थराली से हरेंद्र बिष्ट।
तो क्या इस समस्या के निराकरण के बगैर ही उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों की आय दुगनी हो जाएगी? लगातार हो रहा पलायन रूक जाएगा? खेती आधारित रोजगार के नए-नए अवसर खुलेंगे आदि, सरकारी दावे धरातल पर उतर पाएंगे? यहां के किसानों, बेरोजगारों, महिलाओं को जो सपने दिखाए जा रहे हैं, वे सपने हकीकत में लगातार दूर होते जा रहे हैं। हालांकि राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के गांव की मिट्टी बेहद उपजाऊ है। यहां पर तमाम तरह की फसलों, फल, फूलों के साथ ही महेंगी से महंगी जडीबूटी का उत्पादन तो होता हैं। किन्तु तमाम तरह के जंगली जानवर एक झटके में किसानों की महिनों की मेहनत पर इस कदर पानी फेर देते हैं कि किसानों से कुछ भी कहते नहीं बन पाता है।

दरअसल सरकार के द्वारा कृषि क्षेत्र में किसानों की आय दुगनी करने के साथ ही इस राज्य के पहाड़ी जिलों के गांव से पलायन रोकने के लिए कृषि आधारित खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग, उद्यान विभाग, जड़ी बूटी, कृषि विज्ञान केन्द्रों के साथ ही कई अन्य विभागों को जिम्मेदार सौपी गई हैं। जोकि अपने संसाधनों के अनुरूप कार्य करते हुए उत्पादनों को बढ़ाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं और वैज्ञानिक पद्धति से कृषिकरण करने से उत्पादन बढ़ भी रहा है। परंतु पिछले दो.तीन दशकों से यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली सूअरों, हिरनों, बारहसिंगों सहित अन्य जानवरों के साथ ही बंदरों, लंगूरों की तादाद में तेजी के साथ भारी इजाफा हो जाने का खामियाजा यहां के किसानों को भुगतान पड़ रहा हैं।
किसान खेतों को खाद्.पानी कर इन में जुताई, बुवाई कर जरूरत के अनुरूप कड़ी मेहनत के साथ गुड़ाई, निराई करता है। यही नहीं फसलों की सुरक्षा को लेकर दिन तों छोड़िए रात रात जाग कर चौकीदारी करते हैं किन्तु गलती से भी थोड़ी सी चूक होने पर एक झटके में जंगली जानवर लहलहाती फसल को इस तरह से नष्ट कर देते हैं कि किसन परिवारों की महिनों की कड़ी मेहनत पर चंद समय में ही पानी फिर जाता हैं और किसान अपने इस दुखड़े को किसी के पास सुना तक नही पाता है। जंगली जानवरों के कारण ही पहाड़ी जिलों के किसानों की आय तों दुगनी नही हो पायी हैं उलटे तेजी के साथ खेत बंजर खेतों के रूप में तब्दील होते दिखाई पड़ रहे हैं। अकेल बात कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले पिंडर घाटी की जाएं तों यहां के 80 प्रतिशत से अधिक गांवों में तेजी के साथ जंगली जानवरों का खेतों पर आतंक बढ़ता जा रहा है। जिस कारण तेजी के साथ आबाद खेती बंजर में तब्दील होती जा रही है। और कृषि उत्पादन तेजी के साथ घट रहा है। किंतु इससे निपटने के लिए सरकार अब तक कोई भी कारगर योजना को धरातल पर नही उतार पाई है। जिससे आशंका जताई जा रही है कि जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक के चलते वह दिन दूर नहीं जब पिंडर घाटी के तीन ब्लाकों थराली, देवाल एवं नारायणबगड़ में बढ़ी तादाद में कृषि भूमि बंजर भूमि में तब्दील हो जाएगी और पलायन का ग्राफ घटने के बजाय बढ़ जाएगा।
इस संबंध में बद्रीनाथ वन प्रभाग गोपेश्वर के प्रभागीय वनाधिकारी सर्वेश कुमार दुबे का कहना हैं कि इस जिले में जंगली सूअरों के द्वारा फसलों को काफी नुकसान पहुंचाने के मामले सामने आ रहे हैं। इन्हें मारने के लिए वन विभाग के द्वारा लाइसेंसी बंदूकधारी पूर्व फौजियों एवं अन्य को मारने के लिए परमीशन दी जा रही हैं। जिन भी गांवों में जंगली सूअरों का आतंक अधिक हैं। उन गांवों के ग्राम प्रधान रेंज कार्यालयों में आवेदन दें सकते हैं इसके बाद लाईसेंसी बंदूकधारियों को एक माह तक के लिए सूअरों को परमीशन दी जा सकती है। बताया कि विगत वर्षों से राज्य सरकार के द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली सूअरों एवं तराई के क्षेत्रों में किसानों की खेती को भारी नुकसान पहुंचाने वाली नील गायों को परमिशन खुलेआम मारने की भारत सरकार से इजाजत मांगी गई थी। किन्तु भारत सरकार ने यह परमीशन तो नही दी। किन्तु नियंत्रित रूप से इन्हें मारने के लिए परमीशन देने की सहमति के बाद है, बन विभाग प्रति माह के अनुसार इजाजत दे रहा है। ग्रामीणों को इसके लिए आवेदन करना चाहिए।











