डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पर्यटन का मॉडल कैसा हो? अगर पर्यटकों की संख्या बढ़ती रही, लेकिन पार्किंग, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, जल व्यवस्था और पहाड़ों की भार वहन क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया तो आने वाले समय में पर्यटन खुद पहाड़ों के लिए संकट बन सकता है. ऐसे में यदि पहाड़ों को बचाना है तो पर्यटन को रोकना नहीं, बल्कि नियंत्रित और टिकाऊ बनाना होगा. समय रहते कैरीइंग कैपेसिटी के आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या तय करना, पार्किंग व्यवस्था मजबूत करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना जरूरी होगा. उत्तराखंड में पर्यटन का दबाव इन दिनों कुछ चुनिंदा स्थलों तक सिमटता नजर आ रहा है. बाबा नीब करौरी महाराज के प्रसिद्ध कैंची धाम में जहां देशभर से श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ रही है, वहीं कैंची धाम से आगे कुमाऊं के कई प्रमुख पर्यटन स्थल अपेक्षाकृत खाली नजर आ रहे हैं. इसका सीधा असर होटल, होमस्टे, रेस्टोरेंट, टैक्सी और स्थानीय कारोबार से जुड़े लोगों पर पड़ रहा है.कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता के बीच सबसे बड़ी समस्या यहां लगने वाला जाम बन गया है. नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल, भवाली और मुक्तेश्वर के अलावा अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर, कौसानी, पिथौरागढ़, बिनसर और जागेश्वरधाम की ओर जाने वाले पर्यटकों को भी कई बार जाम का सामना करना पड़ रहा है. कारोबारियों का कहना है कि कई पर्यटक घंटों जाम में फंसने के बाद कैंची धाम तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन इसके बाद आगे पहाड़ की ओर जाने का कार्यक्रम बदल देते हैं और वापस लौटना पसंद करते हैं. बागेश्वर के होटल व्यवसायी और जिला व्यापार संघ अध्यक्ष ने कैंची धाम में बढ़ते ट्रैफिक दबाव पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि पिछले करीब दो वर्षों से पहाड़ के लोग कैंची धाम बाईपास की मांग कर रहे हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो पाया है. उन्होंने कहा कि इसका सबसे ज्यादा असर बागेश्वर जिले पर पड़ रहा है. कभी पूरे प्रदेश के पर्यटन की रीढ़ माने जाने वाले कौसानी का पर्यटन कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है. उनके मुताबिक, सालभर पर्यटकों से गुलजार रहने वाला कौसानी अब पर्यटन के लिहाज से करीब 10 से 15 प्रतिशत तक सिमट गया है. व्यापार संघ अध्यक्ष के अनुसार, दूर-दराज से आने वाले पर्यटक कैंची धाम तक पहुंचने में ही घंटों जाम में फंस जाते हैं. ऐसे में वे आगे कौसानी, बागेश्वर या अन्य इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. इसका असर सिर्फ पर्यटन पर ही नहीं, बल्कि माल ढुलाई पर भी पड़ रहा है. ट्रकों के समय पर नहीं पहुंचने से सब्जियां, फल और अन्य कच्चा माल भी प्रभावित हो रहा है. कैंची धाम की लोकप्रियता बढ़ने से धार्मिक पर्यटन को निश्चित तौर पर बढ़ावा मिला है, लेकिन अत्यधिक भीड़ के कारण इसके आगे के पर्वतीय क्षेत्रों का पर्यटन कारोबार प्रभावित हो रहा है. उन्होंने कहा कि अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर और कौसानी समेत कुमाऊं के कई पर्यटन स्थल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. यदि कैंची धाम के आसपास ट्रैफिक का दबाव कम हो और पर्यटकों को आगे जाने में सुविधा मिले तो इसका लाभ पूरे कुमाऊं को मिल सकता है. उन्होंने सरकार से बाईपास निर्माण में तेजी लाने की मांग की. कैंची धाम से आगे जाने वाले पर्यटकों को घंटों जाम में फंसना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि बाईपास बनने से कैंची धाम पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा और पर्यटक आसानी से दूसरे पर्यटन स्थलों तक पहुंच सकेंगे. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में ग्लेशियर, नदियां, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़े कई ऐसे स्थल हैं, जिन्हें व्यापक स्तर पर प्रचारित करने की जरूरत है. सरकार यदि नए पर्यटन और एडवेंचर डेस्टिनेशन विकसित करे और कैंची धाम को दूसरे स्थलों से जोड़कर टूरिस्ट सर्किट तैयार करे तो पर्यटन का लाभ कुछ चुनिंदा जगहों के बजाय पूरे पहाड़ तक पहुंच सकता है. कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता को रोकना समाधान नहीं है. जरूरत इस बात की है कि यहां आने वाले पर्यटकों को सुरक्षित और सुगम तरीके से कुमाऊं के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया जाए. इसके लिए कैंची धाम बाईपास के साथ शटल सेवा, रास्ते में पॉकेट पार्किंग और बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट विकसित करने की मांग उठ रही है. स्थानीय कारोबारियों का मानना है कि यदि कैंची धाम से आगे अल्मोड़ा, रानीखेत, कौसानी, बागेश्वर, चौकोड़ी, पिथौरागढ़ और अन्य स्थलों को जोड़कर पर्यटन सर्किट तैयार किया जाता है, तो पर्यटकों का प्रवास बढ़ेगा और होटल, होमस्टे, टैक्सी, रेस्टोरेंट तथा स्थानीय बाजारों को भी इसका सीधा फायदा मिलेगा. यानी चुनौती कैंची धाम की बढ़ती लोकप्रियता नहीं, बल्कि पर्यटन का एक ही जगह पर सिमट जाना है. अब जरूरत ऐसे पर्यटन मॉडल की है, जिसमें बाबा के दरबार में उमड़ने वाली भीड़ का लाभ पूरे पहाड़ के कारोबार और स्थानीय लोगों की आजीविका तक पहुंच सके. नैनीताल और कैंचीधाम में बढ़ते वाहनों के दबाव को चिंताजनक बताया. उन्होंने कहा कि नैनीताल और कैंचीधाम की सड़कें इतनी चौड़ी नहीं हैं कि बड़ी संख्या में वाहनों का लगातार दबाव झेल सकें. उनके मुताबिक, पहाड़ों की इकोलॉजी बेहद संवेदनशील है और इतनी बड़ी संख्या में वाहनों के चलने से सड़क और पहाड़ी ढलानों पर दबाव बढ़ता है. वाहनों से निकलने वाला धुआं पर्यावरण प्रदूषण को भी बढ़ाता है. पर्यटन का मॉडल कैसा हो? अगर पर्यटकों की संख्या बढ़ती रही, लेकिन पार्किंग, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, जल व्यवस्था और पहाड़ों की भार वहन क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया तो आने वाले समय में पर्यटन खुद पहाड़ों के लिए संकट बन सकता है. ऐसे में यदि पहाड़ों को बचाना है तो पर्यटन को रोकना नहीं, बल्कि नियंत्रित और टिकाऊ बनाना होगा. समय रहते कैरीइंग कैपेसिटी के आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या तय करना, पार्किंग व्यवस्था मजबूत करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना जरूरी होगा. पर्यटन का मॉडल कैसा हो? अगर पर्यटकों की संख्या बढ़ती रही, लेकिन पार्किंग, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, जल व्यवस्था और पहाड़ों की भार वहन क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया तो आने वाले समय में पर्यटन खुद पहाड़ों के लिए संकट बन सकता है. ऐसे में यदि पहाड़ों को बचाना है तो पर्यटन को रोकना नहीं, बल्कि नियंत्रित और टिकाऊ बनाना होगा. समय रहते कैरीइंग कैपेसिटी के आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या तय करना, पार्किंग व्यवस्था मजबूत करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना जरूरी होगा.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं














