डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर, 1949 को मिला और संविधान के भाग-17 में इससे संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए। इसी ऐतिहासिक महत्व के कारण 1953 से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ का आयोजन किया जाता है। हिंदी के प्रोत्साहन की दृष्टि से इस दिवस के आयोजन का महत्त्वपूर्ण स्थान हैपंडित गोविन्द बल्लभ पन्त प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, वरिष्ठ भारतीय राजनेता और उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के साथ साथ देश के दूसरे गृहमंत्री के रुप में जाने जाते हैं, जिनको 17 जुलाई 1937 से लेकर 2 नवम्बर 1939 तक वे ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रान्त का पहला मुख्यमन्त्री बनने का गौरव हासिल हुआ था. इसके बाद दोबारा उन्हें यही दायित्व फिर सौंपा गया और वह 1 अप्रैल 1946 से 15 अगस्त 1947 तक संयुक्त प्रान्त के मुख्यमन्त्री बने रहे.इसके बाद जब भारतवर्ष का अपना संविधान बन गया और संयुक्त प्रान्त का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रखा गया तो फिर से तीसरी बार उन्हें ही इस पद के लिये सर्व सम्मति से चुना गया. इस प्रकार से स्वतन्त्र भारत के नवनामित राज्य के भी वे मुख्यमंत्री बने. वह 26 जनवरी 1950 से लेकर 27 दिसम्बर 1954 तक मुख्यमन्त्री रहे.जमींदारी प्रथा को खत्म कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान बताया जाता है. बताया जाता है कि जब पन्त जी 1946 से दिसम्बर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तो भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि होने के कारण इस पर काम करना शुरु किया. 21 मई 1952 को जमींदारी उन्मूलन क़ानून को प्रभावी बनाया.भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी, लेकिन देश में जब 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवीं सूची में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया. संविधान के मुताबिक 26 जनवरी 1965 में हिंदी को अंग्रजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था. ऐसा आसानी से हो सके इसके लिए संविधान में 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों को बनाने की भी बात कही गई थी. इन आयोगों को हिंदी के विकास के संदर्भ में रिपोर्ट देनी थी और इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति के द्वारा राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें देकर इसको लागू करवाना था. छोटे मोटे विरोध के बाद 26 जनवरी 1965 को हिंदी देश की राजभाषा बन गई. भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी, लेकिन देश में जब 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवीं सूची में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया. संविधान के मुताबिक 26 जनवरी 1965 में हिंदी को अंग्रजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था. ऐसा आसानी से हो सके इसके लिए संविधान में 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों को बनाने की भी बात कही गई थी. इन आयोगों को हिंदी के विकास के संदर्भ में रिपोर्ट देनी थी और इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति के द्वारा राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें देकर इसको लागू करवाना था. छोटे मोटे विरोध के बाद 26 जनवरी 1965 को हिंदी देश की राजभाषा बन गई. भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी, लेकिन देश में जब 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवीं सूची में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया. संविधान के मुताबिक 26 जनवरी 1965 में हिंदी को अंग्रजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था. ऐसा आसानी से हो सके इसके लिए संविधान में 1955 और 1960 में राजभाषा आयोगों को बनाने की भी बात कही गई थी. इन आयोगों को हिंदी के विकास के संदर्भ में रिपोर्ट देनी थी और इन रिपोर्टों के आधार पर संसद की संयुक्त समिति के द्वारा राष्ट्रपति को इस संबंध में कुछ सिफारिशें देकर इसको लागू करवाना था. छोटे मोटे विरोध के बाद 26 जनवरी 1965 को हिंदी देश की राजभाषा बन गई. बताया जाता है कि एक बार पंत ने सरकारी बैठक बुलाई तो उसमें चाय-नाश्ते का इंतजाम ऊी कर दिया गया. जब उसका बिल पास होने के लिए आया तो उसमें हिसाब में छह रुपये और बारह आने लिखे हुए थे. पंत जी ने बिल पास करने से मना कर दिया और कहा कि यह तो नियम विरुद्ध है. जब उनसे इस बिल को पास न करने का कारण पूछा गया तो वह बोले थे, ‘सरकारी बैठकों में सरकारी खर्चे से केवल चाय मंगवाने का नियम है। ऐसे में नाश्ते का बिल नाश्ता मंगवाने वाले व्यक्ति को खुद देना होगा. हां, चाय का बिल जरूर पास हो सकता है.’इसके बाद अधिकारियों ने उनसे कहा कि कभी-कभी चाय के साथ नाश्ता मंगवाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए. ऐसे में इसे पास करने से कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. उस दिन चाय के साथ नाश्ता करने वाले लोगों में पंतजी खुद भी शामिल थे. इसलिए कुछ देर सोचकर पंत ने अपनी जेब से रुपये निकाले और बोले, ‘चाय का बिल पास हो सकता है, लेकिन नाश्ते का नहीं. नाश्ते का बिल मैं अदा करूंगा. नाश्ते पर हुए खर्च को मैं सरकारी खजाने से चुकाने की इजाजत कत्तई नहीं दे सकता. उस खजाने पर जनता और देश का हक है, मंत्रियों का नहीं.’ उनकी दलील व कार्यशैली को सुनकर सभी अधिकारी चुप हो गए.स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान देने के साथ साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा भारत के गृहमंत्री के रूप में उत्कृष्ट कार्य करने के चलते 1957 में पंडित गोविंद बल्लभ पंत को देश की आजादी और भारत के आधुनिक विकास में उनके योगदान के लिए भारत रत्न की उपाधि से नवाजा गया. हिंदी भाषा की पुरजोर वकालत के साथ पं. गोविंद बल्लभ भारतीय कामगारों के लिए भी खूब लड़े। दरअसल, कुली बेगार कानून के मुताबिक भारतीय नागरिक गोरों का कोई भी सामान मुफ्त में ढोएगा। यानि उसे मेहनताना नहीं दिया जाएगा। यह कानून पं. गोविंद बल्लभ को खटक गया। तत्कालीन ब्रितानी कमिश्नरी (अल्मोड़ा) में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान पं. पंत की न्यायाधीश से ही बहस हो गई। अंग्रेज न्यायाधीश को यह नागवार गुजरा। इसके बाद से ही वे वकालत छोड़कर गांधी जी के साथ असहयोग आंदोलन में जुड़ गए। वर्ष 1937 में पंत जी संयुक्त प्रांत के प्रथम मुख्यमंत्री बने और 1946 से 1954 तक वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वह उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र भारत के पहले मुख्यमंत्री थे। तब उन्होंने आधुनिक उत्तर भारत की नींव रख हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देने की बात फिर उठाई। पंडित गोविंद बल्लभ पंत को आधुनिक उत्तर भारत का निर्माता भी कहा जाता है। बात चार मार्च 1925 के अधिवेशन की है। जब पं. गोविंद बल्लभ ने भरी सभा में गुलाम हिंदुस्तान की सर्वाधिक प्रचलित बोली हिंदी को जन जन की वाणी और बुनियादी तालीम से लेकर उच्च शिक्षा तक उपयोग में लाने की पुरजोर वकालत की। इससे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी खासे प्रभावित हुए। उन्होंने कहा था- राष्ट्रभाषा हिंदी के बगैर पूरा भारत गूंगे देश के समान है।आज वह देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके उच्च नैतिक विचार, सेवा भावना, सादगी, सहजता, हिन्दी प्रेम तथा उज्ज्वल चरित्र देशवासियों का युगों−युगों तक मार्गदर्शन करता रहेगा। हम इस महान आत्मा को शत-शत नमन करते हैं। अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की संख्या चीन की मंदारिन भाषा से बहुत कम है। कुल आंकड़ों की बात करें तो चायनीज भाषा 1 अरब से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। ज्यादातर अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में बोली जाने वाली इस भाषा को लगभग 50 करोड़ 80 लाख लोग बोलते हैं। यह दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी तीसरे नंबर पर है। दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग इस भाषा को समझ सकते हैं। भारत में लगभग 45 करोड़ नागरिकों की अभिव्यक्ति का जरिया हिन्दी भाषा ही है। विश्व के तीसरे नम्बर की भाषा हिन्दी होने के नाते संयुक्त राष्ट्र संघ को इसे अपनी आधिकारिक भाषा घोषित करके इस भाषा तथा सबसे बड़े तथा युवा लोकतांत्रिक देश भारत को सम्मान देना चाहिए।संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं में हिन्दी भाषा को भी शामिल कराना हिन्दी प्रेमी पंत जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगीलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं,











