डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में मानसून के दौरान बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएं हर साल जनजीवन को प्रभावित करती हैं. प्रदेश के पर्वतीय जिलों चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पिथौरागढ़ में मौसम कुछ ही मिनटों में करवट ले लेता है. ऐसे में स्थानीय स्तर पर सटीक और तत्काल मौसम निगरानी के लिए प्रस्तावित डॉप्लर मौसम रडार अब भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाए हैं. सालों से मौसम निगरानी तंत्र कागजों में अटका हुआ है. उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियां मौसम पूर्वानुमान को और अधिक चुनौती बना देती है. ऊंचे पहाड़, गहरी घाटियां और सीमित संचार व्यवस्था के चलते किसी एक स्थान पर दर्ज मौसम की जानकारी दूसरे क्षेत्र वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं बता पाता है. उत्तराखंड में नए डॉप्लर रडार लगाने की चर्चा पिछले कई सालों से हो रही है. कभी भूमि चयन, कभी रक्षा मंत्रालय से अनुमति और कभी केंद्र व राज्य विभागों के बीच समन्वय की प्रक्रिया के चलते परियोजना आगे बढ़ती दिखाई दी. साल 2023 में मौसम विभाग ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पांच छोटे डॉप्लर रडार लगाने का प्रस्ताव शासन को भेजा था, लेकिन उस समय भी अंतिम स्वीकृति का इंतजार होता रहा. उस दिशा में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई. ऐसे में अब प्रदेश के तीन स्थानों पर डॉप्लर रडार लगाए जाने की चर्चाएं चल रही है. यही वजह है कि चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर मौसम निगरानी की जरूरत लगातार महसूस होती रही है. बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री क्षेत्रों में अचानक मौसम खराब होने का असर यात्रियों, स्थानीय निवासियों और सड़क संपर्क पर पड़ता है. उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने के लिए रक्षा भू-स्थानिक अनुसंधान प्रतिष्ठान (डीजीआरई) की ओर से राज्य के 9 जिलों में ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (एडब्ल्यूएस) स्थापित किए जाने का निर्णय लिया गया था. सबसे ज्यादा 8 एडब्ल्यूएस उत्तरकाशी और टिहरी जिले में लगाए जाने की बात कही गई थी.इसके अलावा पौड़ी में 7, देहरादून में 5, रुद्रप्रयाग में 3, बागेश्वर में 3, अल्मोड़ा में 2 और नैनीताल में 1 और हरिद्वार में 1 एडब्ल्यूएस स्थापित किया जाना था. इसके साथ ही भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की ओर से देहरादून, अल्मोड़ा, चंपावत और चमोली जिलों में से किन्हीं तीन जिलों में डॉप्लर रडार लगाए जाने पर जोर दिया गया था, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया है. हालांकि, कालसी, पंतनगर और रुड़की में डॉप्लर रडार लगाए जाने की कागजी कार्रवाई चल रही है. इस योजना के तहत बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और रडार स्थापित करने के साथ ही उसके संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी भारत मौसम विज्ञान विभाग की रहेगी.वर्तमान समय में प्रदेश के तीन स्थानों पर डॉप्लर रडार लगाए जाने के लिए आईएमडी में कमेटी का गठन किया है. जिसकी एक बैठक हो चुकी है. ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि कमेटी की कुछ और बैठकों के बाद ये तय कर लिया जाएगा कि कितनी संख्या में किस तरह के उपकरण लगाए जाने हैं. उसके बाद आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से इक्विपमेंट्स लगाए जाएंगे. र्तमान समय में तीन डॉप्लर रडार संचालति हैं, जिसको बढ़ाए जाने पर जोर दिया जा रहा है. इसके लिए उन्होंने आईएमडी के डीजी से मुलाकात की थी. साथ ही अनुरोध किया था कि प्रदेश में जहां पर भी गैप एरिया है, वहां पर डॉप्लर रडार या ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन लगाए जाने पर विचार किया जाए.साथ ही ये भी कहा गया था कि जहां पर आईएमडी लगा सकता है, वहां पर आईएमडी लगाए, नहीं तो आपदा प्रबंधन विभाग लगाएगा. जिसको लेकर आईएमडी की स्टडी चल रही है. ऐसे में जगहों को चिन्हित करने के बाद जब आईएमडी बताएगा, उसके बाद आपदा प्रबंधन विभाग रडार लगाएगा.उन्होंने बताया कि इसके लिए आईएमडी में कमेटी भी बनी हुई है, जिसमें आपदा प्रबंधन विभाग के एक्सपर्ट्स भी शामिल है. इस कमेटी की बैठक भी हो चुकी है. ऐसे में फिलहाल कमेटी के लोग विचार कर रहे हैं कि कितनी संख्या में, किस प्रकार के उपकरण और उन उपकरणों के स्पेसिफिकेशन क्या होंगे? इससे संबंधित रिपोर्ट मिलने के बाद आपदा प्रबंधन विभाग लगाने की कार्रवाई करेगा. उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाएं लोगों पर कहर ढाती रही हैं. खासतौर पर मानसून सीजन के दौरान तो ऐसी घटनाएं हर साल राज्य को खासा नुकसान पहुंचाती हैं. ऐसे में राज्य सरकार भी इन खतरों को देखते हुए खुद को इसके लिए तैयार कर रही है. छोटे रडार स्थापित किए जाने के मामले में राज्य सरकार कुछ सुस्त मोड में नजर आ रही है. बेहद जरूरी होने के बावजूद मौसम विभाग का छोटे रडार लगाने का प्रस्ताव अब तक शासन में अंतिम मंजूरी नहीं पा सका है. प्राकृतिक आपदाओं के खतरों को कम करने के लिए टेक्नोलॉजी अपना अहम रोल निभाती है. मौसम विभाग भी इसी टेक्नोलॉजी के जरिए उन तमाम मौसमीय घटनाओं की भविष्यवाणी करता है. ये टेक्नोलॉजी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान इंसानी जिंदगियों के लिए अहम योगदान निभाती है. फिलहाल, उत्तराखंड को प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए फूल प्रूफ प्लान की जरूरत है. इसके लिए मौसम विभाग को ऐसे छोटे डॉप्लर रडार चाहिए जो उन क्षेत्रों को भी कवर कर सके, जहां बड़े डॉप्लर रडार की पहुंच नहीं है. इसके लिए मौसम विभाग की तरफ से राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के साथ हुई बैठक के दौरान प्रस्ताव रखा गया था. जिसमें राज्य भर में करीब पांच छोटे डॉप्लर रडार की जरूरत को महसूस किया गया. डॉप्लर रडार के प्रस्ताव पर अब तक सरकार की तरफ से कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है. इसीलिए इन्हें जल्द स्थापित किया जा सकेगा. इसकी भी संभावना कम नजर आ रही है. डॉप्लर रडार के जरिए न केवल बारिश की सटीक जानकारी मिलेगी, बल्कि बर्फबारी और एवलांच के साथ ही ओलावृष्टि और बादल फटने जैसी घटनाओं को भी काफी हद तक पहले ही प्रिडिक्ट किया जा सकता है. यानी यह डॉप्लर रडार प्रदेश में तमाम प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं के लिहाज से बेहद अहम है. उत्तराखंड प्राकृतिक आपदा के लिहाज से संवेदनशील राज्य है. ऐसे में मौसमीय भविष्यवाणी को लेकर यदि किसी प्रस्ताव को रखा जाता है तो उसको तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए. प्रदेश में आगामी मानसून सीजन के दौरान यह डॉप्लर काफी अहम हो सकता है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











