं। सेमल केवल सब्जी तक सीमित नहीं है, उसका औषधीय उपयोग भी है, जिस कारण इसकी बड़े बाज़ारों में भारी माँग है  सेमल के फल के अंदर रुई होती है. यह रुई फल के सूखने के बाद अधिक मात्रा में फल के अंदर पाया जाता है. इसे निकाल कर तकिया, गद्दे और रजाई भी बनाई जा सकती है. कहते हैं कि सेमल के रुई से बने तकिए पर सोने से सिर का दर्द पूरी तरह खत्म हो जाता है. इस भव्य वृक्ष के फूल फरवरी के मध्य से मार्च के अंत तक अपने चरम पर होते हैं। यह वृक्ष सर्दियों की शुरुआत में अपने पत्ते गिरा देता है, लेकिन जनवरी तक इसकी नंगी शाखाएँ अनगिनत संगमरमर के आकार की हरी कलियों से ढक जाती हैं, जिन पर बेर के रंग की चमक होती है।फरवरी में, जब मौसम थोड़ा गर्म हो जाता है, तो पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से पर चमकीले लाल फूल खिल उठते हैं।यह वृक्ष मार्च के महीने में अपने सर्वोत्तम रूप में होता है। इसके फूल गहरे लाल से लेकर नारंगी-लाल और यहाँ तक कि आड़ू जैसे दुर्लभ रंग के भी होते हैं। पूरी तरह खिलने पर वृक्ष लाल रंग की एक आकर्षक छटा प्रस्तुत करता है।बड़े प्याले के आकार के इस फूल में पाँच मोटी, चमकदार पंखुड़ियाँ होती हैं जो पीछे की ओर मुड़ी होती हैं। फूल के गहरे केंद्र में एक साथ 60 से अधिक पुंकेसर होते हैं। ये पाँच असमान गुच्छों के एक वृत्त में उगते हैं, जिनके केंद्र में एक गुच्छा होता है। आधार पर पीले रंग के इन पुंकेसरों के लाल सिरे फूल में मिल जाते हैं।सेमल के पेड़ के फूल के खोखले भाग में रस जमा होता है, जो इसे पक्षियों और मधुमक्खियों का पसंदीदा बनाता है। वैसे तो सेमल के पेड़ स्वत: ही जंगलों में जगह-जगह पनप जाते हैं, लेकिन इन्हें नदियों के आसपास आसानी से देखा जा सकता है। अधिक तापमान वाले इलाकों में सेमल का पौधा लगाया जाता है। अप्रैल में इस पर फूल खिलते हैं। इसके बाद इस पर जो फल लगता है, वह केले के आकार का होता है। सेमल का पौधा लगाने के लिए करीब दो फीट गहरा गड्ढा खोदें और उसमें गोबर की खाद के साथ मिट्टी मिलाकर भरें। इसमें पौधा लगाकर पानी का हल्का छिड़काव करें। शुरुआत के दो हफ्ते तक नियमित सिंचाई करें।उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सेमल आय का जरिया बन गया है। ग्रामीण सेमल से एक सीजन में 30 से 40 हजार रुपये तक कमा लेते हैं। सेमल की सब्जी व अचार बनाया जाता है, जिस कारण यह बाजार में आसानी से बिक जाता है। आयुर्वेदिक औषधि निर्माता भी इसे खरीदते हैं।  यह पेड़ जैव विविधता के साथ-साथ विरासत और अपनी विशालता के लिए उत्तराखंड के साथ-साथ देश दुनिया में भी जाना जाता है. सेमल का यह महावृक्ष कई पक्षियों, कीटों, चमगादड़ों और अन्य जीवों के लिए एक महत्वपूर्ण वास स्थल भी है. जिस प्रकार ऐतिहासिक इमारतों और मंदिरों को संरक्षित करते हैं. वैसे ही प्राचीन वृक्ष भी इतिहास के साक्षी होते हैं. सेमल एक पेड़ है जो सबसे अधिक उत्तराखंड में पाया जाता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि इसकी मौजूदगी देश के अधिकांशतः भागों में भी है. सेमल का छाल, फूल, जड़ और फल कई बीमारियों से निजात दिलाने में कारगर होते हैं.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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