डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड सहित कई हिमालयी राज्यों में अच्छी बर्फबारी और बारिश देखने को मिली. ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ की सफेद चादर बिछ गई, जिससे लोगों को कुछ राहत जरूर मिली. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह राहत अस्थायी है. जिस तरह से शुरुआती महीनों में बारिश और बर्फबारी नहीं हुई, उसकी भरपाई सिर्फ एक-दो स्पेल से नहीं हो सकती. आने वाले हफ्तों में लगातार पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय नहीं हुआ, तो इसका असर गर्मियों में साफ नजर आएगा. वैश्विक स्तर पर सिंचाई में हुआ आधे से अधिक यानी 52 फीसदी विस्तार उन क्षेत्रों में दर्ज किया गया जो वर्ष 2000 में पहले ही जल संकट की समस्या से जूझ रहे थे। आंकड़ों की मानें तो भारत इसके 36 फीसदी के लिए जिम्मेवार है।इसमें कोई शक नहीं कि वैश्विक स्तर पर कृषि पैदावार में इजाफे के लिए सिंचाई की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन एक नए अध्ययन में सामने आया है कि कैसे पर्यावरण को ताक पर रख सिंचाई में हुआ बेतहाशा विस्तार हानिकारक रहा है। इस वृद्धि के चलते प्रकृति और अन्य मानव आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। यह अध्ययन अमेरिका, जर्मनी, फिनलैंड और चीन के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे जर्नल नेचर वाटर में प्रकाशित हुए हैं।आंकड़ों की माने तो मौजूदा समय में इंसानों के उपभोग के काबिल 90 फीसदी से अधिक जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जा रहा है। कृषि भूमि के करीब 24 फीसदी हिस्से पर सिंचाई की व्यवस्था है, जो दुनिया का करीब 40 फीसदी खाद्य उत्पादित कर रहा है।भारत के समकालीन संकटों में जल सबसे अधिक चर्चित है, पर सबसे कम समझा गया भी। सूखा, बाढ़, गिरता भूजल, प्रदूषित नदियाँ—इन सबको हम अलग-अलग घटनाओं की तरह देखते हैं, जबकि ये एक ही कहानी के अलग अध्याय हैं। यह कहानी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि मानवीय विस्मृति की है। हमने जल को केवल संसाधन समझ लिया और उसके साथ जुड़ी स्मृति, संस्कार और संवेदना को त्याग दिया।बाँध बनाकर पानी को ज़मीन के ऊपर रोकने का विचार आधुनिक विकास की सबसे बड़ी भ्रांतियों में से एक है। यह व्यवस्था प्रकृति के स्वभाव के विरुद्ध खड़ी की गई है। जल का स्वभाव ठहरना नहीं, उतरना है—धरती की कोख में समाना, वहाँ से जीवन को पोषित करना। तालाब, जोहड़, कुएँ और बावड़ियाँ इसी स्वभाव की अभिव्यक्ति थे। वे पानी को रोकते नहीं थे, सहेजते थे। यही कारण है कि वे समय-सिद्ध और स्वयं-सिद्ध व्यवस्थाएँ थीं, जिन्होंने लाखों वर्षों तक मानव सभ्यता का साथ दिया।आज हम बाँधों को विकास का प्रतीक मानते हैं, जबकि तालाबों को पिछड़ेपन की निशानी समझते हैं। यह दृष्टि का पतन है। एक समय पंजाब में सत्रह हज़ार से अधिक तालाबों का उल्लेख मिलता है। वे केवल जलस्रोत नहीं थे, बल्कि सामुदायिक जीवन के केंद्र थे—पशुओं, खेतों, पक्षियों और मनुष्यों को जोड़ने वाले जीवित स्थल। आज स्थिति यह है कि तालाब तो दूर, पंजाब में शामलात ज़मीनों तक का समुचित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं। जब स्मृति मिटा दी जाती है, तो संकट अपरिहार्य हो जाता है।हमारे पुरखे जानते थे कि बाढ़ विनाश नहीं, अवसर है। वे जानते थे कि यदि बाढ़ का पानी फैलकर तालाबों, जोहड़ों और मैदानों में उतरे, तो वही पानी धरती को पुनर्जीवित करेगा। इसलिए तालाबों से मिट्टी निकालने की परंपराएँ थीं—कोई इसे श्रमदान कहता था, कोई सामाजिक कर्तव्य। तालाब गहरे होते थे, उनकी कोख विस्तृत होती थी और वे वर्षा के अधिकतम जल को आत्मसात कर लेते थे। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें तकनीक नहीं, समझ काम करती थी।विडंबना यह है कि जिन हाथों ने तालाबों को पाटा, जोहड़ों को भर दिया और कुओं को कचरे से बंद कर दिया, वही हाथ आज पानी के लिए आसमान की ओर देख रहे हैं। तालाबों को मारने वाले जब स्वयं मरने लगते हैं, तो दोष प्रकृति पर, जलवायु परिवर्तन पर या पूर्वजों पर मढ़ दिया जाता है। आत्मालोचना का साहस अब दुर्लभ होता जा रहा है।यह संकट केवल जल का नहीं, शिक्षा का भी है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि ठीक से शिक्षित होने का अर्थ क्या है। क्या यह केवल डिग्रियाँ, आंकड़े और तकनीकी शब्दावली है? नहीं। ठीक से शिक्षित होने का अर्थ है सामवेदी होना—भगवत्ता द्वारा प्रदत्त पूरे इकोसिस्टम से एकात्म होना। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानने लगता है, तब उसका ज्ञान चतुराई बन जाता है और चतुराई अंततः विनाश की ओर ले जाती है। शेष सब तो बकलोली के ही परिष्कृत रूप हैं।देश में जल-प्रबंधन की स्थिति का अंदाज़ा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि आज तक ऐसा कोई विस्तृत, विश्वसनीय और समग्र सर्वेक्षण नहीं हो सका है, जिससे यह पता चले कि भारत में वास्तव में कुल जल कितना है। हम योजनाएँ बनाते हैं, बजट स्वीकृत करते हैं और घोषणाएँ करते हैं—बिना यह जाने कि आधार क्या है। यह नीति नहीं, अनुमान है; और अनुमान पर खड़ा विकास देर-सवेर ढहता ही है।पर्यावरण की कीमत पर होने वाला विकास उसी डाल पर बैठने जैसा है, जिसे हम स्वयं काट रहे हैं। यह स्थिति कालिदास की कथा की याद दिलाती है—जहाँ मूर्खता को विद्वत्ता का आवरण ओढ़ा दिया जाता है। चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें और चमकदार परियोजनाएँ हमें प्रगति का भ्रम देती हैं, जबकि भीतर से ज़मीन सूख रही होती है। यह विकास नहीं, सजाया हुआ विनाश है।शहर इस विफलता के सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। आधुनिक विद्या-केन्द्रों और नीति-निर्माताओं के पास आज भी कोई समग्र दृष्टि नहीं है, जिसके अनुसार भारतीय शहरों में जल-निकासी, जल-संरक्षण, गंदगी के उत्पादन में कमी और उत्पन्न गंदगी के उपयोग का कोई राष्ट्रीय ढाँचा हो। बारिश में शहर डूबते हैं और गर्मियों में वही शहर प्यास से कराहते हैं। यह विरोधाभास व्यवस्था की नहीं, दृष्टि की असफलता का प्रमाण है।नदियों की हालत इस कहानी का सबसे मार्मिक अध्याय है। प्रदूषित नदियों की सूची इतनी लंबी हो चुकी है कि उसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो हम किसी मृतकों की नामावली देख रहे हों। जिन नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया, आज वे हमारी लापरवाही की शिकार हैं। हम उन्हें माँ कहते हैं, पर व्यवहार ऐसा करते हैं मानो वे अनंत सहनशील हों। यह सांस्कृतिक पाखंड अब अपनी सीमा पर पहुँच चुका है।अभी कुछ ही दशक पहले तक भारत के शहर, गाँव, चरागाहें, खेत, जंगल, तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ जीवन से भरे हुए थे। यह कोई आदर्शीकृत अतीत नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति का तथ्य है। उस समय संसाधन सीमित थे, पर समझ व्यापक थी। समुदाय था, सहभागिता थी और प्रकृति के साथ सहजीवन का भाव था। सरकारी विकास कार्यक्रमों ने इस सामाजिक चरित्र को छिन्न-भिन्न कर दिया। योजनाएँ बढ़ीं, पर समाज सिकुड़ गया।आज आवश्यकता इस बात की है कि जल-प्रबंधन को केवल इंजीनियरों और योजनाकारों के हवाले न छोड़ा जाए। यह प्रश्न तकनीकी से अधिक नैतिक और सांस्कृतिक है। तालाबों का पुनर्जीवन, जोहड़ों की वापसी, वर्षा-जल संचयन और सामुदायिक भूमि की रक्षा—ये सब भविष्य की खोज नहीं, अतीत की स्मृति हैं। हमें पीछे लौटना नहीं, बल्कि याद करना है।जल कोई वस्तु नहीं, एक संबंध है—मनुष्य और प्रकृति के बीच। जब यह संबंध टूटता है, तो आपदाएँ जन्म लेती हैं। समय अभी भी है, पर चेतावनी स्पष्ट है। यदि हमने जल के साथ अपना रिश्ता नहीं सुधारा, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा, जिसने अपनी ही धरती को प्यास से मार दिया। यह रिपोर्ट बताती है कि कई क्षेत्र अपनी जल-क्षमताओं से अधिक उपयोग कर रहे हैं और महत्वपूर्ण जल प्रणालियां पहले ही दिवालिया हो चुकी हैं. संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के अनुसार, मानवता की 75% आबादी जल-असुरक्षित या गंभीर रूप से जल-असुरक्षित देशों में रहती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के 70% प्रमुख भूजल स्रोत गिरते स्तर का सामना कर रहे हैं और 4 अरब लोग हर साल कम से कम एक महीने पानी की भारी किल्लत झेलते हैं.वित्तीय शब्दावली का उपयोग करते हुए, यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि कई समाज अपनी जल-क्षमताओं से कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं. उन्होंने न केवल नदियों, मिट्टी और बर्फ से मिलने वाली वार्षिक नवीकरणीय जल “आय” को खत्म कर दिया है, बल्कि भूजल, ग्लेशियरों और आर्द्रभूमि में जमा अपनी दीर्घकालिक “बचत” को भी निकाल लिया है.इस अस्थिर खर्च का परिणाम पारिस्थितिक दिवालियापन के बढ़ते बहीखाते के रूप में सामने आया है. सिकुड़ते भूजल स्रोत, धंसते हुए डेल्टा और तटीय शहर, गायब होती झीलें और आर्द्रभूमि, और स्थायी रूप से नष्ट होती जैव विविधता. वैश्विक डेटासेट और नवीनतम विज्ञान के आधार पर, यह रिपोर्ट अपनी जल-क्षमताओं से परे जीने वाले ग्रह की एक डरावनी सांख्यिकीय तस्वीर पेश करती है-एक ऐसी वास्तविकता जो पूरी तरह से मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा हुई है. प्रदेश भर के 400 से ज्यादा प्राकृतिक जल स्रोतों पर संकट मंडरा रहा है. इन प्राकृतिक स्रोतों में धीरे धीरे पानी कम हो रहा है. गर्मियों में ये परेशानी और भी ज्यादा बढ़ गई है सूखते जल स्रोतों को जीवित रखने के लिए सरकार की तरफ से विशेषज्ञों की मौजूदगी वाली स्प्रिंगशेड एंड रिवर रिजूवेनेशन एजेंसी (सारा) का गठन किया गया. इसकी तरफ से सरकार को अध्ययन के आधार पर सुझाव भी दिए जा रहे हैं, इसके बाद भी प्रदेश में जल स्रोत सूख रहे हैं. जल संस्थान की तरफ से भी जल स्रोतों में सूख रहे पानी की भी स्थिति के आंकड़े एजेंसी को दिये गये हैं. जिन 460 जल स्रोतों में पानी कम होने की बात की जा रही है उनका भी एजेंसी के माध्यम से अध्ययन किया जा रहा है. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इस बार मौसम में काफी बदलाव देखा जा रहा है. काफी वक्त से बारिश नहीं होने के कारण भीषण गर्मी से भी लोगों को जूझना पड़ रहा है. इसके लिए अंधाधुन पेड़ों का कटान और पहाड़ों पर बेतरतीब बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य को भी वजह माना जा रहा है. मौजूद आंकड़ों के अनुसार पौड़ी में 72, चमोली में 69, टिहरी में 37, उत्तरकाशी में 36, देहरादून में 31, रुद्रप्रयाग में 18, बागेश्वर में 21, चंपावत में 19, पिथौरागढ़ में 47, अल्मोड़ा में 92, और नैनीताल में 35 जल स्रोतों का पानी कम हुआ है. उधर दूसरी तरफ प्रदेश में 400 से ज्यादा बस्तियां ऐसी हैं जहां पानी का संकट खड़ा हो गया है.वस्तुत: पानी हमारे प्रतिदिन के जीवन के लिए महत्वपूर्ण है और पृथ्वी पर हमारा अस्तित्व इसी से है. पृथ्वी पर मौजूद कुल पानी का लगभग ढाई प्रतिशत ही मीठा पानी है और बढ़ती जनसँख्या और पानी के दुरुपयोग के कारण मीठे पानी की कमी अब नजर आने लगी है. जल संकट एक ऐसी स्थिति है, जहां किसी क्षेत्र के भीतर उपलब्ध पीने योग्य, अप्रदूषित पानी उस क्षेत्र की मांग से कम हो जाता है. भूजल पृथ्वी पर मीठे पानी का सबसे बड़ा स्रोत है जो हमारे जीवन को समृद्ध करता है. हालांकि, सतह के नीचे संग्रहित होने के कारण, इसे अक्सर अनदेखा किया जाता है. जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बदतर होता जाएगा, भूजल अधिक से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा. हमें इस बहुमूल्य संसाधन को स्थायी रूप से प्रबंधित करने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता है.सचेत भूजल मेघ से बाहर हो सकता है, लेकिन यह मेधा से बाहर नहीं होना चाहिए. भूजल को प्रदूषण से बचाना और स्वयं जरूरतों को संतुलित करते हुए इसका स्थायी रूप से उपयोग करना चाहिए. तभी जल हमें और हमारे कल को बचाएगा. आखिर! यह हमारी आने वाली पीढ़ी की अनमोल धरोहर है. इसे सार-संभाल कर रखने की जिम्मेदारी हमें ही मिलकर निभानी होगी.अन्यथा रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून. पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून.वर्षों पुराना यह दोहा कभी नीतिवाद से प्रेरित लगता था, लेकिन आज यह सच साबित होता दिख रहा है. बढ़ते जल संकट को लेकर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का कहना था कि, अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर लड़ा जाएगा. भविष्य में जल के भयावह संकट की चेतावनी दी थी!जल संकट से बचने का उपाय हमें सतर्क और सजग रहकर हर हाल खोजना होगा. अन्यथा जन-जीवन का अस्तित्व ही समाप्त. आईये, हम सब मिलकर जल को बचाएं, जल हमारा जीवन बचाएगा.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं












