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मुनस्यारी की राजमा उत्पादन में अग्रणी

03/11/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

मुनस्यारी में राजमा उत्पादन में अग्रणी बौना गांव में मानसून काल में भारी बारिश के चलते फसल को नुकसान हुआ है। राजमा फसल को नुकसान होने से काश्तकार मायूस हैं।मुनस्यारी का आठ से नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बौना गांव सबसे बड़ा राजमा उत्पादक गांव है। इस गांव के सभी परिवार राजमा उत्पादित करते हैं। जैविक राजमा और आलू उत्पादन से ही परिवारों की आजीविका चलती है। इस वर्ष समय से बारिश होने से राजमा की फसल की वृद्धि आशा के अनुसार चल रही थी, परंतु राजमा तैयार होने के समय जलवायु के विपरीत होने से स्थितियां उलट गई।

काश्तकार बताते हैं कि राजमा की फसल जिस समय तैयार होती है उस समय बारिश की आवश्यकता नहीं होती है।मुनस्यारी में राजमा उत्पादन में अग्रणी बौना गांव में मानसून काल में भारी बारिश के चलते फसल को नुकसान हुआ है। राजमा फसल को नुकसान होने से काश्तकार मायूस हैं। मुनस्यारी का आठ से नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बौना गांव सबसे बड़ा राजमा उत्पादक गांव है। इस गांव के सभी परिवार राजमा उत्पादित करते हैं।

जैविक राजमा और आलू उत्पादन से ही परिवारों की आजीविका चलती है। इस वर्ष समय से बारिश होने से राजमा की फसल की वृद्धि आशा के अनुसार चल रही थी, परंतु राजमा तैयार होने के समय जलवायु के विपरीत होने से स्थितियां उलट गई। काश्तकार बताते हैं कि राजमा की फसल जिस समय तैयार होती है उस समय बारिश की आवश्यकता नहीं होती है।इस वर्ष अक्टूबर माह के शुरूआती दिनों तक क्षेत्र में भारी बारिश का सीधा असर राजमा की फसल पर पड़ा है।

जिस कारण 50 फीसद से अधिक फसल बर्बाद हो चुकी है। राजमा की फसल सितंबर अंत से लेकर मध्य अक्टूबर तक पक कर तैयार होती है। इस गांव के सभी परिवार राजमा उत्पादित करते हैं। जैविक राजमा और आलू उत्पादन से ही परिवारों की आजीविका चलती है। इस वर्ष समय से बारिश होने से राजमा की फसल की वृद्धि आशा के अनुसार चल रही थी, परंतु राजमा तैयार होने के समय जलवायु के विपरीत होने से स्थितियां उलट गई।

काश्तकार बताते हैं कि राजमा की फसल जिस समय तैयार होती है उस समय बारिश की आवश्यकता नहीं होती है।इस वर्ष अक्टूबर माह के शुरूआती दिनों तक क्षेत्र में भारी बारिश का सीधा असर राजमा की फसल पर पड़ा है। जिस कारण 50 फीसद से अधिक फसल बर्बाद हो चुकी है। राजमा की फसल सितंबर अंत से लेकर मध्य अक्टूबर तक पक कर तैयार होती है। इस अवधि में अधिक बारिश की आवश्यकता नहीं रहती है। फसल तैयार होने के लिए धूप की आवश्यकता होती है। इस वर्ष सितंबर अंतिम दिन में क्षेत्र में प्रतिदिन भारी बारिश होती रही जिसके चलते राजमा की फली नष्ट हो गई।

राजमा उत्पादन प्रभावित होने से बौना गांव बुरी तरह प्रभावित है। राजमा के लिए काफी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किसान बोने से लेकर फसल तैयार होने तक मेहनत करते हैं परंतु इस वर्ष मौसम ने मेहनत पर पानी फेर दिया है। हालत यह है कि ग्रामीणों के सम्मुख मांग पूरी करना मुश्किल हो चुका है। वर्ष सीमांत में देर तक भारी बारिश का दौर राजमा उत्पादकों के लिए भारी पडे़ हैं। अधिक बारिश राजमा के लिए सदैव हानिकारक रही है। इस वर्ष तो बारिश देर तक जारी रही। जिसका प्रभाव राजमा की फसल पर पड़ा है। सरकार को राजमा उत्पादन पर हुए प्रभाव का आंकलन कर राजमा उत्पादकों को मुआवजा देना चाहिए।

इधर अब मुनस्यारी के राजमा को जियोग्राफिकल इंडेकेशन यानी जीआइ टैग मिलने से राजमा के उत्पादन से लेकर गुणवत्ता तक में अधिक सुधार आने के लिए आसार बन चुके हैं।सात हजार फीट से अधिक ऊंचाई वाले गांव क्वीरी, जीमियां, साईपोलू, ल्वां, बोना, तोमिक, गोल्फा, नामिक, बुई, पातों, निर्तोली, झापुली सहित उच्च हिमालयी आदि गांवों में पैदा होने वाली राजमा को मुनस्यारी के राजमा नाम से जाना जाता है।अपने स्वाद के चलते विशेष पहचान रखती है।मैदानी क्षेत्रों में पैदा होने वाली राजमा से आकार में कुछ बड़ी सीमांत की राजमा पूरी तरह जैविक तरीके से उत्पादित की जाती है।

इसके उत्पादन में किसी तरह की रासायनिक खाद का उपयोग नहीं होता है। अब मुनस्यारी की राजमा को जियोग्राफिकल इंडेकेशन यानी जीआइ टैग मिल गया है। इसके बाद मुनस्यारी की राजमा की धाक और बढ़ गयी है। जीआई टैग उन उत्पादों को मिलता है जो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में पैदा होती हैं।सात हजार फीट से अधिक ऊंचाई वाले मुनस्यारी के गांवों में यह राजमा पैदा होती है। अपने स्वाद के लिए विशेष पहचान रखती है। इसका उत्पादन जैविक तरीके से किया जाता है। यह पौष्टिक गुणों से भरपूर है। इन्हीं गुणों के चलते पूरे उत्तर भारत में इसकी मांग है, हालांकि मांग की तुलना में उत्पादन सीमित है। यही वजह है कि यह हल्द्वानी के बाजार तक ही पहुंच पाती है। राजमा, जीआई टैगिंग से बढ़ेगी वैल्यू।

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