डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
देश को आजादी मिले आज 75 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं एवं उत्तराखंड राज्य को बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं इतने वर्षों में कई राजनीतिक पार्टियां आई और चली गई कई दिग्गज नेता -मंत्री कैबिनेट- केंद्रीय मंत्री -विधायक -सांसद इस राज्य को मिले जिनके द्वारा चुनावो में वोट लेने के लिये पहाड़ों के विकास के लिए बड़े-बड़े दावे करते हुए सत्ता में काबिज हुए पहाड़ों में ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. ऐसा ही एक मामला मोरी विकासखंड के दूरस्थ गांव पवाणी के ग्रामीणों के सामने आया. यहां पवाणी गांव के ग्रामीणों का मुख्य मार्ग और विश्व प्रसिद्ध हरकीदून ट्रेक को जोड़ने वाला सूपिन नदी पर बना लकड़ी का पुल कई वर्षों से क्षतिग्रस्त स्थिति में था.इस पर ग्रामीण और ट्रेकर्स जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे थे. जब प्रशासन और वन विभाग ने ग्रामीणों की नहीं सुनी, तो अब ग्रामीणों ने सूपिन नदी के तेज बहाव पर स्वयं ही पुलिया का निर्माण शुरू कर दिया है. ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में कई बार वन विभाग के कर्मचारियों को भी अवगत कराया गया था. लेकिन विभाग के अधिकारी सुनने को तैयार नहीं हुए. इसलिए उन्होंने स्वयं सूपिन नदी में पुलिया का निर्माण करना शुरू कर दिया. ग्राम प्रधान ने बताया कि वन विभाग की ओर से ट्रेक पर जाने वाले ट्रेकर्स से शुल्क भी लिया जाता है. लेकिन फिर भी उनकी सुगम आवाजाही के लिए पुलिया का निर्माण नहीं किया गया. उन्होंने बताया कि हर दिन ग्रामीण इस पुलिया से अपने खेतों और गोशालाओं में जाते हैं. हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है. इसलिए अब ग्रामीणों ने स्वयं ही क्षतिग्रस्त पुलिया को तोड़कर नई पुलिया का निर्माण शुरू कर दिया है. यश ने कहा कि एक दो दिन में कार्य पूरा होने के बाद पुलिया पर सुरक्षित आवाजाही हो पाएगी. वहीं, इस संबंध में जब वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया गया तो उनका नंबर नहीं लग पाया. ग्रामीणों ने वन विभाग से जल्द ही स्थाई पुलिया का निर्माण करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि यदि जल्द स्थाई निर्माण नहीं किया गया, तो वह संबंधित विभाग के खिलाफ आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे. इसकी जिम्मेदारी विभाग की होगी. इसे गांव का दुर्भाग्य कहें या शासन-प्रशासन की लापरवाही। लेकिन, यह सच है आजादी के सात दशक बाद भी सीमांतवर्ती जिले के गांव में ग्रामीण मूलभूत सुविधा यातायात, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल किल्लत से परेशान हैं। इन गांवों में ग्रामीण विकटता में जीवन जी रहे हैं। सरकारें बदली निजाम बदले लेकिन आजादी के 70 साल बाद पहाड़ो के हालात आज भी जस के तस वहीं के वासिन्दो के हाल पर ज्यों के त्यों छोड़ गयें है जो कि सरकारी दावों की हकीकत मे कितनी सच्चाई है उसकी पोल खोलने के लिए काफी है राहत मांगी गई लेकिन हुआ गया, कुछ नहीं। प्रशासनिक अधिकारी समस्याओं पर तमाशबीन बने हुए हैं। जनप्रतिनिधियों की तरह अधिकारी भी सिवाय कोरी घोषणाएं करने के अलावा कोई राहत नहीं दे सके हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












