• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

आर्थिक मोर्चे पर तो अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन पारिस्थितिक चिंताओं का क्या?

09/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
14
SHARES
17
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
वर्ष 2000 में राज्य के गठन के बाद से, प्रवासन, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण लगभग दो लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो गई है। सटीक भूमि उपयोग मानचित्रण हमें लक्षित वृक्षारोपण, बागवानी और आजीविका कार्यक्रमों की योजना बनाने में उत्तराखंड के विकास का मूल आधार आर्थिक और सामाजिक विकास होना चाहिए, जिसमें स्थिरता और आध्यात्मिकता समाहित हों। राज्य की अनूठी पारिस्थितिक विशेषताओं, नाजुक हिमालयी भूभाग और जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए यह अत्यावश्यक है। यहां विकास पारंपरिक ढांचे का अनुसरण नहीं कर सकता; यह पर्यावरण चेतना में गहराई से निहित होना चाहिए। आर्थिक और सामाजिक विकास में वृद्धि ही हमारे लोगों की आकांक्षाओं और सामाजिक चुनौतियों का एकमात्र सच्चा समाधान है।इसके अलावा, दो अन्य समान रूप से महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। पहला है सामाजिक क्षेत्र का विकास, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी सेवाओं का वितरण शामिल है, विशेष रूप से दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों में। दूसरा है उत्तराखंड के आध्यात्मिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना, जो देवभूमि के रूप में राज्य की पहचान का अभिन्न अंग है। आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को एक सुनियोजित और सतत तरीके से विकसित किया जाना चाहिए।ये प्राथमिकताएँ मुख्यमंत्री द्वारा व्यक्त सशक्त उत्तराखंड की परिकल्पना और प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप हैं, जिनका उत्तराखंड से गहरा संबंध है और वे एक मजबूत स्तंभ रहे हैं। यदि हम गहराई से देखें, तो कृषि और उससे संबंधित गतिविधियाँ जैसे बागवानी, पशुपालन आदि एक मूलभूत क्षेत्र के रूप में उभरती हैं। राज्य की लगभग 40-45 प्रतिशत आबादी कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों पर निर्भर है, फिर भी सकल राज्य घरेलू उत्पाद में इसका योगदान केवल 9 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। इसलिए, कृषि में उत्पादकता, किसानों के पारिश्रमिक और मजबूती को बढ़ाना हमारी विकास रणनीति का केंद्रबिंदु होना चाहिए।पर्यटन एक और प्रमुख क्षेत्र है, लेकिन इसके लिए सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उत्तराखंड की स्थायी आबादी लगभग 14-15 मिलियन है, लेकिन प्रवासी आबादी इससे चार से पांच गुना अधिक है। बुनियादी ढांचे और पर्यावरण पर इस दबाव को प्रबंधित करते हुए राज्य और इसके निवासियों के लिए मूल्य सृजित करना एक बड़ी चुनौती और अवसर है। इसका समाधान मात्रा-आधारित पर्यटन को स्थानीय वस्तुओं और सेवाओं की खपत बढ़ाने के साथ संतुलित करने में निहित है, जिसके लिए उच्च-मूल्य, अनुभव-आधारित और टिकाऊ पर्यटन की आवश्यकता है।हमें यह भी समझना होगा कि  व्यावहारिक रूप से एक ही राज्य के भीतर दो सहजीवी पारिस्थितिकी तंत्रों का समूह है। पहाड़ी क्षेत्र लगभग 86 प्रतिशत भूभाग पर फैले हैं, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इनका योगदान लगभग एक तिहाई है, जबकि मैदानी क्षेत्र – जो केवल 14 प्रतिशत हैं – में 60/65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या और आर्थिक गतिविधियां होती हैं। इसलिए विकास रणनीतियों में अंतर करना आवश्यक है। पहाड़ियों बनाम मैदानों की बहस को, जो कभी-कभी सुनाई देती है, एक समान दृष्टिकोण वाली पर्वतीय और मैदानी रणनीति से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। मैदानी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मुख्य कृषि आधारित आधार और मजबूत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसे विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, पूंजीगत वस्तुओं और फार्मास्यूटिकल्स में एक नई गति की आवश्यकता है, जिसे इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा पर नीतियों के माध्यम से सक्रिय रूप से मजबूत किया जाना चाहिए।स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी प्रबंधन, आपदा प्रबंधन और संपर्क, विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में, महत्वपूर्ण अंतर-क्षेत्रीय प्राथमिकताएं बनी हुई हैं।, राज्य और उसके निवासियों के लिए स्वच्छता, रोजगार सृजन और धन सृजन पर केंद्रित एक व्यापक अपशिष्ट प्रबंधन रणनीति पर भी काम हो रहा है। इसके अलावा, एक आदर्श नगरपालिका अधिनियम भी तैयार किया जा रहा है। एनसीडब्ल्यू के साथ विवाहपूर्व संवाद, नवजात मृत्यु दर में कमी, बाल पोषण स्तर में सुधार, टाटा ट्रस्ट्स के साथ स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) क्षेत्र में वित्तीय समावेशन और मानसिक स्वास्थ्य, मासिक धर्म स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में सक्रिय संवाद जैसी पहल शुरू हो चुकी हैं या शुरू होने वाली हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि आपदा प्रबंधन को राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर पूर्वानुमानित, तकनीक-आधारित और दूरदर्शिता-संचालित योजना की ओर बढ़ना चाहिए। आपदा प्रबंधन को संकट प्रबंधन दृष्टिकोण से बदलकर बड़े पैमाने पर आर्थिक अवसर में बदलने और शहरी स्थानीय निकायों को मजबूत करने के मॉडल मौजूद हैं, ताकि शहरी जीवन, आर्थिक गतिविधि और रोजगार सृजन में सुधार हो सके।यह वास्तव में हमारे सामने मौजूद सबसे जटिल चुनौतियों में से एक है। हिमालयी क्षेत्र भूवैज्ञानिक रूप से नवगठित और स्वभाव से ही नाजुक है, जिसके लिए एक ऐसे विकास मॉडल की आवश्यकता है जो प्रकृति के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील हो। हमें सबसे पहले यह नहीं पूछना चाहिए कि हमें बुनियादी ढांचे का निर्माण कितनी तेजी से करना चाहिए, बल्कि यह पूछना चाहिए कि कितना और कैसे करना चाहिए।निर्माण नियम, भवन निर्माण तकनीक और भूमि उपयोग नियोजन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में। हाल की आपदाओं ने हमें प्राकृतिक प्रणालियों की अनदेखी के परिणामों से अवगत कराया है—विशेष रूप से बाढ़ के मैदानों पर निर्माण के परिणामों से। जब नदियाँ अपने प्राकृतिक मार्ग पर वापस आ जाती हैं, तो मानव बस्तियों को अपूरणीय क्षति पहुँचती है।इसलिए हमें इमारतों की ऊँचाई, निर्माण सामग्री और ज़ोनिंग पर कड़े नियम लागू करने की आवश्यकता है। वन संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड का लगभग 70 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वनों से आच्छादित है। इन वनों को संरक्षित करते हुए इनके आसपास स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करने के लिए एक नए वन अर्थव्यवस्था मॉडल की आवश्यकता हैहिमनदी झीलों का निर्माण, परित्यक्त कृषि भूमि, आपदा और हाल ही में उत्तराखंड की भूकंपीय संवेदनशीलता में उच्चतम जोन 6 तक की वृद्धि जैसी सभी स्थितियों को एक गंभीर संभावित संकट से अवसर में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। भूवैज्ञानिकों का कहना है कि 1500 और 1800 के दशक में आए भूकंपों के बाद हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े भूकंप की आशंका बनी हुई है, इसलिए हमारी सोच में इस लगभग अपरिहार्य संभावना को ध्यान में रखना आवश्यक है।हमने इस बात का अध्ययन शुरू किया है कि पारिस्थितिक अखंडता को नुकसान पहुंचाए बिना, सामुदायिक भागीदारी, मूल्यवर्धन और सतत संसाधन प्रबंधन के माध्यम से वन-आधारित आजीविका को कैसे बढ़ाया जा सकता है। अंततः, आर्थिक विकास को प्रकृति के साथ आगे बढ़ना चाहिए, न कि उसके विरुद्ध।प्रौद्योगिकी—विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भू-स्थानिक उपकरण—उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं। इसका एक प्रमुख अनुप्रयोग जल सुरक्षा है। हजारों प्राकृतिक झरने, जो कभी गांवों का जीवन निर्वाह करते थे, समय के साथ सूख गए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉडलों और उच्च आवृत्ति तरंग तकनीकों का उपयोग करके भूमिगत जलधाराओं का मानचित्रण करने से हमें इन स्रोतों की पहचान करने और उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित करने में मदद मिलती है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए पहले से मौजूद संस्थागत तंत्रों को मजबूत और समावेशी बनाने की आवश्यकता है।वन अग्नि प्रबंधन एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा संचालित उपग्रह-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ आग का बहुत प्रारंभिक चरण में पता लगाने में मदद कर सकती हैं, जिससे त्वरित प्रतिक्रिया संभव हो पाती है और नुकसान कम होता है। एआई और जीआईएस परती कृषि भूमि के मानचित्रण में भी अमूल्य भूमिका निभाते हैं सक्षम बनाता है। स्वास्थ्य एक और क्षेत्र है जहाँ सेवाओं के डिजाइन और वितरण में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण है।उत्तराखंड में एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था, जिसके बोल हैं- ‘चुप रहो, शोर मत करो, मंत्री सो रहे हैं, इससे संकेत मिलता है कि सत्ताधारी वर्ग के लिए अपना आराम और शानो-शौकत उन आकांक्षाओं-अपेक्षाओं से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है, जिनके साथ यह राज्य 9 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग हुआ था। राज्य के गठन के शुरुआती वर्षों में जारी किया गया यह गाना अब केवल आंशिक सच्चाई को दर्शाता है, क्योंकि तब से एक लंबा अरसा बीत चुका है और काफी कुछ बदल चुका है।उदाहरण के लिए जिस समय यह राज्य बना था, उस समय इसकी अर्थव्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था से 1 प्रतिशत नीचे थी, लेकिन धीरे-धीरे बढ़ती हुई यह अब 1 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इस समय उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था 1.1 से 1.3 प्रतिशत के बीच है। इसी तरह, गठन के समय राज्य में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम थी, लेकिन बाद के वर्षों में बढ़ते-बढ़ते यह राष्ट्रीय स्तर से 30 से 57 प्रतिशत अधिक रही है।कर राजस्व भी राज्य बनने के बाद से हमेशा ही इसकी राजस्व प्राप्तियों का कम से कम 30 प्रतिशत रहा है। लेकिन कोविड महामारी वाले वर्ष 2020-21 को छोड़ दें तो यह 2000-01 के 31.9 प्रतिशत से अधिक ही रहा है। फिर भी जीएसटी लागू होने के बाद इसके चरम स्तर 40 प्रतिशत से अधिक के शिखर पर वापस आना बाकी है, जो नई कर व्यवस्था लागू होने से कुछ वर्ष पहले दर्ज किया गया था।राज्य सरकार का पूंजीगत व्यय हाल के वर्षों में अपने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3 प्रतिशत से धीरे-धीरे ऊपर जा रहा है, जो राज्य के अस्तित्व में आने के समय 1 प्रतिशत था। हां, 2005-06 में जरूर में इसमें एक उछाल आई थीयह राज्य के राजस्व और राजकोषीय संतुलन से भी स्पष्ट था। यह कोविड महामारी के वर्ष 2020-21 से लगातार चार वर्षों तक राजस्व अधिशेष वाला राज्य रहा और वित्त वर्ष 2025 और वित्त वर्ष 2026 में भी इसके इसी तरह का प्रदर्शन करने की उम्मीद है। इसके राजकोषीय घाटे की स्थिति दो वर्षों- 2005-06 और 2017-18 को छोड़ दें तो जीएसडीपी के 3 प्रतिशत की सीमा के भीतर ही रही। इससे पता चलता है कि उत्तराखंड द्वारा किया गया घाटा वित्त वर्ष 21 से पूंजीगत व्यय में जा रहा है।फिर भी, उत्तराखंड में जीएसडीपी के अनुपात के रूप में पूंजीगत परिव्यय ज्यादातर उसी समय के आसपास अस्तित्व में आए दो अन्य राज्यों- छत्तीसगढ़ और झारखंड से कम रहा है।उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 25 और 26 के लिए छत्तीसगढ़ में इसके 3.9 प्रतिशत और 4.1 प्रतिशत तथा झारखंड में 3.7 प्रतिशत और 4.1 प्रतिशत होने का अनुमान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में वित्तीय स्थिति बेहतर थी और उन वर्षों के लिए झारखंड में सरकार द्वारा दिए गए लोन उत्तराखंड की तुलना में कम थे। लेकिन, प्रति व्यक्ति आय जैसे मैक्रोइकनॉमिक डेटा के मामले में उत्तराखंड उपरोक्त दोनों राज्यों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में रहा है। उत्तराखंड के विपरीत दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम रही है।विकास के पटल पर उत्तराखंड अपने समकालीन राज्यों की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। उदाहरण के लिए 2019-21 के दौरान उत्तराखंड में बहुपक्षीय गरीबी दर 9.67 प्रतिशत थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 14.96 प्रतिशत था, जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ दोनों में ही राष्ट्रीय स्तर से अधिक गरीबी दर थी। साथ ही, हरिद्वार को छोड़कर उत्तराखंड के सभी जिलों में राष्ट्रीय औसत से कम गरीबी दर थी।कहा जा रहा है उत्तराखंड में विशेष रूप से पर्यटन को ध्यान में रखकर किए जा रहे आर्थिक विकास और इस पहाड़ी राज्य के पर्यावरण को बचाने की जरूरतों के बीच टकराव दिख रहा है। उत्तरकाशी के धराली गांव में घरों और होटलों को बहा ले जाने वाली अचानक आई बाढ़ सिर्फ एक दुखद उदाहरण है। भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण 2023-24 में मृत्यु दर बहुत अधिक हो गई और 2024-25 में उतनी ही थी जितनी कि उत्तर प्रदेश में जबकि यहां की जनसंख्या उत्तर प्रदेश के मुकाबले केवल 5 प्रतिशत है। साथ ही, दोनों वर्षों में उत्तर प्रदेश की तुलना में उत्तराखंड में नष्ट हुए घरों और खोए हुए मवेशियों की संख्या बहुत अधिक दर्ज की गई।उत्तर प्रदेश ने अपने प्लास्टिक कचरे को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया है। उत्तराखंड में 2020-21 में पहली बार उत्तर प्रदेश की तुलना में बहुत अधिक दर्ज किया गया। इसमें वृद्धि के लिए पर्यटकों द्वारा फैलाई जाने वाली गंदगी काफी हद तक जिम्मेदार है। यह टकराव तब भी स्पष्ट था जब उत्तराखंड से पहले के दौर में हिमालयी क्षेत्र में अर्थव्यवस्था धीमी गति से आगे बढ़ रही थी। यही वजह रही कि वहां चिपको आंदोलन और बड़े बांध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। बाद की सरकारों द्वारा बड़े बांधों से संबंधित चिंताओं को दूर करने की भरसक कोशिश करने और वन क्षेत्र में वृद्धि होने के बावजूद यह टकराव थमा नहीं है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

Share6SendTweet4
Previous Post

पिरूल हस्तशिल्प’ की शुरुआत उत्तरखंड

Next Post

सीएसएसआर प्रतियोगिता की तैयारी को लेकर एनडीआरएफ एवं एसडीआरएफ टीमों का संयुक्त अभ्यास

Related Posts

उत्तराखंड

उत्तराखंड के जनप्रिय थे ईमानदारी की मिशाल जसवंत सिंह बिष्ट

October 4, 2026
9
उत्तराखंड

केदारनाथ में उमड़ा आस्था का सैलाब जाम ने बढ़ाई यात्रियों की टेंशन

October 4, 2026
9
उत्तराखंड

बाबा में हुई उत्तराखंड कैबिनेट के महत्वपूर्ण निर्णय

October 4, 2026
17
उत्तराखंड

सीमांत क्षेत्रों तक सरकार, विकास को नई रफ्तार…

October 4, 2026
12
उत्तराखंड

चमोली पुलिस ने मादक पदार्थ की तस्करी एवं उत्पादन रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया

October 4, 2026
8
उत्तराखंड

पर्यावरण प्रहरी सम्मान-2026 में पर्यावरण प्रेमियों और स्वच्छता मित्रों का सम्मान

October 4, 2026
22

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67751 shares
    Share 27100 Tweet 16938
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45794 shares
    Share 18318 Tweet 11449
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38079 shares
    Share 15232 Tweet 9520
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37458 shares
    Share 14983 Tweet 9365
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37382 shares
    Share 14953 Tweet 9346

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

उत्तराखंड के जनप्रिय थे ईमानदारी की मिशाल जसवंत सिंह बिष्ट

October 4, 2026

केदारनाथ में उमड़ा आस्था का सैलाब जाम ने बढ़ाई यात्रियों की टेंशन

October 4, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.