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2013 आपदा में बहा पुल अब तक नहीं बना, ट्रॉली के सहारे ‘मौत’ का सफर

18/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी कि कब-कहां प्रकृतिक आपदा आ जाए, कहा नहीं जा सकता। विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में बरसात आमजन पर काफी भारी पड़ती है। हर बरसात में नदियों व बरसाती नालों पर बने कई पुल बह जाते हैं। पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत व उत्तरकाशी जैसे जिलों में आपदा का सबसे बुरा असर पड़ता है। पुलों के न होने के कारण यहां आवाजाही का एकमात्र साधन ट्राली रह जाती है। केबल से बंधी इन ट्रालियों में सफर करना हर किसी के बस की बात नहीं मगर क्षेत्रवासियों के लिए यह मजबूरी है।आलम यह कि इन ट्रालियों से आज तक न जाने कितने लोगों की अंगुलियां कट चुकी हैं तो कितने जख्ती हो चुके हैं। बावजूद इसके इन इलाकों में पक्के पुल नहीं बन पाए हैं। ऐसा नहीं है कि स्थानीय प्रशासन को इनकी जानकारी नहीं, बावजूद इसके पुल फाइलों से निकलकर धरातल पर नहीं उतर पाए हैं।  आपदा के लिहाज से उत्तराखंड बड़ा ही संवेदनशील राज्य है. हर साल मॉनसून सीजन में बारिश यहां जमकर कहर बरपाती है. सीमांत जिले पिथौरागढ़ के कई क्षेत्र आज भी सड़क सुविधा से वंचित है. इन क्षेत्रों में लोग ट्रॉली और नाव के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं. सीमांत क्षेत्र में बसे घरुड़ी और मनकोट ऐसे ही गांव हैं. यहां के करीब 300 ग्रामीण आज भी जान जोखिम में डालकर तार पर लटकती ट्रॉली (गरारी) के सहारे गोरी नदी को पार करते हैं. पुल न होने के कारण बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को रोजाना नदी के ऊपर लटककर सफर करना पड़ता है. अब तक इस ट्रॉली से गिरकर तीन लोगों की मौत भी हो चुकी है. उसके बाद भी हाल जस के तस बने हुए हैं. साल 2013 की भीषण आपदा में यहां बना झूला पुल बह गया था. जिसके बाद इन गांवों का संपर्क बाकी दुनिया से कट गया. राहत के तौर पर लगाई गई ट्रॉली पिछले 12 सालों से ग्रामीणों की जीवनरेखा बनी हुई है. स्थायी पुल अब तक नहीं बन सका है. घरुड़ी और मनकोट तोक गोरी नदी के उस पार बसे हैं. नदी पार किए बिना ग्रामीणों का बाकी दुनिया से संपर्क पहाड़ चढ़ने के बराबर है. इस क्षेत्र की स्थिति यह है कि राशन, दवा, स्कूल, बाजार और सरकारी कामकाज, हर जरूरत के लिए लोगों को इसी ट्रॉली का सहारा लेना पड़ता है. बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव के कारण यह सफर और भी भयावह हो जाता है. विकल्प न होने के कारण ग्रामीणों को जोखिम उठाना ही पड़ता है इस क्षेत्र की स्थिति यह है कि राशन, दवा, स्कूल, बाजार और सरकारी कामकाज, हर जरूरत के लिए लोगों को इसी ट्रॉली का सहारा लेना पड़ता है. बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव के कारण यह सफर और भी भयावह हो जाता है. विकल्प न होने के कारण ग्रामीणों को जोखिम उठाना ही पड़ता है.. ग्रामीणों का कहना है कि बारिश में जब तक सुरक्षित दूसरी ओर नहीं पहुंच जाते, तब तक परिवार के लोग चिंतित रहते हैं. उन्हें नहीं पता कब तक इस तार के सहारे जीवन का यह जोखिम भरा सफर जारी रहेगा. अगर समय रहते यहां पर यहां पुल नहीं बना तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ में नहीं टिकती, ये सिर्फ एक कहावत नहीं बल्कि पहाड़ का सच है. पहाड़ से पलायन को रोकने के सरकार के लाख दावों के बावजूद हकीकत एकदम जुदा है. ग्रामीणों का कहना है कि बारिश में जब तक सुरक्षित दूसरी ओर नहीं पहुंच जाते, तब तक परिवार के लोग चिंतित रहते हैं. उन्हें नहीं पता कब तक इस तार के सहारे जीवन का यह जोखिम भरा सफर जारी रहेगा. अगर समय रहते यहां पर यहां पुल नहीं बना तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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