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औषधीय गुणों से भरपूर है तुलसी

19/08/19
in उत्तराखंड, देहरादून, हेल्थ
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डा.हरीश चंद्र अन्डोला
हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है। तुलसी के पौधे को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे से कई आध्यात्मिक बातें जुड़ी हैंं। भगवान विष्णु को तुसली बेहद प्रिय है। तुलसी के पत्तों के बिना भगवान विष्णु की पूजा में प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता है। इसके साथ.साथ तुलसी को सेहत के लिए भी वरदान माना जाता है। तुलसी में कई बीमारियों से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। तुलसी के पौधे का महत्व तुलसी की पत्तियां कुछ खास दिनों में नहीं तोड़नी चाहिए। चंद्रग्रहण, एकादशी और रविवार के दिन तुलसी की पत्तियां न तोड़ें। सूर्यास्त के बाद भी तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए। ऐसा करना अशुभ माना जाता है। राशि अनुसार जानें, प्रेम विवाह में सफलता के उपाय माना जाता है कि भगवान कृष्ण के भोग में और सत्यनारायण की कथा के प्रसाद में तुलसी का पत्ता जरूर रखना चाहिए। ऐसा नहीं करने से प्रसाद पूरा नहीं माना जाता। घर में तुलसी का पौधा होना शुभ होता है। इसके सामने रोज शाम को दीपक जलाने से घर में सुख.समृद्धि आती है। मान्यता है कि तुलसी होने से घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है। योगिनी एकादशी पर ऐसे करें पूजा तुलसी के पत्तों में ऐन्टीआक्सिडन्ट और ज़रूरी तेल होते हैं जो इजिनॉल, मेथिल इजिनॉल और कैरियोफ़ैलिन बनता है। ये सारे तत्व मिलकर इन्सुलिन जमा करने वाली और छोड़ने वाली कोशिकाओं को ठीक से काम करने में मदद करते हैं। इससे इन्सुलिन की संवेदनशीलता बढ़ती है। एक और फ़ायदा ये है कि पत्तियों में मौजूद ऐन्टीआक्सिडन्ट आक्सिडेटिव स्ट्रेस संबंधी कुप्रभावों को दूर करते हैं। नुस्खा शुगर लेवल को कम करने के लिए दो से तीन तुलसी के पत्ते खाली पेट लेंए या एक टेबलस्पून तुलसी के पत्ते का जूस लेंण् मधुमेह को नियंत्रण में करने के अन्य उपाय पटसन के बीज इनमें फाइबर सामग्री बहुल मात्रा में पाई जाती है जो पाचन में तो मदद करते ही हैं साथ ही फैट और शुगर के अवशोषण में भी सहायक होते हैं।
पटसन के बीज खाने से मधुमेह से ग्रसित मरीजों में शुगर की मात्रा 28 प्रतिशत तक कम होती है। ग्रीन टी में पॉलीफिनोल्स होते हैं जो एक मज़बूत एंटी.ऑक्सीडेंट और हाइपो.ग्लाइसेमिक तत्व हैं, इससे ब्लड शुगर को रिलीज़ करने में मदद मिलाती है और शरीर इन्सुलिन का सही तरह से इस्तेमाल कर पाता है। सेहत के लिए तुलसी के फायदे तुलसी दवा की तरह भी इस्तेमाल की जाती है। आपके घर के पीछे या घर में तुलसी होने से मच्छर और छोटे.छोटे कीड़े नहीं आते हैं। रोज तुलसी की पत्ती खाना सेहत के लिए अच्छा होता है। तुलसी में बीमारियों से लड़ने के गुण होते हैं। यह शरीर में बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है।. तुलसी की पत्तियां खाने से खून साफ रहता है। इससे त्वचा और बाल स्वस्थ रहते हैं। पांच प्रकार की तुलसी का अर्क निकालकर इसके मिश्रण का सेवन करने से कई समस्याओं से निजात पाई जा सकती है। एक ग्लास पानी में एक या दो बूंद अर्क मिलाकर इस मिश्रण को 1 लीटर पानी में डालकर रखें और कुछ देर बाद इसका सेवन करें। पीने के पानी में इसका प्रयोग कर रोगाणुओं से बचा जा सकता है।
पांच तुलसी का यह अर्क सैकड़ों रोगो में लाभदायक सिद्ध होता है। बुखार, फ्लू, स्वाइन फ्लू, डेंगू, सर्दी, खांसी, जुखाम, प्लेग, मलेरिया, जोड़ो का दर्द, मोटापा, ब्लड प्रेशर, शुगर, एलर्जी, पेट में कृमि, हेपेटाइटिस, जलन, मूत्र संबंधी रोग, गठिया, दमा, मरोड़, बवासीर, अतिसार, आंख दर्द, खुजली, सिर दर्द, पायरिया, नकसीर, फेफड़ों की सूजन, अल्सर, वीर्य की कमी, हार्ट ब्लोकेज आदि समस्याओं से एक साथ निजात दिलाने में सक्षम है ।
हिन्दू धर्म संस्कृति के चिर पुरातन ग्रंथ वेदों में भी तुलसी के गुणों एवं उसकी उपयोगिता का वर्णन मिलता है। अथर्ववेद ;1.24द्ध में वर्णन मिलता है . सरुपकृत त्वयोषधेसा सरुपमिद कृधि, श्यामा सरुप करणी पृथिव्यां अत्यदभुता। इदम् सुप्रसाधय पुना रुपाणि कल्पय॥अर्थात् . श्यामा तुलसी मानव के स्वरूप को बनाती है, शरीर के ऊपर के सफेद धब्बे अथवा अन्य प्रकार के त्वचा संबंधी रोगों को नष्ट करने वाली अत्युत्तम महौषधि है।
महर्षि चरक तुलसी के गुणों का वर्णन करते हुए लिखते हैं . हिक्काकासविषश्वास पार्श्वशूलविनाशनः । पित्तकृत् कफवातघ्न्रः सुरसः पूतिगन्धहाः॥ तुलसी हिचकी, खाँसी, विष, श्वांस रोग और पार्श्व शूल को नष्ट करती है। यह पित्त कारक, कफ.वातनाशक तथा शरीर एवं भोज्य पदार्थों की दुर्गन्ध को दूर करती है। सूत्र स्थान में वे लिखते हैं . गौरवे शिरसः शूलेपीनसे ह्यहिफेनके । क्रिमिव्याधवपस्मारे घ्राणनाशे प्रेमहेके॥ ;2ध्5द्ध सिर का भारी होनाए पीनसए माथे का दर्दए आधा शीशीए मिरगीए नासिका रोगए कृमि रोग तुलसी से दूर होते हैं। सुश्रुत महर्षि का मत भी इससे अलग नहीं है। वे लिखते हैं . कफानिलविषश्वासकास दौर्गन्धनाशनः । पित्तकृतकफवातघ्नः सुरसः समुदाहृतः॥ ;सूत्र.46द्ध तुलसीए कफए वातए विष विकारए श्वांस.खाँसी और दुर्गन्ध नाशक है। पित्त को उत्पन्न करती है तथा कफ और वायु को विशेष रूप से नष्ट करती है। भाव प्रकाश में उद्धरण है . तुलसी पित्तकृद वात कृमिर्दोर्गन्धनाशिनी। पार्श्वशूलारतिस्वास.कास हिक्काविकारजित॥ तुलसी पित्तनाशकए वात.कृमि तथा दुर्गन्ध नाशक है। पसली का दर्द, अरुचि, खाँसी, श्वांस, हिचकी आदि विकारों को जीतने वाली है। आगे वे लिखते हैं . यह हृदय के लिए हितकर, उष्ण तथा अग्निदीपक है एवं कुष्ट.मूत्र विकार, रक्त विकार, पार्श्वशूल को नष्ट करने वाली है। श्वेत तथा कृष्णा तुलसी दोनों ही गुणों में समान हैं। जिस घर में तुलसी का पौधा लहलहा रहा हों वहां आकाशीय बिजली का प्रकोप नहीं होता। घर बनाते समय नींव में घड़े में हल्दी से रंगे कपड़े में तुलसी की जड़ रखने से उस घर पर बिजली गिरने का डर नहीं होता। तुलसी का पौधा जहां लगा हो वहा आसपास सांप बिच्छू जैसे ज़हरीले जीव नहीं आते। तुलसी का पौधा दिन रात आक्सीजन देता है, प्रदूषण दूर करता है। तुलसी के पौधे का वातावरण में अनुकूल प्रभाव पड़ता है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि प्रत्येक घर में एक तुलसी का पौधा ज़रूर हो समाजसेवा का इससे अच्छा, सुलभता, सुगमता और निशुल्क उपलब्ध होने वाला और क्या उपाय हो सकता है।
हिमालय की विविध भूस्थलाकृतिक विशेषताओं के कारण यहंा वानस्पतिक संसाधनों का विशाल एवं स्थायी भंडार चिर काल से उपलब्ध रहा है। जहां एक ओर विभिन्न औषधीय गुणो की वजह से समूचे विश्व में आधुनिक औषधि निर्माण एवं न्यूट्रास्यूटिकल कम्पनियों मंे इन औषघीय पौधांै की माॅग दिनों दिन बढ रही है वही लोगों तथा सरकार द्वारा इनके आर्थिक महत्व पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि इन वहुउद्ेशीय पादपों के आर्थिक महत्व पर गहनता से कार्य किया जाता है तो पहाड़ो से पलायन जैसी समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है, दून विष्वविद्यालय में कार्यरत , डा0 हरीष चन्द्र अन्डोला द्वारा कियें गयें षोंध के अनुसार, के षोघ पत्र , फूड,रिसर्च इन्टरनेषल वर्श, 2014 में प्रकषित हुआ हैं, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्रकृतिक संसाधनों का संरक्षित सदुपयोग, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से कृशि आधारित व्यवसायिकव ओद्योगिक समृद्धिकारण के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि पर्वतीय क्षेत्र से ग्रामीण युवाओं के पालायन को रोका जा सके और पर्वतीय जनों की जीवन षैली में आवष्यक बदलाव लाया जा सके.

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