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मक्का का उत्पादन बढ़ाने का प्रयास

18/06/20
in उत्तराखंड, जॉब
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मक्का देश में अनाज उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मक्के को मोटे आनाज की श्रेणी में रखा जाता है। मक्का की खेती देश में लगभग सभी प्रदेशों में किया जाता है। मक्का की खेती वर्ष में दो बार होने के कारण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मक्का सभी प्रदेशों में उत्पादन होने के बाबजूद भी सामान किस्म के बीज का उपयोग नहीं किया जाता है। अलग-अलग राज्यों में जलवायु एक सामान नहीं रहने के कारण मक्के के किस्म में अलग-अलग रहता है। भारतीय मक्का अनुसन्धान केंद्र के द्वारा वर्ष 2000 से लेकर 2017 तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लिए लगभग 100 किस्में विकसित की गई हैं।
भारत में मक्का के तहत सिर्फ 15 प्रतिशत कृषि क्षेत्र ही सिंचित है। इसलिये मक्के की फसल के लिये पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ देना आवश्यक है, जिससे मक्के का उत्पादन, उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार किया जा सके मक्के की फसल खरीफ व रबी दोनों मौसमों में उगाई जाती है। मक्का ऐसा अनाज है, जिस का इस्तेमाल खासतौर से फास्टफूड व रोटी बनाने के लिए होता है। मक्के का इस्तेमाल सारी दुनिया में होता है। मक्के की खूबियों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने अधिक प्रोटीन वाले मक्के को ईजाद किया है। पूरी दुनिया में मक्के की खेती होती है। भारत में अनाजों की पैदावार में मक्के का तीसरा स्थान है। भारत में हर साल 8.17 मिलियन हेक्टेयर रकबे में लगभग 19.72 मिलियन टन मक्के का उत्पादन होता है, जो कि दुनिया के कुल उत्पादन का 2 फीसदी है।
कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड व राजस्थान मुख्य है। मक्का खरीफ ऋतु में उगायी जाने वाली मुख्य अनाज की फसल है। इसमे प्रोटीन तथा कार्बोहाईड्रेटस मुख्य रूप से पाये जाते हैं। जैविक बाजार में मक्के के दाने की अपेक्षा इसके बने आटे की अधिक मांग है तथा स्थानीय बाजारों में भुट्टे एवं पॉपकार्न के रूप में भी इसकर अच्छा बाजार उपलब्ध है। दवा, कास्मेटिक, गोद, वस्त्र, पेपर और एल्कोहल इंडस्ट्री में भी इसका प्रयोग होता है। मक्के की बहुउपयोगिता इसे बाकी फसलों से बेहतर बनाती है।
इसकी खूबियां यही खत्म नहीं होतीं। इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेड, शुगर, वसा, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल मिलता है। आटा, धोकला, बेबी कार्न और पाप कार्न के रूप में तो ये खाया ही जाता है। किसी न किसी रूप में ये हर सूप का अनिवार्य हिस्सा है। इस लिहाज से मक्का की खेती कुपोषण के खिलाफ जंग साबित हो सकती है। यही वजह है कि इसे अनाजों की रानी कहा गया है। वर्तमान में उत्तराखण्ड में लगभग 32 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में मक्के का उत्पादन 13.54 कुन्तल प्रति हैक्टेयर की दर से किया जा रहा है। रुद्रपुर में वर्ष 2003 में सिडकुल की स्थापना के बाद रुद्रपुर के उद्योगों में प्रतिवर्ष करीब छह लाख मीट्रिक टन मक्के की जरूरत है। लेकिन रुद्रपुर में मक्के की उपज बेहद कम होने के कारण उद्योगपति मालगाडिय़ों के माध्यम से मध्यप्रदेश और बिहार से मक्के मंगवाते हैं। जिले में मक्के का उत्पादन बढने से किसानों को भी अत्याधिक लाभ मिल सकता है। कृषि विभाग के मुताबिक, मक्के की बुवाई नौ किग्रा प्रति एकड़ के हिसाब से की जाती है। प्रति एकड़ करीब 35 क्विंटल मक्के का उत्पादन होता है। बाजार में यह करीब 1500 एकड़ की दर से बिकता है। ऐसे में किसानों को मक्के की खेती से काफी फायदा होगा।
अगेती धान पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरनाक है। इससे धान में कई रोग लगते हैं, जो फसल चक्र के जरिये मुख्य सफल तक पहुंचते हैं। किसानों को अगेती धान से निजात दिलाने के लिए मक्के की खेती का विकल्प दिया जा रहा है। मक्के की खेती से किसानों को धान की अपेक्षा अधिक आय प्राप्त होगी। साथ ही गिरते भूजल की समस्या से भी निजात मिल सकेगी। 1962 में इन इकाइयों की उत्पत्ति हिमालयी क्षेत्र में सतत और पर्यावरण के अनुकूल उच्च उन्नतांश वाली कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए निर्धारित अधिदेश के साथ की गई। 60 के दशक मेंए कृषि अनुसंधान इकाई ;एआरयूद्ध की स्थापना हवलबाग में प्रौद्योगिकियों इकाई के साथ अल्मोड़ा के सितोली में की गई थी। बाद में एआरयू को बंद कर दिया गया और 90 के दशक के दौरान पिथौरागढ़ में अपने मुख्यालय के साथ पूर्ण रक्षा कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला डीएआरएल अस्तित्व में आई।
पिछले कुछ वर्षों में डीएआरएल में सतत और सावधानीपूर्वक अनुसंधान और विकास के परिणामस्वरूप उत्तराखंड के मध्य ऊन्नतांश वाले स्थानों के लिए उपयुक्त सब्जी किस्मों का विमोचन किया गया है। इन क्षेत्रों में ताजा खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की खोज में पहाड़ी पर्यावरण के लिए सबसे उपयुक्त संरक्षित और कम मृदा में खेती के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियां विकसित की गई थीं। 70 के दशक के दौरान उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के लिए मक्का की अधिक उपज देने वाली किस्मों को विकसित करने के लिए प्रारंभिक अनुसंधान और विकास शुरू किया गया था। अवसर और दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों के ग्रामीण समुदाय के सतत विकास और आजीविका बढ़ाने के लिए मछली पालनए बकरी पालनए मुर्गी पालनए शूकर पालनए पशु पालन आदि जैसे संघटकों के साथ उत्तरकाशी के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विविधीकृत कृषि प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय और अनुकूलित करने के प्रयास भी किए गए। सशस्त्र बलों को ताजा सब्जियों और ब्रोइलर चिकन के संबंध में रसद की आपूर्ति का समाधान करने के लिए 36 क्षेत्रों ;हिमाचल प्रदेशद्ध के ठंडे रेगिस्तान में सब्जी की खेती और ब्रोइलर उत्पादन पर अनुसंधान और विकास कार्य शुरू किया गया था। बाड़मेर ;राजस्थानद्ध के अरबा में वर्ष 1998 के दौरान विस्तारित ईडी संयंत्र से छोड़े गए खारे पानी का उपयोग करने वाले लवण सहनीय सब्जी की खेती के आवरण के लिए अनुसंधान और विकास कार्य शुरू किया गया था। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में 60.70 प्रतिशत भोजन का उत्पादन यहां के छोटे किसानों द्वारा किया जाता हैए जो पारंपरिक खेती का पालन करते हैं कोरोना वायरस के प्रकोप से किसानों को बचाने के साथ ही मृदा परीक्षणए उन्नत बीज और पानी के सही उपयोग से धान की उत्पादकता छह टन और मक्का की उत्पादकता आठ टन प्रति हेक्टेयर करने के प्रयास तेज कर दिए हैं।
देश में कृषि क्षेत्र में करीब 200 स्टार्टअप हैं जिनकी समस्यायों का समाधान नहीं होने पर बेरोजगारी बढ़ेगी । कृषि मंत्री ने जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनिश्चितता के मद्देनजर कम पानी में अधिक से अधिक फसलों के उत्पादन के लिए शोध तथा नई प्रौद्योगिकी के विकास पर जोर दिया है। कोरोना वायरस के बचाव के लिए कृषि मंत्रालय अधिक से अधिक संचार माध्यमों के प्रयोग तथा सामाजिक दूरी बनाए रखने के साथ ही मास्क के प्रयोग और स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है । कृषि के क्षेत्र में काम कर रहे स्व सहायता समूह कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से इस क्षेत्र में जागरुकता अभियान भी चला रहे हैं। किसानों की आय 2022 तक क्या दोगुनी हो पाएगीघ् यह सवाल बार.बार पूछा जा रहा है। फिलहाल तो उत्तराखंड के किसानों की दशा बद से बदतर होती जा रही है। खेती लाभ का सौदा नहीं रही। इसलिए, किसान खेती को अलविदा कह रहे हैं।
उत्तराखंड की विभिन सरकारी एजेंसियों के आंकड़ों और तथ्यों पर नजर डालेंए तो हालात बेहद खराब दिख रहे हैं। उत्तराखंड में 2017.18 में राज्य सकल घरेलू उत्पाद ;एसजीडीपीद्ध में खेतीबाड़ी का योगदान 9ण्92 फीसदी से कुछ ही ज्यादा था। जबकिए प्रदेश की 45 फीसदी आबादी खेती.किसानी पर निर्भर है। यह भी तथ्य है कि राज्य में सात लाख हेक्टेयर यानी सिर्फ 12 फीसदी जमीन पर खेती होती है। 65 फीसदी भूभाग वनों से घिरा है। चिंताजनक बात यह है कि राज्य निर्माण से लेकर अब तक एक लाख हेक्टेयर जमीन बंजर हो चुकी है। कुल किसानों में नब्बे फीसदी से भी अधिक छोटे व सीमांत किसान हैं। इनके पास वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। हाल ही में हुए अध्ययन से यह भी साफ हो गया है कि पहाड़ी जिलों में मिट्टी की उर्वरता लगातार कम हो रही है। इस कारण पहाड़ी इलाकों में उत्पादन व उत्पादकता पर विपरीत असर पड़ रहा है। यहां इकोनॉमिक्स ऑफ स्केल है ही नहीं। उत्पादन बेहद सीमित होता है और यह बाजार उन्मुख ही नहीं है। कुल फसल उत्पादन में गेहूं की हिस्सेदारी 32 फीसदी और धान की 22 फीसदी है। इनके अलावा गन्ना, मक्का, दाल.दलहन, आम, लीची, अमरूद, सेब, आलू, टमाटर, बींस, मटर, पत्ता गोभी और शिमला मिर्च है। लेकिन अस्सी फीसदी किसान सिर्फ अपने लिए उत्पादन करते हैं। इससे उनकी आय नहीं बढ़ पाती है। इसके साथ ही पर्वतीय इलाकों में पूंजी निर्माण की प्रक्रिया बेहद धीमी है। बात चाहे पोषक तत्वों की हो या उपयोगिता की। बेहतर उपज की बात करें या सहफसली खेती की और औद्योगिक प्रयोग की। हर मौसम रबी, खरीफ एवं जायद और हर तरह की भूमि में होने वाले मक्के का जवाब नहीं।

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