
स्वामी मन्मथन के जन्म दिवस पर:- जन्म 18 जून 1934 मृत्यु 6 अप्रैल 1990
सगर से हिमालय का महायात्री स्वामी मन्मथन
सहयोगः- महेशा नंद जुयाल
सुदूर समुद्र के किनारे केरल के एक गांव में दिनाॅक 18 जून 1934 को मन्मथन मेनन का जन्म हुआ था। स्वामी विवेका नंद , महर्षि अरविंद एवं रवींद्रनाथ टैगोर की परम्परा में नर नारायण की पूजा सएंव सत्य की खोज में ज्ञान प्राप्त करने के लिए बचपन में ही इन्होंने हिमालय की ओर रूख किया और यहीं रह बस कर सन्यास ले कर स्वामी मन्मथन के रूप् में अवतरित हुये और अपनी त्वरित क्रांतिकारी छवि एवं कार्याें के साथ गाॅधी जी की तरह 6 अप्रैल 1990 में हत्या कर दी गयी।
प्रारम्भ में केरल से चलकर पश्चिम बंगाल में स्वामी विवेकानंद जी से प्रभावित हुये। पांडुचेरी में महर्षि अरविंद के दर्षन को आत्मसात किया फिर नागालैंड पहुचे वापस मेनन गंगा और हिमालय की खोज में हरिद्वार पहुॅच गये। फिर बिजनैार के विधुर कुटीर पहुंचे जहां एक आंदोलनकारी बन कर मनमंथन अभर कर सामने आये। 13 किमी पैदल जुलूस निकाल कर जिलाधिकारी बिजनौर को विधुरों को अन्न देने के लिए विवश किया। दैनिक बिजनौर टाइम्स के संस्थापक संपादक बाबूसिंह चैहान के अखबार में खबर छापने पर चैहान को भारत सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया इस दौरान उनके परिवार की देख रेख का जिम्मा मंमथन ने लिया था।
1962 में भारत चीन युद्ध के कारण देश में अन्न का संकट पैदा हो गया। गरीबों में अकाल को देख कर स्वामी मंमथन ने अन्न त्याग कर दिया था।बच्चों के भविष्य को ले कर चिंतित वह अपने को जवाहर लाल नेहरू के सबसे निकट पाते थे। नेहरू की मृत्यु से व्यथित हो कर उन्होंने नेहरू गोज टू हैवन नाम से एक 15-20 पेज की पुस्तक लिखी उससे उन्हें 5000 रूपये प्राप्त हुए जिसे उन्होंने बच्चों की पढाई में दान दे दिये। उनके सुधारवादी कार्याें को प्रभावित हो कर कुछ लोग परेशान होने लगे और कार्याें में बाधायें डालने लगे जिस कारण उन्होेंने बिजनौर छोड़ दिया। ऋषिकेश के पास गूलरदोगी पहुंचकर उन्होंने सन्यास ले लिया और मंमथन मेनन से स्वामी मन्मथन बन गये। गूलर दोगी में जूनियर हाई स्कूल की दुर्दशा देख कर उन्होंने अपनी आंदोलनकारी लय में स्कूल को हाई स्कूल में उच्चीकृत कर दिया और बच्चों को स्वयं ही पढा़ने लगे। उनके अनुशासन से दहशत में आये प्रबंधकों से मतभेद ने उन्हें यहां भी नहीं रूकने दिया। सन् 1966 से 69 तक चंद्रबदनी में पशुवलि के विरूद्ध आंदोलनरत रह कर उन्होंने सफलता हासिल की।सन् 1971 में बंठा आंदोलन चलाकर उन्होंने बग्वान -हिंडोलाखाल पम्पिंग योजना का निर्माण करवाया।सन् 1972 में उस दौर के युवा प्रखर तुर्क सामाजिक कार्यकर्ता भुवन नौटियाल द्वारा पहाडा़ें में बिक रही टिंचरी के विरूद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन में भी स्वामी मन्मथन और पर्यावरण विद श्री चंडीप्रसाद भट्ट के सहयोग से नौटियाल को सफलता मिली। इसी बीच गढ़वाल विश्व विद्यालय के कर्णाधार स्वामी जी बने। एतिहासिक आंदोलन की कारण ही आज हेमवती नंदन गढवाल वि विद्यालय को 47 वर्ष पूरे होने को हैं।
गढ़वाल वि विद्यालय की स्थापना के बाद स्वामी जी के प्रस्ताव पर गढ़वाल वि विद्यालय संघर्ष समिति को हदिद्वार -कर्णप्रयाग रेल लाईन संघर्ष समिति में परिवर्तित किया गया। प्रख्यात पत्रकार रामचंद्र चंदोला को उत्तरी रेलवे मुख्यालय इलाहाबाद भेजा गया जहां संग्रहालय के निदेशक सतीश चंद्र काला के सहयोग से प्रथम विश्व युद्ध के गढ़वाली सैनिकां की स्मृति में बनायी जाने वाली वार मेमोरियल रेल लाईन हरिद्वार ‘- कर्णप्रयाग के सन् 1719 से 1924 तक के सर्वे के दस्तावेजों की प्रति प्राप्त की गई इसी आधार पर आंदोलन कर नई दिल्ली में भारत सरकार व रेल मंत्रालय में निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए दबाव डाला गया।
प्रथम विश्व युद्ध कें 60 वर्ष बाद भारत के प्रथम विक्टोरिया क्रास दरवान सिंह नेगी के षिक्षा व रेल लाइन के सपनों को पंख लगाने का भगीरथ प्रयास स्वामी मन्मथन ने विश्व विद्यालय की स्थापना एवं रेल लाइन निर्माण की धूल खाती फाइलों को पुर्नजीवित किया। इसी बीच स्वामी जी जो यहां के राजनेताओं के आंखों की किरकिरी बने थे उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र की सबसे बड़ी टी स्टेट बेनी ताल 40 हजार नाली और सिलकोट 25 हजार नाली सहित 155 टी स्टेटों के राष्ट्रीयकरण की मांग को लेकर आंदोलन शूरू कर दिया देश में इसी बीच आपात काल लगा और स्वामी जी को किसी झूठे मुकदमें में मीसी में जेल में बन्द कर दिया गया। जनपद चमोली के वरिष्ठ अधिवक्ता हरीष पुजारी ने निःशुल्क पैरवी की। टी स्टेट आंदोलन के दौरान और जेल से रिहा होने के पश्चात स्वामी जी का प्रवास गैरसैंण ब्लाॅक के पज्याणा गांव में रहा यहां पर रह कर उन्होंने सात दिनों तक श्रृमद भागवत कराया और यहां रह कर स्थानीय लोगों के सामाजिक आर्थिक जीवन का अध्ययन किया और उनका फोकस पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं और बच्चों की दयनीय दशा की ओर हो गया।
आपात काल की समाप्ति पर जेल से रिहा होने पर स्वामी जी एक क्रांतिकारी के स्थान पर एक सृजनात्मक आंदोलन की और अग्रसर हुए बच्चों और महिलाओं के कल्याण पर उन्होंने अपना ध्यान केंद्रित किया और जिसके लिए उन्होंने अनेकों स्थान भी तलाश किये स्थान की तलाश में वह भुवन नौटियाल जी के साथ कर्णप्रयाग से नौटी तक पैदल ही गये तब तक वहां सड़क नहीं पहुॅची थी । आखिरकार चंद्रबदनी मे चरणों में अंजनीसैंण में मेजर हरिषंकर जोशी ने अपनी भूमि इस शर्त के साथ दान दी कि संस्था का नाम भगवती भुवनेश्वरी देवी जो चंद्रबदनी में स्थित है के नाम पर रखा जाय और दिनाॅक 27 दिसंबर 1977 को श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम अंजनीसैंण टीहरी गढ़वाल के नाम से एक स्वयं सेवी संस्था की विधिवत् स्थापना हुई।
यह संस्था प्रदेश की अग्रण्ीा संस्था के रूप् में समर्पित भाव से सात जनपदों टीहरी , उत्तरकाशी , देहरादून , चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर व हरिद्वार में कार्यरत है।संस्था के सचिव ज्ञानसिंह रावत के प्रभावी मार्गदर्शन में संस्था स्वामी जी के सपनों को साकार करने में दिनरात परिश्रम कर जन हित के कार्यों में जुटी है। गैरसैंण में भी संस्था के पास एक विस्तृत परिसर है इसी के पास सिलकोट टी स्टेट के पास पज्याणा गांव स्वामी जी की प्रवास स्थली व कार्य क्षेत्र रहा है यहां रह कर गैरसैंण ब्लाॅक के निर्माता और पूर्व जिला परिषद के मेम्बर रूद्रीदत जुयाल व सामाजिक कार्यकर्ता पूर्व सरपंच बच्चीराम जुयाल जी का भी उन्हें टी स्टेट आंदोलन और स्थानी सामजिक अध्ययन में भरपूर सहयोग मिला। इसी गांव के पूर्व जिला पंचायत सदस्य वर्तमान पत्रकार महेश जुयाल की हाई स्कूल तक की शिक्षा स्वामी जी के माध्यम से बिजनौर टाइम्स के सम्पादक बाबूसिंह चैहान के सानिध्य में हुई।
गैरसैंण ग्रीष्म कालीन राजधानी घोषित होने से पूर्व विधान सभा सत्र , कैबिनेट बैठकों के दौरान संस्था गैरसैंण परिसर में बेस कैम्प के रूप में सेवायें दे चुकी हैं। परियोजना प्रबंधक गिरीश डिमरी की टीम सामाजिक सरोकारों के लिए संस्था की सेवाये बखूबी दे रहे हैं। बिगत दो वर्ष पूर्व प्रख्यात साहित्यकार और अधिवक्ता कृष्णा नंन्द मैठाणी , जगदम्बा रतूड़ी , डा. उमा मैठाणी , डा. वीरेंद्र पैन्यूली और भुवन नौटियाल को सम्मानित किया गया था।
स्वामी जी के 81 जन्म तिथि पर प्रख्यात साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता भुवन नौटियाल श्रृद्धांजली अर्पित करते कहना है कि समुद्र मंथन से अमृत के रूप में उत्पन्न स्वामी मन्मथन हिमालय गढ़वाल में आकर सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बन कर आये । केरल से तो अनादि काल से बदरी नाथ में मुख्य पुजारी के रूप् में रावल ब्राह्मण भी आते हैं। स्वामी जी को मंदिरो की पूजा में अधिक रूचि नहीं थी वह नर की पूजा को ही नारायण पूजा मानते थे। लेकिन हम गढ़वाल वासियों ने अभी तक स्वामी जी की स्मृति चिरस्थायी बनाने के लिए कोई एतिहासिक कार्य नहीं किया है। गढ़वाल विश्व विद्यालय में संग्रहालय, श्रीनगर रेलवे स्टेशन का नाम, श्रीदेव संुमन के किसी कैम्पस का नाम , गैरसैंण राजकीय महा विद्यालय और एन आई टी श्रीनगर को नाम स्वामी मन्मथन जी के नाम पर रखने के लिए सरकारों , स्थानीय जनमानस को विचार करना चाहिए अन्यथा कृतज्ञ होने का दाग हमेशा लगता ही रहेगा।
स्वामी जी का कहना था:- हमारी क्रान्ति विचारों पर निर्भर करती है और विचारों की कभी हत्या नहीं की जा सकती।-भुवन नौटियाल ।
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