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सूखे की मार से सेब की बागवानी संकट में

21/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में इस वर्ष सर्दियों के मौसम में बर्फबारी न होने के कारण सेब की खेती पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और नैनीताल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अब तक पर्याप्त हिमपात न होने से न केवल तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, बल्कि सेब के पेड़ों को मिलने वाली ‘चिलिंग ऑवर्स’ की प्रक्रिया भी बाधित हो गई है. बर्फबारी न होने से यह आवश्यकता पूरी नहीं हो पा रही है. बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर जमीन के भीतर तक नमी पहुंचाती है, जो मार्च-अप्रैल में पेड़ों के खिलने के समय काम आती है. बारिश की बूंदें बर्फ की तरह मिट्टी में नमी जमा नहीं कर पाती हैं. समय से पहले फ्लावरिंग का खतरा भी हो जाता है. तापमान अधिक रहने से पेड़ों में समय से पहले फूल आने का डर है, जो बाद में ओलावृष्टि या पाले की चपेट में आकर नष्ट हो सकते हैं.उत्तराखंड में फल उत्पादन को आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बनाने और किसानों की आय में दीर्घकालिक वृद्धि सुनिश्चित करने की दिशा में सेब की अति सघन बागवानी योजना को तेज गति से लागू करने पर जोर दिया जा रहा है।बारिश और बर्फबारी न होने से सेब उत्पादकों की चिंताएं बढ़ गई हैं. कश्तकारों को अब बीते वर्ष की भांति इस वर्ष भी सेब की फसल के नुकसान होने का डर सता रहा है. बीते वर्ष भी समय पर बारिश और बर्फबारी नहीं हुई थी, जिससे स्योरी फल पट्टी सहित धारी कफनौल क्षेत्र में महज तीस प्रतिशत सेब की फसल का उत्पादन हो पाया था. काश्तकारों को इस वर्ष अच्छी फसल की उम्मीद थी, लेकिन मौसम ने उनके अरमानों पर फिर से पानी फेर दिया है.रंवाई घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी ब्लॉक में पच्चीस हजार मीट्रिक टन से भी अधिक सेब का उत्पादन होता है, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है. सेब की अच्छी पैदावार के लिए शीतकालीन अवधि में चिलिंग आवश्यकता का पूरा होना जरूरी होता है. चिलिंग का मतलब सेब, चेरी और अन्य फलों के पेड़ों को वसंत में ठीक से खिलने और फलने-फूलने के लिए सर्दियों में एक निश्चित अवधि तक ठंडे तापमान (आमतौर पर 0 से सात डिग्री या 32 से 45 फारेनहाइट के बीच) की आवश्यकता होती है. 15 दिसंबर से 15 फरवरी के मध्य पूरी होती है. जनवरी का आध से ज्यादा महीना बीत चुका है, अभी तक बारिश और बर्फ नहीं गिरी है. सेब के पौधों की आवश्यक शीत मान घंटों की पूर्ति न होने से पौधों की शारीरिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो रही हैं, जिसका उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है. वहीं, रवाईं घाटी में बीते तीन महीनों से बारिश नहीं होने के कारण मटर की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है. क्षेत्र के काश्तकारों का कहना है कि समय पर बारिश न होने से मटर की फसल में न तो उचित बढ़वार हो पाई और न ही फलन हुआ, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. मटर काश्तकार ने बताया कि सिंचाई के सीमित साधनों के चलते सूखे खेतों में फसल बचाना संभव नहीं हो पाया और पूरी मेहनत बेकार चली गई. मौसम के बदलते रुख के बीच उत्तराखंड में अब एक नई मुसीबत खड़ी हो गई है. दरअसल, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश और बर्फबारी मानो गायब सी हो चुकी है. ऐसे में मौजूदा फसलों और बागवानी को लेकर नई चिंता है. खासकर सेब से जुड़े किसान तो इस बार भारी नुकसान होने को लेकर आशंकित हैं. ऐसे में सभी को अगले एक हफ्ते के भीतर बर्फबारी या अच्छी बारिश का इंतजार है.  उत्तराखंड में करीब 57 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. प्रदेश में सबसे ज्यादा सेब उत्पादन उत्तरकाशी जिले में होता है, यहां अकेले करीब 20 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा उत्पादन किया जाता है. उत्तराखंड राज्य स्थापना को 25 साल हो चुके हैं. लेकिन सेब काश्तकारों को बढ़ावा देने के लिए आज तक कोई प्रयास नहीं हुआ. जिसका नजीता ये हुआ कि उत्तराखंड में ना तो सेब की बेहतर पौध को लेकर कुछ हुआ और ना ही गुणवत्ता पर कोई काम हुआ.हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिले को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी 11 जिलों में ज्यादा या कम मात्रा में सेब का उत्पादन किया जा रहा है. इतनी बड़ी मात्रा में उत्पादन होने के बावजूद भी उत्तराखंड सरकार में कभी सेब को लेकर ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई. यही कारण है कि मजबूरी में काश्तकारों को हिमाचल पेटियों में अपने सेब को बेचना पड़ता है. वैसे यह पहला मौका है जब राज्य सरकार ने उत्तराखंड के लिए 4 लाख पेटी की व्यवस्था की है, जिसमें प्रदेश का सेब प्रदेश के नाम से बाजारों तक पहुंच रहा है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कुल करीब 24 लाख टन सेब का उत्पादन किया जाता है, जिसमें से 60% उत्पादन तो अकेले जम्मू-कश्मीर से होता है. इसके बाद हिमाचल भी करीब 30% उत्पादन करता है. बाकी उत्पादन उत्तराखंड और कुछ नार्थ ईस्ट के साथ बाकी राज्यों से होता है. उत्तराखंड में खास तौर पर देखें तो गोल्डन डिलीशियस और रेड डिलीशियस काफी बड़ी मात्रा में होता है. पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ रहा है. बर्फबारी की कमी से न केवल पैदावार घटेगी, बल्कि सेब की ‘शेल्फ लाइफ’ और बाजार मूल्य पर भी बुरा असर पड़ेगा. प्रदेश की उत्पादन क्षमता विशेषकर सेब की उत्पादन क्षमता का आंकलन किए जाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जनपदों को सेब उत्पादन में क्षमता के अनुरूप 2030, 2040 एवं 2050 में कितना उत्पादन होगा, इसके लिए उत्पादन लक्ष्य निर्धारित करते हुए योजना को धरातल पर उतारा जाए। मुख्य सचिव ने कहा कि झाला (हर्षिल, उत्तरकाशी) स्थिति कोल्ड स्टोरेज की तर्ज पर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी कोल्ड स्टोरेज तैयार किए जाएं। इससे किसान अपना सेब और अन्य उत्पाद ऑफ सीजन में मार्केट में उतार कर अधिक लाभ ले सकेंगे।मुख्य सचिव ने कहा कि प्रदेश के अधिकतम क्षेत्रों में अभी भी पुरानी कम उत्पादन क्षमता वाली किस्म की फसलों का उत्पादन हो रहा है। उन्हें हाई डेंसिटी ऐपल प्लांट्स से रिप्लेस करने की आवश्यकता है। इसके लिए बड़े स्तर पर किसानों से संवाद करते हुए इस दिशा में कार्य किया जाए। उन्होंने इसकी भावी मांग के अनुरूप नर्सरियों को अपग्रेड किए जाने के निर्देश दिए। कहा कि बड़े पैमाने पर हाई डेंसिटी प्लांट्स तैयार किए जाने के लिए  नर्सरियां विकसित की जाएं। फुल टाईम टैक्निकल सपोर्ट के लिए पीएमयू गठित किया जाना चाहिए, ताकि वृहद स्तर पर इस योजना को संचालित किया जा सके। इससे धरातल पर योजनाओं को सफल बनाने के लिए लगातार मॉनिटरिंग की जा सकेगी।  बर्फबारी न होने के कारण इस स्थिति से सबसे ज्यादा चिंता सेब उत्पादक किसानों को है. पिछले साल भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की बागवानी कुछ खास बेहतर नहीं रही थी. उस दौरान तेज बारिश के कारण नुकसान हुआ और बाजार तक सेब पहुंचाना भी मुश्किल हो गया, जिससे किसानों को आर्थिक झटका लगा. लेकिन इस बार हालात और भी गंभीर हैं, क्योंकि सेब की अच्छी फसल होने को लेकर ही संदेह बना हुआ है. अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी का पहला सप्ताह सेब की फसल के लिए सबसे अहम समय माना जाता है. इन महीनों में करीब 100 दिनों की ठंडी अवधि फसल की गुणवत्ता तय करती है. लेकिन इस बार बर्फबारी तो दूर, बारिश भी न होने से वातावरण से नमी लगभग खत्म हो चुकी है, जो सेब के लिए बेहद खराब संकेत है. पहले उत्तराखंड के सेब की बाहरी राज्यों में भी मांग थी, लेकिन धीरे-धीरे यह कम हो गई. अन्य राज्यों के सेब की गुणवत्ता अच्छी होने की वजह से उत्तराखंड का सेब न सिर्फ कम बिकने लगा, बल्कि उत्तराखंड के बाजारों में भी बाहरी राज्यों का सेब आ रहा है. किसानों का कहना है कि इसके लिए राज्य सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैंदरअसल लम्बे समय से देहरादून जिले के इस क्षेत्र में बारिश नहीं हुई है. बारिश नहीं होने के कारण और दिन में धूप निकलने से घास पूरी तरह सूख गई है. ऐसे में हल्की चिंगारी से भी आग लगने की घटनाएं हो रही हैं. ये चिंगारी सूखी खास एकदम पकड़ लेती है. देखते ही देखते आग विकराल रूप ले लेती है. इससे क्षेत्र में बागवानी और अन्य फसलों को भी नुकसान हो रहा है. करीब किसानों द्वारा जौनसार बावर क्षेत्र में बागवानी को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा. युवा भी बागवानी की ओर आकर्षित हो रहे हैं और बगीचे तैयार कर रहे हैं. ऐसे में आग और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आने से बागवानी करने वाले किसानों के हौसले तोड़ रही हैं..लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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