डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की पहाड़ी जिंदगी, पलायन का दर्द और बुजुर्गो के अकेलेपन को पर्दे पर उतारने वाली फिल्म पायर इन दिनों दर्शकों के बीच चर्चा में बनी हुई है. फिल्म में आमा-बूबू के किरदार लोगों को भावुक कर रहे हैं. फिल्म का आगाज दूर तक फैले उत्तराखंड के उन्हीं खूबसूरत पहाड़ों से होता है, जहां एक 80 साल का बूढ़ा पदम सिंह (पदम सिंह कापड़ी) अपनी बूढ़ी बीवी तुलसी (हीरा देवी) को साथ लेकर कूदने जाता है। यह पहला सीन कहानी की मार्मिक विसंगति को स्थापित कर देता है। होता यूं है कि पलायन का दंश झेल रहे इस इलाके में उंगलियों पर गिनने लायक लोग ही बचे हैं। पदम सिंह का खुद का बेटा हरिया 28 साल पहले शहर कमाने गया था, जो दोबारा नहीं लौटा।बूढ़े पदम सिंह के लिए अपनी बीमार पत्नी तुलसी को ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते से शहर ले जाने के लिए लक्ष्मण (सुभाष चंद्रा) और जीवन (शुभम चौधरी) का ही आसरा है। अब इनमें से भी एक की नौकरी लग गई और दूसरे का परिवार गांव छोड़कर जाने वाला है। लिहाजा पदम सिंह को पत्नी समेत इन्हीं पहाड़ों से कूद जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं सूझता। हालांकि, कहानी आगे इससे भी कहीं ज्यादा दर्दनाक मोड़ लेती है, जो आपको झकझोर देता है।करीब 80 और 75 वर्ष के बुजुर्ग दंपती की भूमिका निभाने वाले दोनों कलाकारों ने अपने सहज और स्वाभाविक अभिनय से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है.फिल्म की कहानी ऐसे बुजुर्ग दंपती के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका बेटा रोजगार की तलाश में अपना गांव छोड़कर बाहर चला जाता है. समय बीतता जाता है, लेकिन बेटा घर वापस नहीं लौटता है. वहीं गांव में अकेले रह गए आमा-बूबू हर दिन अपने बेटे की राह देखते हैं. उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें न केवल अपनों की कमी खलती है, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन की पीड़ा भी झेलनी पड़ती है.फिल्म में बूबू का किरदार पदम सिंह कापड़ी ने निभाया है, जबकि आमा की भूमिका हीरा देवी ने निभाई है. इन सबके बीच सबसे बड़ी बात यह रही कि फिल्म की हीरोइन बनाने के बाद विनोद ने हीरा देवी को ऐसे ही नहीं जाने दिया और न ही उन्हें अनदेखा किया, बल्कि उन्हें अन्य बॉलीवुड अभिनेत्रियों की तरह पूरी इज्जत दी गई और शूटिंग सेट पर भी पूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। यह सिलसिला यही नहीं रुका, विनोद भी उनके साथ तेलिन जाने के लिए उत्साहित थे। इस समारोह में हीरा देवी शामिल हो सकें, इसके लिए पहले उनकी भैंस की चिंता का समाधान किया गया। हीरा देवी की बेटी अपनी मां के घर पहुंचीं और अब उनके पास भैंस को संभालने की जिम्मेदारी है। दोनों ही पेशेवर अभिनेता नहीं हैं. पदम सिंह कापड़ी भारतीय सेना में हवलदार रह चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद खेतीबाड़ी करते थे. वहीं हीरा देवी गृहिणी हैं. वह खेतीबाड़ी के साथ पशुपालन भी करती हैं, और लोकगीतों में उनकी रुचि रही है. दोनों कलाकार पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के रहने वाले हैं. दुख की बात यह है कि दोनों अपने-अपने असल जीवनसाथी को कुछ साल पहले खो चुके हैं. फिल्म की शूटिंग पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के पुराना थल गांव में हुई है. वहीं फिल्म की मूल कहानी का विचार निर्देशक विनोद कापड़ी को वर्ष 2017 में मुनस्यारी के पास ट्रेकिंग के दौरान मिला था. इस दौरान उनकी मुलाकात एक बुजुर्ग दंपती से हुई थी, जो गांव में लगभग अकेले रहते थे. उनके बच्चे रोजगार की तलाश में बाहर चले गए थे. बुजुर्ग दंपति का नाम तुलसी देवी और पदम सिंह था. बुजुर्ग दंपती की जिंदगी, उनका अकेलापन और एक-दूसरे के प्रति उनका लगाव निर्देशक के मन में बस गया. इसी वास्तविक अनुभव ने फिल्म की कहानी को जन्म दिया. फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि पर्दे पर पति-पत्नी का किरदार निभाने वाले पदम सिंह और हीरा देवी असल जिंदगी में पति-पत्नी नहीं हैं. हीरा देवी विधवा हैं, जबकि पदम सिंह की पत्नी का निधन हो चुका है. शुरुआत में हीरा देवी किसी दूसरे पुरुष के साथ पत्नी का किरदार निभाने को लेकर सहज नहीं थीं. हालांकि, परिवार और फिल्म की टीम के समझाने के बाद वह इस भूमिका के लिए तैयार हुई. दोनों ने अभिनय की पारंपरिक दुनिया से बाहर रहते हुए अपने अनुभवों और स्वाभाविक भाव-भंगिमाओं से किरदारों को जीवंत बना दिया.निर्देशक विनोद कापड़ी ने फिल्म में पेशेवर कलाकारों के बजाय पहाड़ के वास्तविक परिवेश में रहने वाले लोगों को मौका दिया. यही वजह है कि फिल्म में पहाड़ी जीवन, भाषा, रहन-सहन और बुजुर्गो की भावनाएं बेहद स्वाभाविक नजर आती हैं. फिल्म केवल एक बुजुर्ग दंपती की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के गांवों से लगातार हो रहे पलायन और पीछे छूट रहे माता-पिता की पीड़ा को भी सामने लाती है.फिल्म के जरिए यह सवाल भी उठता है कि बेहतर भविष्य की तलाश में गांव छोड़कर जाने वाली युवा पीढ़ी के पीछे अपने घरों में अकेले रह गए बुजुर्गो की सुध कौन लेगा. आमा-बूबू के किरदार इसी सामाजिक हकीकत को दर्शकों के सामने रखते हैं. इन दोनों कलाकारों का सहज अभिनय और फिल्म की भावुक कहानी लोगों को अपनी जिंदगी से जुड़ी हुई महसूस होती है. यह फिल्म पत्रकार से फिल्मकार बने विनोद कापड़ी ने लिखी और निर्देशित की है, जो खुद पहाड़ के बेटे हैं। उन्होंने पहाड़ों की अंतरात्मा में छिपे डर और पीड़ा को जिस तरह पर्दे पर उतारा है, वह वहां के एक भावुक बच्चे के बस की ही बात है। बकरियां चराने वाला पदम सिंह गांव में बचे इक्के-दुक्के लोगों को रोकने के लिए जिस तरह अपनी बकरियां तोहफे में देता है, वह देखकर मन भर आता है। फिर, सारे जतन के बावजूद लोगों का पलायन न रुकने पर उसकी आंखों में तैरता सूनापन, डर और हताशा देखकर यूं लगता है, मानों पहाड़ खुद चीत्कार रहे हों- ओ मेरे प्यारो, मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।
सोचकर देखिए, भला इससे भयावह क्या होगा कि जब मौत एक मजाक बन जाए और घर से बाहर जाते वक्त एक पति अपनी पत्नी से कहे- ‘मैं आता हूं, तू मरना मत’ या पत्नी कहे- ‘मैं तुझसे पहले मर गई तो तुझे कौन जलाएगा।’ फिल्म में आंखें नम कर देने वाले ऐसे सीन और संवाद की भरमार है, लेकिन इसके बीच जीवन की छोटी खुशियों और हंसने-मुस्कुराने के बहाने भी कम नहीं हैं। खासकर पदम सिंह और तुलसी की प्यारी नोक-झोंक मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है।फिल्म को सजीव बनाने में इसके मुख्य कलाकारों पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी का भी उतना ही बड़ा हाथ है। इससे पहले अभिनय से इन दोनों का कोई वास्ता नहीं रहा है। लेकिन इन दोनों कलाकारों में एक सच्चाई, एक अच्छाई है, जो दिल छू लेती है। इसके अलावा, तकनीकी रूप से भी मजबूत है। सिनेमेटोग्राफर मानस भट्टाचार्य ने उत्तराखंड के पहाड़ों, वहां के गांवों, घरों और जीवन को अपने कैमरे में बाकमाल ढंग से कैद किया है।अमन पंत के कंपोजिशन में पहाड़ी लोकगीत माहौल को जीवंत बनाते हैं। कुल मिलाकर, यह फिल्म देखते हुए आप हंसेंगे, रोएंगे और सबसे बढ़कर अपने गांव की यादों में खो जाएंगे। एक ऐसी फिल्म है, जो खत्म होने के बाद आपके अंदार भी पहाड़ जैसी स्थिर खामोशी भर देती है।पहाड़ों की खूबसूरती के पीछे छिपी खामोशी और वहां के निवासियों के अकेलेपन को पर्दे पर उतारना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। लेखक-निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ (चिता) इसी विषय को बेहद संजीदगी के साथ पेश करती है। यह फिल्म उत्तराखंड के उन गांवों की कहानी है, जो पलायन के कारण धीरे-धीरे वीरान होते जा रहे हैं। फिल्म का मुख्य केंद्र एक बुजुर्ग दंपति है, जो अपने ही घर में अपनों के चले जाने के बाद तन्हा रह गए हैंकुल मिलाकर, ‘पायर’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पलायन के दंश को झेल रहे पहाड़ों का एक रुदन है। यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और अंत में एक गहरी खामोशी छोड़ जाती है। यदि आप सिनेमा में यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं की तलाश करते हैं, तो यह फिल्म निश्चित रूप से देखी जानी चाहिए।. ‘पायर’ ने पहले 14वें डीसी दक्षिण एशियाई फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और बोस्टन के 8वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार जीता। जुलाई 2025 में, फिल्म को स्टटगार्ट भारतीय फिल्म महोत्सव में ‘जर्मन स्टार ऑफ इंडिया’ पुरस्कार मिला। पायर का विश्व प्रीमियर पिछले साल नवंबर में 28वें टालिन ब्लैक नाइट्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में किया गया था। मुख्य प्रतियोगिता में चुने जाने वाली यह एकमात्र भारतीय फिल्म थीएक महीने में इसने जर्मनी, स्पेन और यूके में तीन दर्शक पुरस्कारों सहित पांच अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














