डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत-चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे से होने वाले व्यापार और आवागमन व्यवस्था में पुरानी बड़ी प्रशासनिक खामी सामने आई है। दस्तावेज की समीक्षा के दौरान पता चला कि नेपाली नागरिकों को वर्ष 1991 से बोझा ढोने के लिए पास जारी किए जा रहे थे। प्रशासन ने इसे नियमविरुद्ध माना और इस तरह के पास जारी करने पर रोक लगा दी है। अब नेपालियों को केवल ट्रांजिट पास जारी किए जा रहे हैं।1962 में पिथौरागढ़ के रास्ते भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया था। इसके बाद वर्ष 1991 में दोबारा व्यापार शुरू हुआ। कोरोना काल 2020 के बाद व्यापार सीमा विवाद और कोरोना के कारण फिर व्यापार बंद रहा। इस वर्ष फिर व्यापार शुरू हुआ है। इसके लिए धारचूला ट्रेड कार्यालय से व्यापार के लिए जाने वाले व्यापारियों और उनके साथ सामान ढोने के लिए जा रहे सहायक के पास जारी किए जा रहे हैं। इस बार सहायक के तौर पर जाने वाले नेपाली नागरिकों के लिए सामान ढोने के लिए ट्रांजिट पास जारी हो रहे हैं। उन्हें पहले की तरह सीधे लिपुलेख जाने की अनुमति नहीं मिल रही है। उन्हें ट्रांजिट पास के तहत भारत-नेपाल सीमा गर्ब्यांग स्थित सीतापुल तक ही जाने की अनुमति है। इसके बाद उन्हें एसएसबी की अनुमति लेनी होगी। फिर उन्हें तकलाकोट(चीन) पहुंचने से पहले से चीन सीमा पर आइटीबीपी की अनुमति लेनी पड़ेगी।पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी ने बताया कि स्थानीय प्रशासन किसी बाहरी नागरिक को पास जारी नहीं कर सकता है। व्यापारियों के साथ जाने वाले नेपाली नागरिकों के लिए ट्रांजिट पास जारी किए जा रहे हैं।कालापानी विवाद से जोड़कर देखा
जा रहा पूरे मामले को भारत-चीन व्यापार को कालापानी-लिपुलेख विवाद से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद बना हुआ है।हाल के वर्षों में लिपुलेख मार्ग से व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल लगातार आपत्ति जताता रहा है। ऐसे में पास व्यवस्था में मिली इस तकनीकी खामी को भी सीमा विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है।उन्हें ट्रांजिट पास के तहत भारत-नेपाल सीमा गर्ब्यांग स्थित सीतापुल तक ही जाने की अनुमति है। इसके बाद उन्हें एसएसबी की अनुमति लेनी होगी। फिर उन्हें तकलाकोट(चीन) पहुंचने से पहले से चीन सीमा पर आइटीबीपी की अनुमति लेनी पड़ेगी।पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी ने बताया कि स्थानीय प्रशासन किसी बाहरी नागरिक को पास जारी नहीं कर सकता है। व्यापारियों के साथ जाने वाले नेपाली नागरिकों के लिए ट्रांजिट पास जारी किए जा रहे हैं।कालापानी विवाद से जोड़कर देखा
जा रहा पूरे मामले को भारत-चीन व्यापार को कालापानी-लिपुलेख विवाद से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से सीमा विवाद बना हुआ है।हाल के वर्षों में लिपुलेख मार्ग से व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल लगातार आपत्ति जताता रहा है। ऐसे में पास व्यवस्था में मिली इस तकनीकी खामी को भी सीमा विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है। भारत और नेपाल के बीच 1817 यानी 206 साल से ही सीमा विवाद चला आ रहा है। दरअसल नेपाल उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के कालापानी इलाके पर अपना दावा करता है। इस इलाके में तीन गांव आते हैं। इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कई बार दोनों देशों के बीच बातचीत भी हुई है। 1980 में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत सरकार ने एक कमेटी बनाई। लेकिन कोई हल नहीं निकला। इसके बाद 1997 में भारत और नेपाल ने एक संयुक्त टीम विवादित स्थान पर भेजने का फैसला किया, लेकिन ये टीम कभी नहीं पहुंचा। लेकिन 2020 में नेपाल ने अपने नक्शे में कालापानी, लिपुलेख दर्रे और लिंपियाधूरा को शामिल किया, इसके बाद ये विवाद चरम पर पहुंच गया। भारत और नेपाल के बीच 1817 यानी 206 साल से ही सीमा विवाद चला आ रहा है। दरअसल नेपाल उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के कालापानी इलाके पर अपना दावा करता है। इस इलाके में तीन गांव आते हैं। इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कई बार दोनों देशों के बीच बातचीत भी हुई है। 1980 में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए भारत सरकार ने एक कमेटी बनाई। लेकिन कोई हल नहीं निकला। इसके बाद 1997 में भारत और नेपाल ने एक संयुक्त टीम विवादित स्थान पर भेजने का फैसला किया, लेकिन ये टीम कभी नहीं पहुंचा। लेकिन 2020 में नेपाल ने अपने नक्शे में कालापानी, लिपुलेख दर्रे और लिंपियाधूरा को शामिल किया, इसके बाद दो साल तक अंग्रेजों और नेपाल की बीच चली लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच 2 दिसंबर, 1815 को एक संधि हुई, जिसे सुगौली की संधि कहा जाता है। बिहार के चंपारण में स्थित सुगौली में हुई इस संधि पर 4 मार्च, 1816 को नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र के सहायक चंद्रशेखर उपाध्याय और ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने दस्तखत किए थे। अंग्रेजों को यह डर था कि शायद नेपाल इस संधि को लागू न करे। ऐसे में तत्कालीन गवर्नर जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने ब्रिटिश सरकार की ओर से संधि पर उसी दिन आनन-फानन में मुहर लगा दी और इस संधि की कॉपी चंद्रशेखर उपाध्याय को सौंप दी। दरअसल, आज इस कहानी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि नेपाल ने बीते शुक्रवार को 100 रुपए के नए नोट छापने का ऐलान किया है। इस नोट पर ऐसा मानचित्र होगा जिसमें भारत के लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को दर्शाया जाएगा। भारत इन इलाकों को लेकर पहले भी कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका है। भारत ने कहा है कि ये तीनों इलाके भारत के अहम हिस्से हैं। इससे पहले 18 जून, 2020 को नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन करके रणनीतिक रूप से अहम तीन इलाकों लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया था, तब भी भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। दरअसल, नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद से स्थिर लोकतंत्र कभी आया ही नहीं। वहां पर चीन का प्रभाव इतना ज्यादा रहा है कि आज भी नेपाल की कई सरकारें भारत के खिलाफ बयानबाजी से बाज नहीं आतीं। चीन वहां पर निर्माण कार्य के अलावा नेपाल के संविधान और प्रशासन में भी अपना प्रभुत्व जमा रहा है। दो साल तक अंग्रेजों और नेपाल की बीच चली लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच 2 दिसंबर, 1815 को एक संधि हुई, जिसे सुगौली की संधि कहा जाता है। बिहार के चंपारण में स्थित सुगौली में हुई इस संधि पर 4 मार्च, 1816 को नेपाल की ओर से राजगुरु गजराज मिश्र के सहायक चंद्रशेखर उपाध्याय और ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशॉ ने दस्तखत किए थे। अंग्रेजों को यह डर था कि शायद नेपाल इस संधि को लागू न करे। ऐसे में तत्कालीन गवर्नर जनरल डेविड ऑक्टरलोनी ने ब्रिटिश सरकार की ओर से संधि पर उसी दिन आनन-फानन में मुहर लगा दी और इस संधि की कॉपी चंद्रशेखर उपाध्याय को सौंप दी। दरअसल, आज इस कहानी का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि नेपाल ने बीते शुक्रवार को 100 रुपए के नए नोट छापने का ऐलान किया है। इस नोट पर ऐसा मानचित्र होगा जिसमें भारत के लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को दर्शाया जाएगा। भारत इन इलाकों को लेकर पहले भी कड़ी प्रतिक्रिया दे चुका है। भारत ने कहा है कि ये तीनों इलाके भारत के अहम हिस्से हैं। इससे पहले 18 जून, 2020 को नेपाल ने अपने संविधान में संशोधन करके रणनीतिक रूप से अहम तीन इलाकों लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया था, तब भी भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। दरअसल, नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद से स्थिर लोकतंत्र कभी आया ही नहीं। वहां पर चीन का प्रभाव इतना ज्यादा रहा है कि आज भी नेपाल की कई सरकारें भारत के खिलाफ बयानबाजी से बाज नहीं आतीं। चीन वहां पर निर्माण कार्य के अलावा नेपाल के संविधान और प्रशासन में भी अपना प्रभुत्व जमा रहा है। ये विवाद चरम पर पहुंच गया। कालापानी इलाके में तीन गांव हैं, जहां की आबादी करीब तीन हजार है। यहां रहने वाले लोगों की आय का प्रमुख जरिया इंडो-चीन सीमा व्यापार है। यहां लिपुलेख दर्रे से व्यापार होता है। लेकिन सर्दियों के दिनों में यहां बर्फबारी के चलते ये व्यापार भी बंद हो जाता है। स्थानीय लोग सालभर जंगलों से दुर्लभ जड़ी बूटियां इकट्ठा करते हैं, जिन्हें बेचकर उनका जीवन यापन होता है भारत के आजाद होने के बाद जब 1962 में भारत-चीन जंग हुई तो उसके कुछ समय बाद ही नेपाल ने अपना तेवर दिखाते हुए लिपुलेख पर अपना हक जताया था। 1981 में दोनों देशों की सीमाएं तय करने के लिए एक संयुक्त दल बना था, जिसने 98% सीमा तय भी कर ली थी नेपाल और भारत के अलग-अलग सीमावर्ती इलाकों में पहले ही तंत्र बनाए जा चुके हैं और वे सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास जो भी काम हो रहा है, वह दोनों पक्षों के बीच तालमेल से किया जा रहा है।” खनाल ने कहा, “जहां तक (दक्षिणी नेपाल के) सुस्ता इलाके में 132 मीटर लंबे तटबंध के निर्माण की बात है, तो दोनों देशों के अधिकारियों के बीच तालमेल बिठाने के बाद ही काम आगे बढ़ा है। दोनों देशों की संबंधित संस्थाएं एक-दूसरे के लगातार संपर्क में हैं और जरूरी काम कर रही हैं।” नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर सीमा का पुराना विवाद है और दोनों देश इन इलाकों पर अपना दावा करते हैं। प्रधानमंत्री के विवादित बयान के बाद भारत ने इस मुद्दे पर किसी भी तीसरे देश के दखल को पूरी तरह से और सिरे से खारिज कर दिया था। नेपाल के सभी विपक्षी दलों ने भी बालेन शाह के इस गैर-जरूरी और भड़काऊ बयान की बहुत ही कड़ी आलोचना की थी। बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपनी सफाई जारी करते हुए कहा था कि पीएम का मतलब सिर्फ सीमा के दोनों ओर के स्थानीय लोगों की घुसपैठ से था। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे इलाकों को लेकर बहुत ही पुराना सीमा विवाद लगातार चलता आ रहा है। भारत का हमेशा से यही स्पष्ट रुख रहा है कि ये सभी क्षेत्र उत्तराखंड का अभिन्न हिस्सा हैं और इन्हें द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाना चाहिए। दोनों देश अक्सर इन अहम क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा मजबूती से करते रहे हैं जिसे सुलझाने के लिए अब कूटनीतिक पहल की जा रही है। विदेश मंत्री खनाल ने 10 जून को नेपाली संसद को बताया था कि दोनों देशों के बीच सीमा पर आम लोगों के अतिक्रमण से निपटने के लिए एक ग्रुप बनेगा। यह नेपाल-भारत जॉइंट वर्किंग ग्रुप इन सभी अहम और संवेदनशील मामलों की बहुत ही बारीकी से जांच करेगा और अपना काम करेगा। सीमा प्रबंधन पर इस नेपाल-भारत जॉइंट वर्किंग ग्रुप की अगली महत्वपूर्ण बैठक इसी साल अगस्त महीने में भारत में आयोजित की जाएगी। करीब 1,850 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल सीमा के अधिकांश हिस्सों का सीमांकन हो चुका है, लेकिन लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों को लेकर विवाद अब भी कायम है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और नक्शों की अलग-अलग व्याख्या के कारण यह मुद्दा लंबे समय से अनसुलझा बना हुआ है।हालांकि भारत और नेपाल दोनों समय-समय पर वार्ता के माध्यम से समाधान निकालने की प्रतिबद्धता जताते रहे हैं, लेकिन यह मुद्दा नेपाल की घरेलू राजनीति और द्विपक्षीय संबंधों में आज भी संवेदनशील बना हुआ है। बालेन शाह के हालिया बयान के बाद इस पुराने सीमा विवाद पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कालापानी 372 वर्ग किलोमीटर का एक क्षेत्र है. इस क्षेत्र पर चीन, नेपाल और भारत की सीमा मिलती है. वहीं, भारत इसे उत्तराखंड का हिस्सा मानता है जबकि नेपाल इसे अपने नक्शे में दिखाता है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











