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हिमालयी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड का भू कानून लचीला है

29/06/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला 

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका अपना कोई एक भूमि सुधार कानून नहीं है. राज्य बनने के 19 वर्ष हो जाने के बाद भी हमारी सरकारें राज्य में एक नया भूमि सुधार कानून बनाने के प्रति कहीं से भी चिंतित नहीं दिख रही हैं. अभी भी हमारे राज्य में “उत्तर प्रदेश जमींदारी विनास एवं भूमि व्यवस्था कानून” ही लागू है. पर्वतीय क्षेत्र के जिलों में इसके साथ ही सन् 1960 में बना “कुमाऊँ उत्तराखंड जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून” (कूजा एक्ट) भी लागू है. इस तरह प्रदेश के अन्दर पहाड़ी क्षेत्र के लिए अलग–अलग दो भूमि सुधार कानून लागू हैं जिन्हें पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाया था. देश के अन्य हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को समझते हुये यहां बहुत सख्त भू-कानून बनाये गये हैं। जम्मू-कश्मीर में संविधान की धारा-370 और 35-ए (अब हटा दी गर्इ हैं) से जमीनों की खरीद-फरोख्त पर रोक थी।

पूर्वोत्तर के राज्यों में धारा-371-ए के माध्यम से जमीनों को बचाया गया है। हमारे पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में अपनी जमीनों को बचाने के लिये धारा-118 बनार्इ है। इन राज्यों ने पहले अपनी जमीन को बचाया और फिर इसको विकसित करने का काम किया। यही वजह है कि जहां हिमाचल प्रदेश को आज हम ‘एप्पल स्टेट’ के रूप में जानते हैं तो सिक्किम को ‘जैविक राज्य’ के रूप में। हिमाचल प्रदेश में ‘हिमाचल प्रदेश टेंनसी एंड लैंड रिफाॅम्र्स एक्ट-1972‘ के 11 वें अध्याय में ‘कंट्रोल आॅन ट्रांसफर आॅफ लैंड’ में धारा-118 है। इस धारा के अनुसार हिमाचल में किसी भी गैर कृषक को जमीन हस्तांतरित नहीं की जा सकती है।

इसका मतलब यह भी हुआ कि किसी भी कृषि जमीन को हिमाचल का रहने वाला ही गैर कृषक भी नहीं खरीद सकता। इसी धारा का 38-ए का सैक्शन-3 यह भी कहती है कि कोर्इ भी भारतीय (गैर हिमाचली) रिहायशी जमीन खरीदने के लिये आवेदन कर सकता है। इसकी सीमा भी 500 स्क्वायर मीटर होगी। लेकिन इसके लिये भी सरकार से इजाजत लेनी पड़ेगी। गैर हिमाचली सरकारी कर्मचारी भी अगर अपना आवास बनाना चाहें तो उनके साथ भी हिमाचल में तीस साल की सरकारी सेवा का प्रमाण पत्र होना चाहिये।

इस प्रकार के प्रावधानों ने वहां की कृषि योग्य जमीन को बचाने का काम किया है।सिक्किम में भी ठोस भू-कानून है। यहां भी कोर्इ गैर सिक्किमवासी जमीन नहीं खरीद सकता। सिक्किम की ‘दि सिक्किम रेग्युलेशन आॅफ ट्रांसफर आॅफ लैंड (एमेंडमेंट) एक्ट 2018 की धारा-3 (क) में यह प्रावधान किया गया है कि लिम्बू या तमांग समुदाय में ही जमीन खरीदी या बेची जा सकती है। इसमें भी यह प्रावधान किया गया है जमीन बेचने वाले को कम से कम तीन एकड़ जमीन अपने पास रखनी होगी।

यह प्रावधान इसलिये किया गया कि जो जमीन बेच रहा है वह भूमिहीन न रहे। इसमें यह भी प्रावधान है कि केन्द्र द्वारा अधिसूचित ओबीसी को अपने पास तीन और राज्य द्वारा अधिसूचित ओबीसी को दस एकड़ जमीन अपने पास रखनी होगी। मेधालय में में जमीनों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी है। ‘दि मेघालय ट्रांसफर आॅफ लैंड (रेग्युलेशन) एक्ट 1971 में प्रावधान है कि कोर्इ भी जमीन आदिवासी को नहीं बेची जा सकती। 1972 में हिमाचल में एक सख्त कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत बाहर के लोग हिमाचल में जमीन नहीं खरीद सकते थे। दरअसल हिमाचल इस वक्त इतना सम्पन्न नहीं था।

डर था कि कहीं हिमाचल के लोग बाहरी लोगो को अपनी जमीन न बेच दें। जाहिर सी बात थी कि वो भूमिहीन हो जाते। भूमिहीन होने का अर्थ है कि अपनी संस्कृति और सभ्यता को भी खोने का खतरा। दरअसल हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यसवंत सिंह परमार ये कानून लेकर आ गए थे। लैंड रिफॉर्म एक्ट 1972 में प्रावधान के तहत एक्ट के 11वे अध्याय में में धारा -118 के तहत हिमाचल में कृषि भूमि नही खरीदी जा सकती।

गैर हिमाचली नागरिक को यहां जमीन खरीदने की इजाजत नही। कमर्शियल प्रयोग के लिए आप जमीन किराए पे ले सकते हैं। 2007 में धूमल सरकार ने धारा -118 में संशोधन किया और कहा कि बाहरी राज्य का व्यक्ति, जो हिमाचल में 15 साल से रह रहा है, वो यहां जमीन ले सकता है। इसका बड़ा हुआ और बाद में अगली सरकार ने इसे बढ़ा कर 30 साल कर दिया।दुर्भाग्य से जिस जमीन को बचाकर नीति नियंताओं ने गांवों को बसाने की नीतियां बनानी चाहिये थी वे बेशर्मी के साथ सबसे पहले जमीनों को बेचने में लग गर्इ। उत्तराखंड में हमेशा जमीनों के सवाल को लेकर जनता आंदोलित रही है।

राज्य आंदोलन के समय भी यह मांग रही है कि राज्य में ऐसा भू-काननू आना चाहिये जिससे हमारी जमीनों को बेचने से रोका जाये। लेकिन सरकारें लगातार जनता को गुमराह कर इन जमीनों के सौदे करती रही हैं। आज जब मुख्यमंत्री और उनके नीति-नियंता यह बात कर रहे हैं कि वे पलायन को रोकना चाहते हैं तो वे जमीनों के सवाल पर चुप क्यों हैं? क्या हम यह उम्मीद लगा सकते हैं कि कोरोना त्रासदी को जिस तरह मुख्यमंत्री ‘अवसर’ के रूप में देख रहे हैं, यह अवसर भूमि कानूनों को बदलने के लिये भी होगा या हमेशा की तरह हवार्इ विकास की बात होती रहेगी।

अगर सरकार समझती है कि पहाड़ से पलायन को रुकना चाहिये तो सबसे पहले उन्हें गांवों को बसाने की बात करनी चाहिये। गांव बसाने के लिये जमीन चाहिये। जमीन के लिये जनपक्षीय भू-कानून और भू-प्रबंधन चाहिये। क्या सरकार ऐसा सोच रही है? अगर सोच रही होती तो हमारी जमीनों को लीज पर देकर ‘कांटेक्ट फार्मिंग ’ के बहाने बड़े पूंजीपतियों के हवाले करने की साजिश नहीं करती।

जब लोग कोरोना संकट से जूझ रहे थे सरकार ने चुपके से ‘कांटेक्ट फार्मिंग’ का मसौदा पास करा दिया। सरकार ने प्रदेश में सोलर प्लांट लगाने के नाम पर लोगों की जमीनों को लीज पर देने के लिये बड़े निवेश का प्रस्ताव पहले से ही किया हुआ है। और भी बहुत सारी योजनायें सरकार की प्रस्तावित हैं, जो बड़े पैसे वालों के लिये पहाड़ के गांवों की जमीनों को खरीदने का रास्ता तैयार करती हैं।

सरकार उन लोगों को अपनी जमीन पर कुछ करने को प्रोत्साहित नहीं करती जो लगातार पहाड़ छोड़ने को मजबूर हैं। अलग राज्य बनाने के बाद भी पर्वतीय कृषि उत्पादों का न तो राज्य सरकारों ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है और न ही उनकी खरीद की गारंटी की गई है. पूरे देश में और हमारे राज्य के मैदानी जिलों में भी सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर उसके खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र खोले जाते हैं. मगर पहाड़ के कृषि उत्पादों जैसे–चौलाई (रामदाना), राजमा, गहत, भट्ट, मडुआ, मॉस (उडद), मिर्च, हल्दी, मसाले, आलू, मूली, गडेरी, अदरक, माल्टा, संतरा, आम, आडू, खुमानी आदि का न तो राज्य सरकार ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है और न ही इसकी खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र खोले गए हैं.

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