डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
बिशनी देवी शाह महिला राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन क्रांतिकारी थी, जो बिटिस शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में लड़ाई लड़ते हुए जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी थीं। बिशनी देवी उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के एक साधारण परिवार से थी, जिनका जन्म साल 1912 में हुआ। उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी, जिसके बाद बिशनी की शादी 12 वर्ष की छोटी उम्र में हो गई। शादी के 4 साल बाद ही उनके पति का देहांत हो गया। पति के देहांत के बाद उन्हें समाज की कुरीतियों और रूढ़िवादी सोच का सामना करना पड़ा। उस समय सामाजिक दबाव के कारण कम आयु में पति की मृत्यु होने पर ज्यादातर महिलाएं सन्यास धारण कर माई बनने को विवश हो जाती थीं, उन्हें कोई रहने, खाने की व्यवस्था नहीं थी, न ही घर वाले अपनाते थे, बिशनी देवी साह ने कई स्वतंत्रता आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बावजूद उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थीं। अब डाक विभाग ने बिशनी देवी को उनकी पहचान दिलाने के लिए लिफाफे में उनकी फोटो और उनका जीवन परिचय लिखा है, जिससे उनको सही पहचान मिल सके। बिशनी देवी का जन्म12 अक्टूबर, 1902 को बागेश्वर में हुआ था। 13 साल की उम्र में अल्मोड़ा निवासी शख्स से उनकी शादी हो गई थी। जब वह 16 साल की थीं, तो उनके पति का निधन हो गया था। जिसके बाद मायके और ससुराल वालों ने उन्हें ठुकरा दिया था। वहां बिशनी देवी ने इस परम्परा को न मानकर स्वतन्त्रता आंदोलन में एक क्रांतिकारी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिशनी देवी पहाड़ी क्षेत्रों में महिला आंदोलनकरियों के साथ सहयोगी बनकर साथ चलीं और उनके मनोबल को बढ़ाने में हर प्रकार से मदद कीं। वह महिलाओं के संगठित करने, सामाजिक सांस्कृतिक अधिकारों के प्रति प्रेरित करती थी। 2 फरवरी 1931 को जब बागेश्वर में महिलाओं ने स्वतंत्रता की मांग को लेकर जुलूस निकाला तो बिशनी देवी ने बागेश्वर के सेरा दुर्ग में आधी नाली जमीन और 5 रुपये दान देकर आर्थिक मदद की। वह स्वतंत्रता आंदोलनकारियों के लिए धन जुटाने, विभिन्न सामग्री पहुंचाने और पत्रवाहक का काम भी करती थीं। 7 जुलाई 1933 में बिशनी देवी साह को ब्रिटिश शासन ने फिर से गिरफ्तार कर फतेहगढ़ जेल में डाल दिया। उन्हें नौ महीने की सजा और 200 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। जंगे आजादी में अदम्य साहस और प्रतिरोध का जौहर दिखाने में उत्तराखंड की महिलाएं पहली पंक्ति में शुमार रही हैं। वीरांगना बिशनी देवी साह को स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना जाता है। उनके क्रांतिकारी नेतृत्व से अंग्रेजी हुकूमत इस कदर खौफजदा हुई कि उन्हें दो बार जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया गया।25 अक्तूबर 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में तिरंगा फहराने पर उन्हें दिसंबर-1930 में गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में कठोर यातनाएं दी गईं। जेल से रिहा होने के बाद वह अल्मोड़ा में स्वदेशी के प्रचार-प्रसार में लग गईं। खादी के प्रचार के लिए उन्होंने चर्खा खरीदकर घर-घर जाकर महिलाओं को बांटना शुरू किया और महिला समूह बनाकर चर्खा चलाने का प्रशिक्षण दिया। दो फरवरी 1931 को जब बागेश्वर में महिलाओं ने स्वतंत्रता की मांग को लेकर जुलूस निकाला तो बिशनी देवी ने आर्थिक मदद भी की। स्वतंत्रता आंदोलन में लगातार सक्रिय रहने के कारण बिशनी देवी को सात जुलाई 1933 को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें नौ महीने की सजा के साथ 200 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया जो उस समय के हिसाब से बड़ी राशि थी। जुर्माने की राशि अदा नहीं कर पाने पर उनकी कैद बढ़ाकर एक साल कर दी गई। हालांकि स्वास्थ्य खराब होने पर उन्हें जल्द रिहा कर दिया गया। 1934 में मकर संक्रांति पर जब बागेश्वर में उत्तरायणी मेला लगा तो अंग्रेज सरकार ने मेले में धारा-144 लगा दी। बिशनी देवी साह ने धारा-144 की परवाह ना करते हुए मेला स्थल पर खादी की प्रदर्शनी लगाई।अंग्रेजी हुकुमत में तिरंगा फहराना अपराध माना जाता था। उत्तराखंड में आजादी के परवानों ने 25 अक्टूबर 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का निर्णय किया। इसमें बड़ी संख्या में महिलाओं भी शामिल थी। पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक रोका। पुलिस लाठीचार्ज में मोहनलाल जोशी और शांति त्रिवेदी गंभीर रुप से घायल हो गए। इससे आंदोलनकारी और उग्र हो गए। बिशनी देवी साह, कुंती वर्मा, मंगला देवी, भगीरथी देवी, जीवंती देवी, दुर्गा देवी पंत, तुलसी देवी रावत, भक्ति देवी त्रिवेदी, रेवती देवी आदि महिलाओं ने जुलूस का नेतृत्व किया।पुलिस के लाठीचार्ज की सूचना मिलने पर स्वतंत्रता सेनानी बद्रीदत्त पांडे और देवीदत्त पंत अनेक लोगों के साथ घटना स्थल पर पहुंचे। इससे आंदोलनकारी महिलाओं को बल मिला और वे नगर पालिका में झंडारोहण करने में सफल रहीं। 23 जुलाई 1935 में अल्मोड़ा के कांग्रेस भवन में बिशनी देवी साह ने तिरंगा फहराया। विजय लक्ष्मी पंडित ने भी कुमाऊं यात्रा के दौरान उनके महिला नेतृत्व की सराहना की। 26 जनवरी 1940 में उन्होंने अल्मोड़ा में झंडारोहण किया और 1940-41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया। साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में बिशनी ने अल्मोड़ा में सक्रिय भागीदारी की। 15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ, बिशनी देवी ने अल्मोड़ा में तिरंगे के साथ विशाल रैली का नेतृत्व किया। हालांकि स्वतंत्रता के बाद उनके योगदान के बावजूद आज़ाद भारत में वह सम्मान नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। उन्होंने अपना जीवन एकल महिला के रूप में जिया। आर्थिक तंगी के बीच उनके अंतिम दिन बीते और 1974 में 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। यह कहानी न केवल उनके साहस को दिखाती है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को उचित मान्यता और सम्मान मिलना कितना जरूरी है। बिश्नीन देवी का राष्ट्र प्रेम 19 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय गीत के गायन से शुरू हुआ. कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों को महिलाएं रात्रि जागरण में गाया करती थी. इससे स्त्रियों में राष्ट्रीय भावना का संचार हुआ. अल्मोड़ा में नन्दा देवी के मन्दिर में होने वाली सभाओं में भाग लेने और स्वदेशी प्रचार कार्यों में बिश्नी देवी काम करने लगीं. आन्दोलनकारियों को महिलाएं प्रोत्साहित करती थीं, जेल जाते समय सम्मानित कर पूजा करती, आरती उतारतीं और फूल चढ़ाया करती थीं. उत्तराखंड की कई महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन बलिदान किया। उनके बलिदान ने न केवल उस समय के आंदोलनकारियों को प्रेरित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया। उनके योगदान ने यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता की लड़ाई में लिंग भेद नहीं होता और महिलाएं भी राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकती हैं।संक्षेप में, उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण और गौरवशाली भूमिका निभाई। बिशनी देवी शाह और श्यामा वत्स जैसी नेताओं ने अपने साहस और दृढ़ संकल्प से महिलाओं को संगठित किया और उन्हें आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनके योगदान ने न केवल स्थानीय संघर्षों को मजबूत किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा। उनका बलिदान और संघर्ष हमें हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता हमें महिलाओं और पुरुषों दोनों के सामूहिक प्रयासों से मिली है।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














