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25 लाख की जमापूंजी से जमीन खरीदी संवर रहा 400 से ज्यादा गरीब बच्चों का भविष्य

05/09/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज शिक्षक दिवस 2026 है. आज समाज अपने शिक्षकों के योगदान को याद कर रहा है. ऐसे में आज आपको रामनगर के एक ऐसे शिक्षक की कहानी. जिन्होंने कहानी सिर्फ शिक्षा देने की नहीं, बल्कि अपने संसाधनों और जीवनभर की जमा पूंजी को बच्चों के भविष्य के नाम कर देने की है. दरअसल, राजकीय इंटर कॉलेज ढेला के अंग्रेजी प्रवक्ता नवेंदु मठपाल पिछले करीब 6 सालों से उन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, जिनके परिवार आर्थिक तंगी, मजदूरी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण अपने बच्चों को नियमित स्कूल नहीं भेज पाते. रामनगर कोसी नदी के किनारे रेता खनन से जुड़े मजदूर परिवारों और कूड़ा बीनने वाले परिवारों के बच्चों से शुरू हुई यह मुहिम आज रामनगर के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित तीन सायंकालीन विद्यालयों तक पहुंच चुकी है. इन विद्यालयों में वर्तमान में 400 से ज्यादा बच्चे जुड़े हुए हैं और उन्हें पूरी तरह निशुल्क शिक्षा दी जा रही है.  इस अभियान की सबसे बड़ी और प्रेरणादायक बात ये है कि सांवल्दे पश्चिम में बुक्सा समुदाय के बच्चों के लिए विद्यालय भवन तैयार करने में नवेंदु मठपाल ने अपनी निजी जमा पूंजी से करीब 25 लाख रुपए लगा दिए. उन्होंने जमीन लेकर विद्यालय भवन तैयार कराया. ताकि, आर्थिक रूप से कमजोर और जनजातीय परिवारों के बच्चों को पढ़ने के लिए बेहतर स्थान मिल सके. झोपड़ी से शुरू हुई शिक्षा की मुहिम इस पूरी कहानी की शुरुआत नवंबर 2020 में हुई. अक्टूबर 2020 में कोसी नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद नवेंदु मठपाल और रचनात्मक शिक्षक मंडल से जुड़े शिक्षकों ने आपदाग्रस्त परिवारों के बीच जाकर उनकी स्थिति को समझा. इस दौरान सामने आया कि कई बच्चे मजदूरी और परिवार की आर्थिक परेशानियों के कारण शिक्षा से दूर हो गए हैं. 26 नवंबर 2020 को संविधान दिवस के अवसर पर रामनगर के पूछड़ी में ज्योतिबा फुले सायंकालीन विद्यालय की शुरुआत की गई. शुरुआत किसी पक्की इमारत से नहीं, बल्कि एक झोपड़ी से हुई थी. संसाधन सीमित थे, लेकिन बच्चों को पढ़ाने का संकल्प मजबूत था. धीरे-धीरे मजदूरी करने वाले और कूड़ा बीनने वाले परिवारों के बच्चे इस विद्यालय से जुड़ने लगे. अभियान का असर ऐसा रहा कि बड़ी संख्या में बच्चों ने शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया और बाद में 200 से ज्यादा बच्चों का नजदीकी सरकारी विद्यालयों में दाखिला कराया गया. जनवरी 2021 में इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए कॉर्बेट पार्क से सटे और घने जंगलों के बीच बसे पटरानी गांव में सावित्रीबाई फुले सायंकालीन विद्यालय शुरू किया गया. पटरानी की बालिकाओं को कंप्यूटर शिक्षा से जोड़ने के लिए बाद में सावित्रीबाई फुले बालिका कंप्यूटर केंद्र की शुरुआत भी की गई. यहां बच्चों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें तकनीक और रचनात्मक गतिविधियों से भी जोड़ा गया. इन दोनों विद्यालयों के माध्यम से उन बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास किया गया, जो सामान्य परिस्थितियों में शायद स्कूल तक नहीं पहुंच पाते. अभियान की तीसरी और सबसे बड़ी पहल इस साल सामने आई. जनजातीय बच्चों खासकर बुक्सा समुदाय के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से नवेंदु मठपाल ने सांवल्दे पश्चिम में अपनी निजी जमा पूंजी से करीब 25 लाख रुपए खर्च कर जमीन लेकर विद्यालय भवन तैयार कराया. इस विद्यालय की नींव तत्कालीन उत्तराखंड बोर्ड सचिव और वर्तमान में शिक्षा निदेशक माध्यमिक ने रखी. इसके बाद 30 जनवरी 2026 को अपर शिक्षा निदेशक एसपी सेमवाल ने विद्यालय के विधिवत शुभारंभ की घोषणा की. आज इस विद्यालय में 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं. यहां कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों के लिए तीन कक्षा-कक्ष हैं और स्थानीय युवा शिक्षक-शिक्षिकाओं के रूप में बच्चों को पढ़ाने में सहयोग कर रहे हैं. इन सायंकालीन विद्यालयों की खासियत ये है कि यहां बच्चों को केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं रखा जाता. पढ़ाई के साथ थिएटर, सिनेमा, खेल, पर्यावरण, स्काउट और विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों से बच्चों को जोड़ा जाता है. समय-समय पर बाहर से विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों को बुलाकर बच्चों को नई चीजों की जानकारी दी जाती है.जनसहयोग से बच्चों को शैक्षणिक सामग्री के साथ सर्दियों में गर्म कपड़े भी उपलब्ध कराए जाते हैं. इन विद्यालयों में स्थानीय युवाओं की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है. चनात्मक शिक्षक मंडल उत्तराखंड से जुड़े सरकारी शिक्षक सहयोगी की भूमिका में रहते हैं. जबकि, स्थानीय युवा नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा संभालते हैं. सुमित कहते हैं कि आज के समय में अपनी जमा पूंजी से 25 लाख रुपए लगाकर गरीब और जरूरतमंद बच्चों के लिए विद्यालय खड़ा करना आसान नहीं है. नवेंदु मठपाल ने अपनी सोच और पहल से उन बच्चों के लिए रास्ता खोला है, जो आर्थिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा से दूर थे. वहीं, बच्चों के लिए स्कूल खुशी का ठिकाना बना है. नवेंदु मठपाल इस पूरे अभियान को किसी पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं चलाते, उनका स्पष्ट कहना है कि वो व्यक्तिगत रूप से कभी कोई पुरस्कार नहीं लेंगे. उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान उन बच्चों का स्कूल तक पहुंचना है, जो कभी शिक्षा से दूर थे.ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के विचारों से प्रेरित होकर शुरू हुई यह मुहिम आज तीन विद्यालयों और 400 से ज्यादा बच्चों तक पहुंच चुकी है. यह कहानी सिर्फ एक शिक्षक की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी है जिसमें शिक्षा नौकरी नहीं, जिम्मेदारी बन जाती है. शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े बच्चों तक पहुंचकर ही वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है। झोपड़ी से शुरू हुई यह पहल आज सैकड़ों बच्चों के सपनों को पंख दे रही है। शिक्षक की भूमिका सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े बच्चों तक पहुंचकर ही वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है। झोपड़ी से शुरू हुई यह पहल आज सैकड़ों बच्चों के सपनों को पंख दे रही है।  शिक्षक सूर्य की उस किरण भांति होते हैं जो अज्ञानता का अंधकार दूर कर जीवन को ज्ञान की रोशनी से प्रकाशमान कर देते हैं। विद्यार्थियों का भटकाव दूर कर उन्नति का पथ दिखाते हैं। कई बच्चे घरेलू परिस्थितियों के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। राष्ट्र के ऐसे कर्णधारों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की जिम्मेदारी सरकार के साथ ही गुरुजनों और पूरे समाज की है।  शिक्षक सूर्य की उस किरण भांति होते हैं जो अज्ञानता का अंधकार दूर कर जीवन को ज्ञान की रोशनी से प्रकाशमान कर देते हैं। विद्यार्थियों का भटकाव दूर कर उन्नति का पथ दिखाते हैं। कई बच्चे घरेलू परिस्थितियों के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। राष्ट्र के ऐसे कर्णधारों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की जिम्मेदारी सरकार के साथ ही गुरुजनों और पूरे समाज की है।  शिक्षक सूर्य की उस किरण भांति होते हैं जो अज्ञानता का अंधकार दूर कर जीवन को ज्ञान की रोशनी से प्रकाशमान कर देते हैं। विद्यार्थियों का भटकाव दूर कर उन्नति का पथ दिखाते हैं। कई बच्चे घरेलू परिस्थितियों के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। राष्ट्र के ऐसे कर्णधारों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की जिम्मेदारी सरकार के साथ ही गुरुजनों और पूरे समाज की है।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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