डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमालय को यूं ही एशिया का ‘वॉटर टावर’ नहीं कहा जाता। यहीं से गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनरेखाएं जन्म लेती हैं। अफगानिस्तान से लेकर उत्तरी पाकिस्तान और ताजिकिस्तान तक फैली लगभग 800 किलोमीटर लंबी हिंदू-कुश पर्वत श्रृंखला आज एक अनकही कहानी सुना रही है। इन पहाड़ों में बसे हजारों ग्लेशियर अब धीमे-धीमे पिघल रहे हैं, जैसे समय खुद उनसे जीवन छीन रहा हो।अगर ये बर्फ यूं ही विदा लेती रही, तो सवाल सिर्फ पहाड़ों का नहीं रहेगा। सवाल हमारी नदियों, हमारी खेती, हमारे भविष्य का होगा। हिमालय आज भी खड़ा है, मगर उसकी सफेदी कम हो रही है। और जब पहाड़ चुप हो जाते हैं, तो समझिए प्रकृति कुछ बहुत बड़ा कहने वाली है।इन्हीं नदियों से मैदानों में हरियाली, शहरों में पानी और सभ्यताओं में निरंतरता बनी रहती है। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ेगी, तो नदियों की धार भी कमजोर पड़ेगी। पहले बाढ़ का खतरा, फिर सूखे का साया और अंत में संघर्ष।जब हिमालय की चोटियों को छूता था, तो बर्फ ऐसे चमकती थी जैसे धरती ने आकाश का एक टुकड़ा ओढ़ लिया हो। हवा में ठंडक नहीं, एक वादा होता था कि नदियां बहेंगी, खेत हरे रहेंगे और जीवन चलता रहेगा। लेकिन अब उस सफेद चादर में जगह-जगह दरारें हैं। धरती का तापमान बढ़ चुका है। जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की कहानी नहीं, बल्कि आज की कड़वी सच्चाई है। देर से आती सर्दियां, पहाड़ों से चुपचाप खिसकती बर्फ और समुद्र का उठता पानी, ये सब प्रकृति की वो चेतावनियां हैं, जिन्हें अनसुना करना अब नामुमकिन हो गया है। कभी जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर-सरकारी पैनल ने चेताया था कि अगर धरती का तापमान यूं ही बढ़ता रहा, तो बर्फबारी का मौसम छोटा होता जाएगा। ऊंचाइयों पर बर्फ कम समय ठहरेगी और वो चोटियां, जिन्हें हम सदियों से सफेद देखते आए हैं, धीरे-धीरे पथरीली नजर आने लगेंगी। आज वही भविष्य वर्तमान बनकर सामने खड़ा है। जलवायु परिवर्तन दुनिया की वो हकीकत बन चुकी है, जिससे मुंह फेरना नामुमकिन है। धरती के बढ़ते तापमान का असर मौसम पर साफ देखने को मिल रहा है। देर से दस्तक देती ठंड, पहाड़ों पर पिघलती बर्फ और समुद्र का बढ़ता जलस्तर चीख-चीख कर आने वाली आपदा के संकेत दे रहे हैं। इसी बीच हिंदू- कुश हिमायलय का चौंकाने वाला डेटा सामने आया है, जिसने क्लाइमेट चेंज पर एक बार फिर मुहर लगा दी है। इस मौसमीय संकट का सबसे ज्यादा असर कृषि और बागवानी पर पड़ रहा है। खासतौर पर सेब की खेती प्रभावित हो रही है, क्योंकि सेब के पेड़ों को सर्दियों में पर्याप्त ठंड और बर्फ की परत की जरूरत होती है। बर्फबारी न होने से आने वाले सीज़न की पैदावार पर भी खतरा मंडरा रहा है। पर्यटन भी इस हालात से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। लोकप्रिय हिल स्टेशन और स्कीइंग रिसॉर्ट्स में बर्फ न होने के कारण पर्यटक नहीं पहुंच रहे हैं। सर्दियों का पर्यटन, जो स्थानीय लोगों की आजीविका का बड़ा जरिया है, इस साल भारी नुकसान झेल रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं और नई बर्फबारी न होने से उनका पुनर्भरण नहीं हो पा रहा। यह स्थिति न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि उन करोड़ों लोगों के लिए भी खतरा बन सकती है, जो पीने के पानी और सिंचाई के लिए इन ग्लेशियरों पर निर्भर हैं। बारिश और बर्फबारी की लगातार कमी केवल पहाड़ी इलाकों की समस्या नहीं है। इसका असर मैदानी क्षेत्रों तक पड़ेगा, जो हिमालयी नदियों पर निर्भर हैं। कृषि, पेयजल और पर्यावरणीय संतुलन तीनों के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। बारिश और बर्फबारी की लगातार कमी केवल पहाड़ी इलाकों की समस्या नहीं है। इसका असर मैदानी क्षेत्रों तक पड़ेगा, जो हिमालयी नदियों पर निर्भर हैं। कृषि, पेयजल और पर्यावरणीय संतुलन तीनों के लिए यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। उत्तराखंड की स्थिति यह है कि लोग अब देवी-देवताओं के पास पहुँचकर बारिश और बर्फबारी की गुहार लगा रहे हैं। दूसरी ओर सरकारें मानो इस विषय पर चुप्पी साधे बैठी हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं या हो ही नहीं रहा। न चेहरों पर चिंता दिखती है, न किसी तरह की बेचैनी। हर कोई अपने एजेंडे, अपनी राजनीति, अपनी मीटिंग और अपने-अपने प्रोजेक्ट्स में व्यस्त है जबकि बर्फ और बरसात जैसे जीवनदायी विषय उनके एजेंडे से पूरी तरह गायब हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं










