डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
ब्रह्मांड अपने भीतर अनगिनत रहस्यों को समेटे हुए है। इन रहस्यों का पता लगाने की बहुत कोशिश की गईं, लेकिन यह अभी तक अनसुलझे हुए हैं। सालों से वैज्ञानिक इन रहस्यों को जानने की कोशिश में लगे हुए हैं। उन्होंने कई रहस्यों से पर्दा उठा दिया है, लेकिन अभी कई ऐसे रहस्य हैं।कुछ बड़े रहस्यों के बारे में जो अभी अनसुलझे हैं। हमेशा से ब्रह्मांड लोगों के लिए जिज्ञासाओं का केंद्र रहा है। ब्रह्मांड अनंत और असीमित है जिसमें लाखों रहस्य छिपे हैं। विज्ञान का दायरा जैसे-जैसे बढ़ा वैसे-वैसे ब्रह्मांड के रहस्य से भी पर्दा उठता गया है। अवलोकनीय ब्रह्मांड में दो खरब आकाशगंगाएं होने का अनुमान है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अंतरिक्ष में अरबों आकाशगंगाएं मौजूद हैं। इनमें लाखों सूर्य, तारे, चंद्रमा, धरती, ग्रह, उपग्रह, उल्का और ब्लैक होल हैं। वैज्ञानिकों ने आकाशगंगा में असंख्य तारामंडल की खोज की है। जिस धरती पर हम सभी रहते हैं उस आकाशगंगा का नाम मिल्की वे है। माना जाता है इसी आकाशगंगा में धरती जैसे ग्रहों पर जीवन हो सकता है। यहां रहने वाले मनुष्य इस धरती पर रहने वाले मनुष्यों से बुद्धिमान हों। वैज्ञिानिकों ने अभी तक 800 से ज्यादा गलैक्सियां खोज निकाली हैं। उनका कहना है कि अंतरिक्ष में करीब दो खरब गलैक्सियां हो सकती हैं।ब्रह्माण्ड रहस्यपूर्ण है। हम सब इसके अविभाज्य अंग हैं। यह विराट है। हम सबको आश्चर्यचकित करता है। इसकी गतिविधि को ध्यान से देखने पर तमाम प्रश्न उठते हैं। भारतीय ऋषि वैदिककाल से ही प्रकृति के गोचर प्रपंचों के प्रति जिज्ञासु रहे हैं। वैज्ञानिक भी प्रकृति के कार्य संचालन के प्रति शोधरत हैं। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में अस्तित्व के विराट स्वरुप का मानवीकरण है। ”यह पुरुष सहस्त्र शीर्षा है – सहस्त्रों सिर वाला हैं। इस पुरुष के प्राण का विस्तार सम्पूर्ण विश्व की वायु है। पुरुष संपूर्ण अस्तित्व को आच्छादित करता है। संपूर्ण विश्व इसका एक चरण है। इसके तीन चरण अन्य लोकों में हैं। पुरुष चेतन, अचेतन, मनुष्य पशु कीट पतिंग नदी समुद्र आदि सभी जीवों पदार्थों में व्याप्त है। जो अब तक हो चुका है, भविष्य में जो होने वाला है, वह सब यही पुरुष ही है।” यह ज्ञात भाग से बड़ा कहा गया है।हिन्दू पूर्वज ज्ञात भाग से ही संतुष्ट नहीं रहे। वे प्रकृति के सभी प्रपंचों के प्रति जिज्ञासु रहे हैं। सृष्टि के उद्भव को भी जानने की उनकी अभिलाषा जारी रही है। प्रकृति की गति को लेकर वेसतत्प्रश्नाकुलरहेहैं।जिज्ञासा और संशय की ज्ञान परंपरा से भारत में 8 प्रमुख दार्शनिक धाराओं का विकास हुआ। कपिल का सांख्य दर्शन, गौतम का न्याय दर्शन, पतञ्जलि का योग, कणांद का वैशेषिक, जैमिनि का पूर्व मीमांसा व बादरायण का वेदांत दर्शन मिलकर हिन्दू परंपरा के षट्दर्शन कहे जाते हैं। इन 6 के अलावा बौद्ध व जैन दर्शन भी भारतीय दर्शन के अंग हैं। इन सब में पूर्व मीमांसा का सम्बंध हिन्दू धर्म के तत्व दर्शन से है। मीमांसा का सामान्य अर्थ विवेचना करना है। तत्व पर विचार और सत्य का अन्वेषण मीमांसा है।पूर्व मीमांसा दर्शन का प्रारम्भ धर्म की जिज्ञासा से होता है – अथातो धर्म जिज्ञासा। उत्तर मीमांसा की शुरुवात ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा‘ से होती है। जीवन के सभी कर्तव्य पूर्व मीमांसा की परिधि में आते है। इस दर्शन का मूल आधार ब्राह्मण ग्रन्थ हैं। ब्राह्मण ग्रंथों में वेद मन्त्रों के अर्थ, उपयोग व विनियोग के विवरण हैं। उत्तर मीमांसा का आधार उपनिषद् हैं। उत्तर मीमांसा का आधार ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र हैं। शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र का भाष्य किया था। ‘अथ‘ का अर्थ उन्होंने अंतर या पश्चात किया है। उत्तर मीमांसा के पहले धर्म जिज्ञासा स्वाभाविक है। धर्म सभी कर्मों कर्तव्य का नियमन है। स्वयंभू विद्वान भारतीय चिंतन को भाववादी बताते हैं। हिन्दू धर्म को अंधविश्वासी बताना प्रगतिशील फैशन है। पूर्व मीमांसा इस आरोप का सही उत्तर है। भारत में धर्म का अर्थ कर्तव्य है। कर्तव्य धर्म है। धर्म सत्य है। सत्य शाश्वत है। कुछ कर्म करणीय हैं और कुछ कर्म अकरणीय हैं। लोकमंगल से जुड़े कर्म अनुकरणीय हैं। प्रत्येक कर्म का परिणाम होता है। इसे कर्म फल कहते हैं। कर्म फल बहुधा विमर्श में रहता है। माना जाता है कि सभी कर्मों का फल ईश्वर देता है। गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म की प्रशंसा की है लेकिन कर्म फल की इच्छा का निषेध किया है – मा फलेषु कदाचन। लेकिन कर्म फल की इच्छा स्वाभाविक है। सब अपने कर्मों का फल चाहते हैं। इच्छानुसार कर्म फल न पाकर दुखी होते हैं। ईश्वर को भला बुरा कहते हैं।यज्ञ प्राचीन भारत में सुप्रतिष्ठित रहा है। प्रकृति की सारी गतिविधि यज्ञ है। गीता (3-14) कहते हैं, ‘‘अन्न से प्राणी हैं। अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ श्रेष्ठ कर्म से उत्पन्न होता है।‘‘ दुनिया के सभी श्रेष्ठ कर्म यज्ञ है। यज्ञ केवल अग्निकुंड में उत्तम पदार्थ डालने और स्वाहा बोलने तक सीमित नहीं है। वैसे सभी कर्मों का फलदाता ईश्वर माना जाता है लेकिन मीमांसा दर्शन के अनुसार यज्ञ या आदर्श कर्म नष्ट होने के पहले ‘अपूर्व‘ नामक तत्व या ऊर्जा पैदा करते हैं। कर्म में ऊर्जा लगती है। कर्म ऊर्जा रूपांतरित होकर ‘अपूर्व‘ पैदा करती है। पूर्व मीमांसा के अनुसार ‘अपूर्व‘ कर्म फल देकर नष्ट हो जाता है। उत्तर मीमांसा या वेदांत में यह जगत् अनित्य है। अनित्य का अर्थ है कि यह प्रतिपल परिवर्तनशील है। शंकराचार्य के शब्दों में जगत् मिथ्या है। पूर्व मीमांसा में जगत् क्षण भंगुर नहीं है। मीमांसा दर्शन भी जगत् को परिवर्तनशील बताता है लेकिन यह रूपांतर के साथ नित्य है। जगत् को नित्य बताना महत्वपूर्ण है। वेदांत दर्शन जगत् को नित्य नहीं मानता। पूर्व मीमांसा में आत्मा नहीं है। ईश्वर सृष्टि सृजन नहीं करता। पूर्व मीमांसा में ईश्वर का उल्लेख न होने के तमाम अर्थ निकाले गए थे। इसी आधार पर इसे कुछ विद्वानों ने इसे निरीश्वरवादी दर्शन कहा। लेकिन पूर्व मीमांसा का विस्तार हुआ। बाद में कुमारिल भट्ट ने इसमें आत्मा जोड़ी। कुमारिल भट्ट ने कहा कि पूर्व में विद्वानों ने मीमांसा को लोकायत आधारित बताया था। मैंने इसे आस्तिक पथ में लाने का काम किया – ताम आस्तिक पंथे कर्तुम अयं यत्नः कृतो मयः। आस्तिकता अस्तित्व के प्रति आस्था है। वेद अस्तित्व का गान है।भारतीय दर्शन में आस्तिक या नास्तिक का निर्णय ईश आस्था से नहीं होता। वेद प्राचीन ज्ञान संकलन है। दर्शन का जन्म ऋग्वेद की अनुभूति से हुआ। वेद प्राचीन एनसाइक्लोपीडिया है। इसलिए यहां वेद मानने वाले आस्तिक कहे गए और वेद निंदक नास्तिक। ईश्वर का उल्लेख न होना बड़ी बात नहीं है। यह ईश्वर के न होने का प्रमाण नहीं है। ईश्वर दार्शनिक विवेचन या वैज्ञानिक अविष्कार से सिद्ध नहीं किया जा सकता। निस्संदेह ईश्वर विश्व के अधिकांश लोगों की आस्था है। लेकिन दर्शन और विज्ञान में प्रमाण आवश्यक होते हैं। पूर्व मीमांसा में वैदिक अनुभूति वाले विषय हैं। पूर्व मीमांसा में वेद वचनों-कथनों को स्वयं प्रमाण माना गया है। वैदिक मन्त्रों को सत्य मानने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं। इसे शब्द प्रमाण भी कहते हैं। इस दर्शन में वैदिक कथन का अर्थ महत्वपूर्ण है। बोला गया शब्द ध्वनि होता है। प्रत्येक शब्द के गर्भ में अर्थ होता है। अर्थ सार्वजनिक बोध होता है। ऋग्वेद(1-164-39) में कहते हैं, ‘‘जो वेद वाणी का तत्व नहीं जानता, ऋचा मन्त्र दोहरा कर क्या कर लेगा?‘‘ कर्मकाण्ड की अपनी महत्ता है लेकिन तत्वज्ञान का बोध ही श्रेयस्कर है। हिन्दू परंपरा में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष चार पुरुषार्थ है। अर्थ व काम का नियमन धर्म करता है लेकिन पूर्व मीमांसा में मोक्ष की भी चर्चा नहीं है। यहां स्वर्ग प्राप्ति सबसे बड़ा कर्म फल है। लेकिन स्वर्ग कोई भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। स्वर्ग सभी अभिलाषाओं की पूर्ती का स्थान या अनुभूति है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में सोमदेव से प्रार्थना है, ‘‘जहां सारी इच्छाओं की पूर्ती होती है। हमे वहां स्थान दो। जहां सदा नीरा नदियां बहती हैं। विवस्वान सूर्य के पुत्र की राजव्यवस्था है, जहां मुद, मोद, प्रमोद हैं हमें वहां स्थान दो।‘‘ ऋषि की यह कल्पना स्वर्ग की प्रतिच्छाया है। यह श्रेष्ठ कर्मों का परिणाम है। पूर्व मीमांसा में कर्म फल की गारंटी है। स्वर्ग सभी अभिलाषाओं को पूरा करने वाली चित्त दशा भी हो सकती है। ऐसी आनंदपूर्ण स्थिति यहीं इसी संसार में भी संभव है। संसार कर्मक्षेत्र है। भारत कर्म क्षेत्र के साथ धर्मक्षेत्र है। गीता ‘धर्मक्षेत्र‘ से ही शुरू होती है। धर्म भारत का वरेण्य है। हिन्दू तत्व धर्म है और धर्म हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व में विश्व कल्याण की गहनतम अभीप्सा है। ब्रह्मांड के रहस्यों में अब एक और दिलचस्प खोज जुड़ गई है. खगोल वैज्ञानिकों ने 7.7 अरब साल पहले निकली उस रोशनी को डिटेक्ट किया है जो आज धरती तक पहुंची है. इस रोशनी ने एक ऐसा रेडियो सर्कल दिखाया है जो अब तक खोजे गए सभी ORCs सबसे ताकतवर और सबसे विशाल है. इसे J131346.9+500320 नाम दिया गया है. ये सिर्फ एक नहीं, बल्कि दो इंटरसेक्टिंग रिंग्स वाला ‘डबल सर्कल’ है जिसकी बाहरी चौड़ाई करीब 26 लाख प्रकाश-वर्ष मापी गई है. माना जा रहा है कि ये शक्तिशाली स्ट्रक्चर किसी विशाल ब्लैक होल के विस्फोटक ‘विंड्स’ या ‘शॉक्स’ से बना है. मुंबई यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोनॉमर आनंद होता की टीम और उनके RAD@home प्रोजेक्ट के सिटिजन साइंटिस्ट्स ने मिलकर इस रहस्य को सुलझाने की शुरुआत की है. ये ‘डबल रिंग’ एक ऐसे गैलेक्टिक झटके का नतीजा हो सकता है जो किसी सुपरमैसिव ब्लैक होल के केंद्र से निकला. जब ब्लैक होल एक्टिव फेज में होता है, तो वो अपने ध्रुवों से प्लाज्मा और एनर्जी के जबरदस्त जेट्स छोड़ता है. यही जेट्स बाद में स्पेस में जाकर ऐसे विशाल रेडियो स्ट्रक्चर्स बनाते हैं जो करोड़ों सालों तक मौजूद रहते हैं. ऋग्वेद में सुंदर, किन्तु निर्दोष काव्यात्मक अभिव्यक्तियों में निहित गहन दार्शनिक विचार भी समाहित हैं। ये विचार बताते हैं कि ब्रह्मांड बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के एक महान सिद्धांत से उत्पन्न हुआ है। विद्वानों ने वैदिक ऋषियों द्वारा रचित ऋचाओं में छिपी अंतर्ज्ञान और समझ की गहराई को पहचाना है। वे यह भी कहते हैं कि यही अस्पष्ट विचार आगे चलकर उपनिषदों में दार्शनिक सिद्धांतों के रूप में विकसित हुए। नासदीय सूक्त , जो अपने गहन दार्शनिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, का एक अंश इस प्रकार है:न अस्तित्व था, न अनस्तित्व,न संसार था, न पार आकाश।
उस धुंध को किसने ढका था? वह किसका था?
उस घने अंधकार की गहराइयों में क्या था?
तब न तो मृत्यु थी, न अमरता,
न ही रात्रि दिन से पृथक थी,
अपितु वह निश्चल थी, वह
अकेली, अपनी महिमा के साथ, एक थी – उसके
परे कुछ भी अस्तित्व में नहीं था।
पहले अंधकार में छिपा हुआ अंधकार था,
जल के एक पिंड के समान अस्पष्ट,
फिर जो शून्य में इस प्रकार ढका हुआ था, तपः
द्वारा एक तेज प्रकट हुआ !वेदों में एक सर्वोच्च ईश्वर पर केंद्रित धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ उपनिषदों में निराकार दिव्य वास्तविकता की अवधारणा के रूप में विकसित हुईं। इस परम सत्य को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, जैसे सत् , शुद्ध अस्तित्व; ब्रह्म , महान्; और आत्मा , ब्रह्मांडीय आत्मा।उपनिषदों में हमें सृष्टि और उसकी उत्पत्ति के विभिन्न विवरण मिलते हैं। उपनिषदों में सृष्टि का सिद्धांत दो रूपों में है ब्रह्मांड की भौतिक उत्पत्ति, और ब्रह्मांड की दैवीय उत्पत्ति।तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है: ‘ यह आत्मा है, आत्मा है, और आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु उत्पन्न हुई, वायु से अग्नि उत्पन्न हुई, अग्नि से जल उत्पन्न हुआ, जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई, पृथ्वी से वनस्पतियाँ और पौधे उत्पन्न हुए, वनस्पतियों और पौधों से अन्न उत्पन्न हुआ, और अन्न से मनुष्य उत्पन्न हुआ।यह उपनिषदों में ब्रह्मांड की भौतिक उत्पत्ति का एक उदाहरण है।बृहदारण्यक उपनिषद सृष्टि का अधिक गहन वर्णन करता है। इसमें कहा गया है: ‘यह सब [ब्रह्मांड] तब अविभाज्य था। यह नाम और रूप से विभेदित हो गया: इसे अमुक नाम और अमुक रूप से जाना जाता था। … यह आत्मा इन शरीरों में नाखूनों के सिरे तक प्रविष्ट है। … जो इसके किसी एक पहलू का ध्यान करता है, वह नहीं जानता, क्योंकि तब यह अपूर्ण है। … केवल आत्मा का ही ध्यान करना है, क्योंकि उसमें ये सभी एक हो जाते हैं।आचार्य शंकर ने उपरोक्त मंत्र की अपनी व्याख्या में स्पष्ट किया है कि आत्मा अविद्या , आदि अज्ञान, द्वारा अधिरोपित है, जिसमें कर्ता, कर्म और फल के भेद विद्यमान हैं। यही वह समय है जब इस ब्रह्मांड से युक्त नाम और रूप अविभेदित अवस्था से विभेदित अवस्था में प्रवेश करते हैं। सृष्टि मूलतः अधिरोपण से संबंधित एक प्रत्यक्ष परिवर्तन है। इस प्रक्रिया में आत्मा अप्रभावित और अपरिवर्तित बनी रहती है। यही कारण है कि उपनिषद हमें केवल आत्मा का ध्यान करने का निर्देश देते हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष परिवर्तनों के मध्य यही एकमात्र वास्तविकता है जिसने ब्रह्मांड का रूप धारण किया है।हम ईसाई धर्म में सृष्टि के आस्तिक विचार पर पहले ही चर्चा कर चुके हैं। ईसाई मान्यताओं के साथ भारतीय आस्तिक विचारधाराओं के विचारों को समझना दिलचस्प होगा। भगवद्गीता में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सृष्टि के एक चक्र के अंत में सभी प्राणी और लोक प्रकृति, ब्रह्मांडीय तत्त्व, में वापस चले जाते हैं, और अगले चक्र के आरंभ में वे उन्हें पुनः प्रक्षेपित करते हैं। प्रकृति को अपने नियंत्रण में रखते हुए, वे इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराएँगे। भगवान आगे कहते हैं कि वे केवल इस प्रक्रिया के अध्यक्ष हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड इसी प्रकार घूमता है, प्रकृति का विकास और अंतर्विकास।यहाँ सृष्टि निरपेक्ष नहीं है, बल्कि प्रकृति नामक ब्रह्मांडीय तत्व का प्रक्षेपण मात्र है। इतिहास की अवधारणा भी रेखीय से चक्रीय में बदल जाती है , क्योंकि सृष्टि का कोई निरपेक्ष आरंभ या अंत नहीं है। यह पश्चिमी विज्ञान, दर्शन और धर्मशास्त्र के विपरीत है, जो विश्व की उत्पत्ति और उसके विकास को एक रेखीय आख्यान के रूप में समझाने का प्रयास करते हैं।भागवत उपरोक्त विचार को और भी परिष्कृत करता है। यह कहता है कि प्रकृति, मूल पदार्थ, परम पुरुष, जो प्रकृति के स्वामी हैं, की इच्छा से अपनी संतुलन अवस्था से विचलित हो जाती है। यह आगे चलकर महत् या ब्रह्मांडीय मन और अहंकार या अहं-इंद्रिय के सिद्धांत में विकसित होती है, जिसके तीन पहलू हैं – सत्व (प्रकाश), रज (क्रिया), और तम (मंदता)। ये आगे सूक्ष्म तत्त्वों, इंद्रियों आदि में प्रकट होते हैं। चूँकि ये अपनी जड़ प्रकृति के कारण स्वयं मिलकर ब्रह्मांड का निर्माण नहीं कर सकते, इसलिए भगवान अपनी इच्छा-शक्ति से सृजन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में इन्हें सक्रिय करते हैं।हालाँकि, ब्रह्मांड की रचनात्मक शक्ति, प्रकृति, भारतीय धर्मशास्त्रियों के लिए एक रहस्य बनी रही। वास्तविकता के दो पहलू हैं: मूर्त , आकार के साथ, और अमृत , बिना आकार के। उपनिषद और भागवत जैसे पुराणों ने दोनों को स्वीकार किया। उपनिषदों ने निराकार वास्तविकता को प्रमुखता दी, जबकि पुराणों ने रूप और गुणों के साथ वास्तविकता पर जोर दिया। दोनों ने कहा कि ब्रह्मांड एक रहस्यमय रचनात्मक शक्ति के माध्यम से वास्तविकता से प्रक्षेपित होता है, जो कि अवर्णनीय है। उपनिषदों ने यह मानकर ब्रह्मांड की वास्तविकता को खारिज कर दिया कि सृष्टि ब्रह्म पर एक अध्यारोपण मात्र है। हालाँकि, पुराणों ने प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति को परम भगवान की शाश्वत पत्नी का दर्जा दिया और इसे लक्ष्मी , उमा , आदि कहा। इससे भगवान और उनकी सनातन पत्नी के कारनामों की पौराणिक कहानियों का जन्म हुआ।तंत्र कहते हैं कि प्रकृति, जो वास्तविकता का सृजनात्मक पहलू है, स्थिर पहलू के समान और उससे अविभाज्य है। तंत्र स्थिर पहलू को ‘शिव’ और सृजनात्मक पहलू को ‘शक्ति’ कहते हैं। तंत्र के सुप्रसिद्ध व्याख्याता सर जॉन वुडरोफ़ कहते हैं: ‘शक्ति माया है, जिसके द्वारा ब्रह्माण्ड की रचना करने वाला ब्रह्म स्वयं को उससे भिन्न प्रतीत कराता है जो वह वास्तव में है, और मूल-प्रकृति या अव्यक्त ( अव्यक्त ) है, जो उस स्थिति की है जो प्रकट होने पर नाम और रूप का ब्रह्माण्ड है।शक्ति ब्रह्माण्ड का मूल भौतिक कारण है, जिसमें तीन गुण सत्व , रज और तम हैं , जो प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘ये तीन गुण प्रकृति को आत्मा के प्रकटीकरण के रूप में, प्रकृति को आत्मा से पदार्थ में अवतरण के मार्ग के रूप में, या पदार्थ से आत्मा में आरोहण के रूप में, और प्रकृति को आत्मा के सघन आवरण के रूप में दर्शाते हैं’ (11)। धार्मिक दृष्टि से, शक्ति को देवी माना जाता है , जो महामाया हैं । उन्हें मातृ रूप में ब्रह्म के रूप में वर्णित किया गया है। वे अंबिका हैं , महान माता, और ललिता भी , जो दिव्य क्रीड़ा का आनंद लेती हैं, क्योंकि सारा संसार केवल उनकी क्रीड़ा है।श्री रामकृष्ण की प्रतिभा रूढ़िवादी वेदांत सिद्धांतों और तंत्र के सिद्धांतों के बीच सामंजस्य में निहित है। प्रकृति और माया की अपनी अवधारणा में, उन्होंने दोनों के विचारों का सम्मिश्रण किया। वे कहते हैं कि माया और ब्रह्म गतिमान सर्प और विश्रामशील सर्प के समान हैं। वे शांत सागर की तुलना ब्रह्म से और उसकी लहरों में उथल-पुथल की तुलना माया से करते हैं; अग्नि की तुलना ब्रह्म से और उसकी ज्वलनशील शक्ति की तुलना माया से करते हैं। शिव बुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं और शक्ति ऊर्जा का। दोनों ही सृजन के लिए आवश्यक हैं। ये विचार तंत्र के विचारों के करीब हैं।श्री रामकृष्ण यह भी कहते हैं कि माया वह मायावी शक्ति है जो संसार को मोहित करती है, यह अवधारणा अद्वैत वेदांत के समान है। वे कहते हैं: “यदि आप माया, इस सार्वभौमिक भ्रम, के स्वरूप को पहचान सकें, तो यह आपसे वैसे ही दूर भाग जाएगी जैसे चोर पकड़े जाने पर भाग जाता है।”इसे वे अविद्या माया कहते हैं , जो अज्ञान की माया है। वे विद्या माया की अवधारणा भी प्रस्तुत करते हैं , जो ईश्वर प्राप्ति में सहायक होती है। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, करुणा—ये विद्या माया के भाव हैं । ब्रह्म से अभिन्न इस ‘माया’ को ही श्री रामकृष्ण ‘माँ’ कहते हैं। वे कहते हैंईश्वर ने मानो खेल-खेल में ही संसार की रचना की है। इसे महामाया, महामाया कहते हैं। इसलिए, हमें स्वयं ब्रह्माण्डीय शक्ति, देवी माँ की शरण में जाना चाहिए। उन्होंने ही हमें माया के बंधनों से बाँधा है। ईश्वर का साक्षात्कार तभी संभव है जब ये बंधन टूट जाएँ। … ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें आदि शक्ति, देवी माँ की आराधना करनी चाहिए। ईश्वर स्वयं महामाया हैं, जो अपनी माया से संसार को मोहित करती हैं और सृष्टि, पालन और संहार का जादू रचती हैं।हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह हमारे लिए हमेशा एक रहस्य बनी रहती है। भौतिक विज्ञान इस रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ब्रह्मांड की मूलभूत सत्ताओं, अंतरिक्ष और समय, के बारे में अनिश्चित है । ईश्वर द्वारा शून्य से रचित इस दुनिया के बारे में यह दृष्टिकोण इस तार्किक युग में एक हठधर्मिता के स्तर तक गिर गया हैअद्वैत वेदांत कहता है कि संसार ब्रह्म नामक वास्तविकता पर आरोपित एक मिथ्या विचार मात्र है। भक्ति संप्रदाय सृष्टि को ईश्वरीय शक्ति की अभिव्यक्ति मानते हैं। तंत्र हमें बताते हैं कि यह ब्रह्मांडीय शक्ति इस प्रकार प्रकट होती है कि संसार वास्तविकता का एक पहलू है, जबकि दूसरा पहलू स्थिर अवस्था में है।श्री रामकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं में, ये सभी विचार सम्पूर्ण ब्रह्मांड को स्वयं ईश्वर के रूप में देखने के एक एकीकृत ढाँचे में समन्वित हैं। श्री रामकृष्ण के प्रत्यक्ष शिष्य और एक कट्टर अद्वैतवादी स्वामी तुरियानन्द ने अपने जीवन के अंत में घोषणा की: ‘ ब्रह्म सत्य, जगत सत्य, सब सत्य—सत्ये प्राण प्रतिष्ठित ; ईश्वर सत्य है; जगत भी सत्य है; सब कुछ सत्य है—जीवन शक्ति (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) सत्य में स्थापित है। यह उपनिषदिक उक्ति से मेल खाता है: ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ; यह सब वस्तुतः ब्रह्म है।’संभवतः यही ‘सब कुछ का सिद्धांत’ है , जिसे भौतिक विज्ञान अनुभवजन्य क्षेत्र में अब तक प्राप्त करने में असफल रहा है, जबकि वैदिक ऋषियों ने इसे आध्यात्मिक क्षेत्र में कम से कम पांच हजार वर्ष पूर्व ही समझ लिया था।
*लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*












