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घी संक्रांति उत्तराखंड का प्रमुख लोकपर्व है.

17/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विशिष्ट लोक परम्पराओं से उत्तराखंड के लोग अपने समाज को अलग खुशबू देते हैं। शायद ही ऐसा कोई महिना हो जब यहां के समाज का अपना कोई विशिष्ट त्यौहार न हो। ऐसा ही लोकपर्व आज घी त्यार या घ्यूं त्यार। इसे घृत संक्रांति, सिंह संक्रांति या ओलगिया संक्रांति भी कहा जाता है। ओलगिया संक्रांति का नाम ‘ओलग’ से बना है। ओलग या ओलुक का अर्थ एक प्रकार की भेंट से है. यह शब्द कुमाऊं में महाराष्ट्र से आया है।पहले इस दिन चन्द राज्य के समय अपनी कारीगरी और दस्तकारी की चीजों को दिखाकर शिल्पी लोग इस दिन पुरस्कार पाते थे, अन्य लोग भी साग-सब्जी, दही दुग्ध, मिष्ठान और अन्य प्रकार की बढ़िया चीजें दरबार में ले जाते थे और मान्य पुरुषों की भेंट में भी जाते थे. यह ओलग प्रथा कहलाती थी. जैसे बड़े दिन अंग्रेजों को डाली देने की प्रथा है, वही प्रथा यह भी है।पहाड़ों में हमेशा से सभी प्रकार के उपकरण बनाने का जिम्मा शिल्पकार वर्ग का रहा है। इस दिन कृषि उपकरण दाथुली, सगड़, हल, कुटेला या अन्य उपकरण भेंट करते. कई शिल्पकार डोली बनाकर लाते। डोली में सुंदर सी गुड़िया को सजाकर लाते और भेंट करते। बदले में उनको अनाज और पैसे दिया करते थेसावन मास के अंतिम दिन रात के समय खूब पकवान बनाये जाते हैं जिनमें पूड़ी, उड़द की दाल की पूरी व रोटी, बड़ा, पुए, मूला-लौकी-पिनालू के गाबों की सब्जी, ककड़ी का रायता बनते हैं. इन पकवानों को घी के साथ खाया जाता है। खीर अगले दिन सुबह बनती है जिसमें खूब सारा घी डालकर खाया जाता है।इस दिन छोटे बच्चों के सिर पर घी भी लगाया जाता है। घ्यूं त्यार का जिक्र उत्तराखंड के किसी पुराने लोकगीत इत्यादि में नहीं मिलता है न ही इस दिन किसी प्रकार के अनुष्ठान या पूजा का कोई जिक्र है. इसे क्यों मनाया जाता है इस बारे में भी कोई ठोस प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं।कुमाऊं में भादों मास की संक्रांति घ्यूँ त्यार मनाया जाता है। इसे ‘ओलकिया’ या ‘ओलगी’ संक्रान्त भी कहते हैं. इस दिन घी खाने की परंपरा रही. इस कारण इसे घ्यूँ त्यार या घी संक्रांति भी कहा जाता है। पिछले कुछ दशकों तक घ्यूं त्यार के दिन परिवारों द्वारा आपस में खाने की वस्तु देने का प्रचलन पहाड़ों में काफ़ी देखने को मिलता था। इस दिन लड़की के ससुराल वाले, उसके मायके वालों को बरसाती सब्जी (मूली, गाब), केले, घी, ककड़ी, भुट्टा इत्यादि दिया करते थे। अक्सर इस दिन लड़के अपने मामा भेटने जाते थे या दामाद अपने ससुराल भेटने नाते हैं। इसे ओल्गा भेटने जाना भी कहते हैं। पहाड़ में खेती किसानी के साथ पशु पालन होता आया. अनाज, फल फूल और सब्जी के साथ गाय बैल, भैंस बकरी और सीमांत इलाकों में भेड़, याक व अन्य पशु दूध दही, मक्खन, व घी के साथ उपज के लिए समुचित खाद प्रदान करते रहे। गावों के अवलम्बन क्षेत्र से इनके लिए चारा पत्ती मिल जाता. चराई भी हो जाती। खेती किसानी और पशु पालन से जुड़ा यह विशेष त्यौहार है। सावन भादों में अक्सर गाय भैंस ब्याए रहते हैं. हरे चारे की कमी नहीं होती। दन्याली यानि दूध दही घी इफरात में होता है। इसी कारण घी त्यार में हर घर में घी से बने स्वादिष्ट पकवान बनाये जाते हैं। बच्चों के कपाल में भी मक्खन या घी चुपड़ा जाता है।घी त्यार को ओलगी संक्रांति भी कहते हैं. ओलकिया संक्रांति में उर्द या मॉस की दाल भिगा उसके छिल्के बहा सिलबट्टे में खूब पीस, नमक, हींग, अजवाइन, लाल खुस्याणी, आद या अदरख मिला बड़े बनाते हैं। आटे की लोई में इसे भर पूरी और लगड़ भी बनते हैं। उड़द की पिसी दाल को आटे की लोई के भीतर भर तवे में सेक और फिर चूल्हे की आग में सेक ऊपर से घी चुपड़ ‘बेडुआ’ रोटी भी बनाई जाती है. सीप वाली महिलाएं बिना चकला बेलन के ही बेडुआ रोटी हाथ में ही पाथ देतीं हैं ऐसे जतन से कि पूरी रोटी के भीतर उड़द का मसाला बराबर रहे.बराबर सिके।इष्ट-मित्रों को ओलग भेंट की जाती है. जिसमें घी, दही, पापड़ या पिनालू के डंडी में मुड़ गए पत्ते या ‘गाक’ और अन्य पकवान बना कर मित्रों के घर भेंट करने ले जाते हैं.इसके साथ ही मौसमी फल, केले, हरी सब्जी, मूली गोरस और घी भी ओलक में दिया जाता रहा। पहले ये रिवाज भी था कि आसामी द्विज वर्ग के घर ओलुक भेंट करने जाते थे तो साथ ही रोपाई वाले खेतों में पाती तथा मेहल की टहनियों को रोप देते। जहां ओलुक भेंट करनी होती उस घर के दरवाजे के पास की भूमि पर भी ये टहनियां रोप देते।शिल्पकार लोग अपने हुनर से बनाई वस्तुओं की भेंट भी प्रदान करते जिनके साथ छिलुके, पत्तल धागा व घुइयां की मुड़ी पत्तियां होतीं। ब्राह्मणों, पुरोहित पंडितों,लाला महाजन को ओलुक भेंट दिया जाता जिसके बदले उन्हें अनाज, कपड़ा, पकवान व रूपया पैसा मिलता।विवाहित कन्याएँ अपनी ससुराल से मायके को ‘ओल’ ले जातीं। ओलकिया संक्रांति के दिन गाय भैंस इत्यादि जानवरों के जंगल जाने वाले रस्ते किसी पेड़ को काट उसकी शाखाएं काट खतड़ुए का रोपण करना भी कई जगहों में प्रचलित रहा. ओलुका एक तरह से फल-फूल, साग-पात, गोरस-घी का उपहार है जो भादों में दिया जाता है. सब लोगों में आपसी मेलजोल बना रहे और इसी बहाने शरीर को भी घी दूध मिले, बंटे यही इसका शकुन रहा।टिहरी गढ़वाल में घी संक्रांति मनाई जाती है लेकिन इसका स्वरूप कुमाऊं से थोड़ा भिन्न है। टिहरी की जलकुर घाटी में “टेक्टा” नाम से मनाया जाता है जिसमें भी गोरस का प्रयोग होता है। घरों की साफ सफाई होती है और विवाहित कन्याएँ ससुराल से मायके आतीं हैं। यह संक्रान्त से दो गते तक मनाते हैं. इसका खास उद्देश्य अपने पितरों को भोग लगाना है। इसमें खास तौर पर खीर बनाई जाती है और लगड़ या लगडी तली जाती है।रात को अपने घर के बाहर लकड़ियां जलाई जातीं हैं. अब पत्तल या पत्रों में खीर रखी जाती है। साथ में हुक्का-चिलम और अर्जुना घास रख देते हैं। घास से साफ सफाई कर पितर खीर खाएंगे और फिर चिलम गुड़गुड़ाएंगे, यह लोक विश्वास है. इस इलाके में टेक्टा के साथ ही साल में पड़ने वाले त्योहारों की शुरुवात कर दी जाती है।वर्ष 2020 में एक ख़ास शब्द की चर्चा है वह है ‘इम्युनिटी’ यानि रोग प्रतिरोधक शक्ति। जिसे बढ़ाने के लिए इस समय विश्व की पूरी मानव जाति अनेक दवाओं से लेकर योग आदि का सहारा ले रही है। आयुर्वेद की विभिन्न जड़ी-बूटियों के अलावा घी को भी लोग आज इम्युनिटी बूस्टर (रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला) के रूप में उपयोग करने लगे हैं। घी में एन्टीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। जिनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। इसके अलावा घी  मनुष्य को बौद्धिक और शारीरिक रूप से मजबूत करता है। ये बातें उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों को सदियों से ज्ञात थीं इसीलिये पहाड़ी अंचलों में घी एक पौष्टिक आहार के रूप में सदियों से इस्तेमाल होते आ रहा है। यहाँ घी का इस्तेमाल अपने हर व्यंजनों के अलावा सीधे खाकर भी किया जाता है। जमे घी और गुड़ की डली को मिलाकर यहाँ लोगों में बाँटने की भी एक ख़ास परम्परा है। किसी उत्सव, धार्मिक आयोजन, कृषि कार्य के शुभारम्भ में घी-गुड़ का वितरण शुभ माना जाता है। घी को यहाँ के लोगों के बल, बुद्धि और ओजस्वी होने का उदाहरण भी कहा जा सकता है। घी की महत्ता को बनाये रखने और सभी लोगों तक इसके महत्वों को पहुँचाने के उद्देश्य से उत्तराखण्ड में सदियों से एक ख़ास त्यौहार भी मनाने की परम्परा है। जिसे हम घी-त्यार या घी संक्रांति के नाम से जानते हैं। जिसमें इस पर्व पर घी खाने की अनिवार्यता है। यह त्यौहार आज भी पूरे उत्तराखण्ड में बड़े हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है। घी-त्यार के महत्वों को अपनायें और अपने लोकपर्वों को उसी उत्साह से मनायें जैसे हमारे पुरखे हमें देकर गए हैं। इस दिन हर किसी को घी का सेवन करना जरूरी माना जाता है। मगर अब घी का प्रचलन बेहद कम होता जा रहा है। एक तरफ तेलों के दाम आसमान छू रहे हैं। सेहत का ख्याल रखते हुए लोग भी तेल खाने से बच रहे हैं। वे घी का प्रयोग करना चाहते हैं। मगर ग्रामीण इलाकों में शुद्ध घी के दाम काफी बढ़ चुके हैं। जबकि कई इलाकों में शुद्ध घी मिलना भी मुश्किल हो गया है। पहाड़ों में घी के दाम जहां 800 से 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, वहीं शहरों में और अधिक दाम वसूले जाते हैं। अधिकांश लोगों को दानेदार और खुशबू वाला घी पसंद है, पीला घी देखते ही लोग उसके दामों पर मोलभाव शुरू कर देते हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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