• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

हिमालयी राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड का भू कानून लचीला है

29/06/21
in उत्तराखंड
Reading Time: 1min read
1.8k
SHARES
2.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला 

उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य होगा जिसका अपना कोई एक भूमि सुधार कानून नहीं है. राज्य बनने के 19 वर्ष हो जाने के बाद भी हमारी सरकारें राज्य में एक नया भूमि सुधार कानून बनाने के प्रति कहीं से भी चिंतित नहीं दिख रही हैं. अभी भी हमारे राज्य में “उत्तर प्रदेश जमींदारी विनास एवं भूमि व्यवस्था कानून” ही लागू है. पर्वतीय क्षेत्र के जिलों में इसके साथ ही सन् 1960 में बना “कुमाऊँ उत्तराखंड जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून” (कूजा एक्ट) भी लागू है. इस तरह प्रदेश के अन्दर पहाड़ी क्षेत्र के लिए अलग–अलग दो भूमि सुधार कानून लागू हैं जिन्हें पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाया था. देश के अन्य हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को समझते हुये यहां बहुत सख्त भू-कानून बनाये गये हैं। जम्मू-कश्मीर में संविधान की धारा-370 और 35-ए (अब हटा दी गर्इ हैं) से जमीनों की खरीद-फरोख्त पर रोक थी।

पूर्वोत्तर के राज्यों में धारा-371-ए के माध्यम से जमीनों को बचाया गया है। हमारे पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में अपनी जमीनों को बचाने के लिये धारा-118 बनार्इ है। इन राज्यों ने पहले अपनी जमीन को बचाया और फिर इसको विकसित करने का काम किया। यही वजह है कि जहां हिमाचल प्रदेश को आज हम ‘एप्पल स्टेट’ के रूप में जानते हैं तो सिक्किम को ‘जैविक राज्य’ के रूप में। हिमाचल प्रदेश में ‘हिमाचल प्रदेश टेंनसी एंड लैंड रिफाॅम्र्स एक्ट-1972‘ के 11 वें अध्याय में ‘कंट्रोल आॅन ट्रांसफर आॅफ लैंड’ में धारा-118 है। इस धारा के अनुसार हिमाचल में किसी भी गैर कृषक को जमीन हस्तांतरित नहीं की जा सकती है।

इसका मतलब यह भी हुआ कि किसी भी कृषि जमीन को हिमाचल का रहने वाला ही गैर कृषक भी नहीं खरीद सकता। इसी धारा का 38-ए का सैक्शन-3 यह भी कहती है कि कोर्इ भी भारतीय (गैर हिमाचली) रिहायशी जमीन खरीदने के लिये आवेदन कर सकता है। इसकी सीमा भी 500 स्क्वायर मीटर होगी। लेकिन इसके लिये भी सरकार से इजाजत लेनी पड़ेगी। गैर हिमाचली सरकारी कर्मचारी भी अगर अपना आवास बनाना चाहें तो उनके साथ भी हिमाचल में तीस साल की सरकारी सेवा का प्रमाण पत्र होना चाहिये।

इस प्रकार के प्रावधानों ने वहां की कृषि योग्य जमीन को बचाने का काम किया है।सिक्किम में भी ठोस भू-कानून है। यहां भी कोर्इ गैर सिक्किमवासी जमीन नहीं खरीद सकता। सिक्किम की ‘दि सिक्किम रेग्युलेशन आॅफ ट्रांसफर आॅफ लैंड (एमेंडमेंट) एक्ट 2018 की धारा-3 (क) में यह प्रावधान किया गया है कि लिम्बू या तमांग समुदाय में ही जमीन खरीदी या बेची जा सकती है। इसमें भी यह प्रावधान किया गया है जमीन बेचने वाले को कम से कम तीन एकड़ जमीन अपने पास रखनी होगी।

यह प्रावधान इसलिये किया गया कि जो जमीन बेच रहा है वह भूमिहीन न रहे। इसमें यह भी प्रावधान है कि केन्द्र द्वारा अधिसूचित ओबीसी को अपने पास तीन और राज्य द्वारा अधिसूचित ओबीसी को दस एकड़ जमीन अपने पास रखनी होगी। मेधालय में में जमीनों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी है। ‘दि मेघालय ट्रांसफर आॅफ लैंड (रेग्युलेशन) एक्ट 1971 में प्रावधान है कि कोर्इ भी जमीन आदिवासी को नहीं बेची जा सकती। 1972 में हिमाचल में एक सख्त कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत बाहर के लोग हिमाचल में जमीन नहीं खरीद सकते थे। दरअसल हिमाचल इस वक्त इतना सम्पन्न नहीं था।

डर था कि कहीं हिमाचल के लोग बाहरी लोगो को अपनी जमीन न बेच दें। जाहिर सी बात थी कि वो भूमिहीन हो जाते। भूमिहीन होने का अर्थ है कि अपनी संस्कृति और सभ्यता को भी खोने का खतरा। दरअसल हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ यसवंत सिंह परमार ये कानून लेकर आ गए थे। लैंड रिफॉर्म एक्ट 1972 में प्रावधान के तहत एक्ट के 11वे अध्याय में में धारा -118 के तहत हिमाचल में कृषि भूमि नही खरीदी जा सकती।

गैर हिमाचली नागरिक को यहां जमीन खरीदने की इजाजत नही। कमर्शियल प्रयोग के लिए आप जमीन किराए पे ले सकते हैं। 2007 में धूमल सरकार ने धारा -118 में संशोधन किया और कहा कि बाहरी राज्य का व्यक्ति, जो हिमाचल में 15 साल से रह रहा है, वो यहां जमीन ले सकता है। इसका बड़ा हुआ और बाद में अगली सरकार ने इसे बढ़ा कर 30 साल कर दिया।दुर्भाग्य से जिस जमीन को बचाकर नीति नियंताओं ने गांवों को बसाने की नीतियां बनानी चाहिये थी वे बेशर्मी के साथ सबसे पहले जमीनों को बेचने में लग गर्इ। उत्तराखंड में हमेशा जमीनों के सवाल को लेकर जनता आंदोलित रही है।

राज्य आंदोलन के समय भी यह मांग रही है कि राज्य में ऐसा भू-काननू आना चाहिये जिससे हमारी जमीनों को बेचने से रोका जाये। लेकिन सरकारें लगातार जनता को गुमराह कर इन जमीनों के सौदे करती रही हैं। आज जब मुख्यमंत्री और उनके नीति-नियंता यह बात कर रहे हैं कि वे पलायन को रोकना चाहते हैं तो वे जमीनों के सवाल पर चुप क्यों हैं? क्या हम यह उम्मीद लगा सकते हैं कि कोरोना त्रासदी को जिस तरह मुख्यमंत्री ‘अवसर’ के रूप में देख रहे हैं, यह अवसर भूमि कानूनों को बदलने के लिये भी होगा या हमेशा की तरह हवार्इ विकास की बात होती रहेगी।

अगर सरकार समझती है कि पहाड़ से पलायन को रुकना चाहिये तो सबसे पहले उन्हें गांवों को बसाने की बात करनी चाहिये। गांव बसाने के लिये जमीन चाहिये। जमीन के लिये जनपक्षीय भू-कानून और भू-प्रबंधन चाहिये। क्या सरकार ऐसा सोच रही है? अगर सोच रही होती तो हमारी जमीनों को लीज पर देकर ‘कांटेक्ट फार्मिंग ’ के बहाने बड़े पूंजीपतियों के हवाले करने की साजिश नहीं करती।

जब लोग कोरोना संकट से जूझ रहे थे सरकार ने चुपके से ‘कांटेक्ट फार्मिंग’ का मसौदा पास करा दिया। सरकार ने प्रदेश में सोलर प्लांट लगाने के नाम पर लोगों की जमीनों को लीज पर देने के लिये बड़े निवेश का प्रस्ताव पहले से ही किया हुआ है। और भी बहुत सारी योजनायें सरकार की प्रस्तावित हैं, जो बड़े पैसे वालों के लिये पहाड़ के गांवों की जमीनों को खरीदने का रास्ता तैयार करती हैं।

सरकार उन लोगों को अपनी जमीन पर कुछ करने को प्रोत्साहित नहीं करती जो लगातार पहाड़ छोड़ने को मजबूर हैं। अलग राज्य बनाने के बाद भी पर्वतीय कृषि उत्पादों का न तो राज्य सरकारों ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है और न ही उनकी खरीद की गारंटी की गई है. पूरे देश में और हमारे राज्य के मैदानी जिलों में भी सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर उसके खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र खोले जाते हैं. मगर पहाड़ के कृषि उत्पादों जैसे–चौलाई (रामदाना), राजमा, गहत, भट्ट, मडुआ, मॉस (उडद), मिर्च, हल्दी, मसाले, आलू, मूली, गडेरी, अदरक, माल्टा, संतरा, आम, आडू, खुमानी आदि का न तो राज्य सरकार ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है और न ही इसकी खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र खोले गए हैं.

Share709SendTweet443
Previous Post

जोशीमठ को ओबीसी की केन्द्रीय सूची मे दर्ज कराने की मांग

Next Post

चमोली जिले का कोरोना रिकवरी प्रतिशत 99.12 पहुंचा

Related Posts

उत्तराखंड

सामाजिक क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए बॉबी शर्मा सम्मानित

June 21, 2026
22
उत्तराखंड

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस साफ मैराथन का आयोजन, योगासन का प्रदर्शन

June 21, 2026
60
उत्तराखंड

कर्णप्रयाग नगर पालिका अध्यक्ष गणेश शाह कर रहे थराली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी

June 21, 2026
63
उत्तराखंड

कर्णप्रयाग एवं नगरासू में निहंग सिखों के द्वारा किए गए उपद्रव के बाद चमोली, पुलिस, प्रशासन सतर्क

June 21, 2026
58
उत्तराखंड

नंदानगर की निहारिका ने उठाया जागर गायन का बीड़ा

June 21, 2026
98
उत्तराखंड

विश्व योग दिवस पर मैराथन दौड़ का आयोजन कैल गांव के धावकों का दबदबा रहा

June 21, 2026
50

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67703 shares
    Share 27081 Tweet 16926
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45783 shares
    Share 18313 Tweet 11446
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38060 shares
    Share 15224 Tweet 9515
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37448 shares
    Share 14979 Tweet 9362
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37360 shares
    Share 14944 Tweet 9340

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

सामाजिक क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए बॉबी शर्मा सम्मानित

June 21, 2026

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस साफ मैराथन का आयोजन, योगासन का प्रदर्शन

June 21, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.