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अरुण जेटली वकील से वित्त मंत्री तक का सफर

24/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

अरुण जेटली के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उनका जन्म महाराज किशन जेटली और रतन प्रभा जेटली के घर में हुआ था। उनके पिता भी एक वकील थे। उन्होंने अपनी विद्यालयी शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, नई दिल्ली से पूरी की और 1973 में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री ली। उन्होंने 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय के विधि संकाय से विधि की डिग्री हासिल की थी। छात्र के रूप में उन्होंने अकादमिक और पाठ्यक्रम के अतिरिक्त गतिविधियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। अरुण जेटली 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे। अरुण जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से विवाह किया और उनके दो बच्चे- पुत्र रोहन और पुत्री सोनाली हैं।अरुण जेटली भारतीय राजनेताओं में जेंटलमैन की छवि रखते थे और उनका हमेशा यह मानना रहा कि राजनीति पार्ट टाइम ड्यूटी नहीं है। इसलिए जब वह वकालत में रहे तो पूरी तरह उस पेशे के साथ ही न्याय किया और जब राजनीति में अहम पदों पर रहे तो उन पदों के साथ पूरा न्याय किया। ईमानदार, स्पष्ट वक्ता, गंभीर मुद्दों की गहरी जानकारी रखने वाले, कुशल संगठनकर्ता, चुनाव अभियान संचालनकर्ता, कुशल खेल प्रशासक, छात्र राजनीति से केंद्रीय राजनीति में अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम बनाने वाले नेता, बेकार की बयानबाजी नहीं करने वाले और सभी को सम्मान के साथ संबोधित करने वाले, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, नेता पक्ष, केंद्रीय मंत्री पदों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले, अच्छे कामों के लिए हमेशा अधिकारियों को प्रोत्साहित करने वाले और अपने ब्लॉगों के जरिये मुद्दों का सटीक विश्लेषण करने वाले अरुण जेटली की कमी भारतीय राजनीति को बहुत खलेगी। सबसे पहले अरुण जेटली को 1989 में अडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनाया गया. उसके बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार में उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया था. वकील से एक सफल राजनेता तक का सफर तय करने वाले अरुण जेटली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में मंत्री थे। भारत के पूर्व वित्त मंत्री और भारत सरकार में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री रहे अरुण जेटली का नाम हमेशा भारतीय जनता पार्टी के स्‍वर्णिम इतिहास में शामिल रहेगा। राजनीति में आने से पहले वह सुप्रीम कोर्ट में लॉ प्रैक्टिस कर रहे थे। उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया गया था। जेटली ने 1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। उस समय वह युवा मोर्चा के संयोजक थे। उन्हें पहले अंबाला जेल में और फिर तिहाड़ जेल में रखा गया था। वाजपेयी सरकार के दौरान जेटली पहले कैबिनेट मंत्री भी थे। उन्होंने अतिरिक्त कार्यभार के रूप में मोदी सरकार में रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। यूपीए शासन के दौरान उन्होंने 2009 से 2014 तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया। इसके अलावा पहली बार एक नया मंत्रालय बनाते हुए उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया था. राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद 23 जुलाई 2000 को जेटली को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री का अतिरिक्त कार्यभार भी सौंपा गया था.इससे भी ज्यादा उनकी कमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अखरेगी क्योंकि जेटली उनके अभिन्न मित्र थे। जिन पर वह पूरा भरोसा करते थे और जेटली भी मोदी के साथ हमेशा खड़े रहे।तत्कालीन भाजपा महासचिव नरेंद्र मोदी को जब गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर दिल्ली से गांधीनगर भेजा गया था तब अरुण जेटली को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बनाया गया था। उस समय उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली हर मौके पर मोदी के साथ खड़े रहे और इस बात का गुणगान करते रहे कि कैसे मोदी के राज में गुजरात हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है। अरुण जेटली उस समय चूंकि किसी सदन के सदस्य नहीं थे इसलिए मोदी ने अपने मित्र को गुजरात से राज्यसभा जाने का मौका दिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार को कई मुद्दों को लेकर बदनाम करने का प्रयास किया गया और गुजरात दंगों, पुलिस मुठभेड़ों आदि के अलावा कई ऐसे मुद्दे रहे जिनके माध्यम से गुजरात सरकार खासकर नरेंद्र मोदी और गुजरात के गृहमंत्री रहे अमित शाह को घेरने का प्रयास किया गया। लेकिन इन सब मामलों में अरुण जेटली ने ना सिर्फ पूरी कानूनी सलाह मुहैया कराई बल्कि दिल्ली की राजनीति में मोदी सरकार का पूरी तरह से बचाव किया।नरेंद्र मोदी वैसे तो लालकृष्ण आडवाणी के प्रिय शिष्य रहे लेकिन जब मोदी ने दिल्ली की राजनीति में कदम रखना चाहा तो आडवाणी से पहले जैसे संबंध नहीं रहे। लेकिन इस दौरान भी अरुण जेटली पूरी तरह मोदी के साथ खड़े रहे और भाजपा की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। मोदी ने 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार कार्य की रूपरेखा तैयार करने और निगरानी का काम अपने विश्वस्त अरुण जेटली को सौंप दिया और उन्हें अमृतसर से लोकसभा चुनाव भी लड़वाया। यदि आपको ध्यान हो तो मोदी जब 2014 के चुनाव प्रचार में मशगूल थे तो वह हर रैली में इस बात का ऐलान करते थे कि वह सरकार में आने के बाद कैसे अच्छे दिन लाएंगे लेकिन अमृतसर में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने बारे में कुछ नहीं कहते हुए सिर्फ अरुण जेटली की ही तारीफ की थी और उन्हें अपने से ज्यादा बेहतर नेता बताया था और कहा था कि सरकार बनती है तो जेटली अहम मंत्रालय के मंत्री बनाये जाएंगे। लेकिन अरुण जेटली चुनाव हार गये और उन्होंने मंत्री बनने से इंकार कर दिया। तब संघ के बड़े नेता उन्हें मनाने पहुँचे थे जिसके बाद उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल में आने की सहमति जताई। मोदी अरुण जेटली को कितना मानते थे यह इसी से साबित हो जाता है कि शुरू में अरुण जेटली को वित्त मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय की भी जिम्मेदारी सौंपी गयी। यही नहीं मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कुछ समय के लिए जेटली के पास सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी रहा। नोटबंदी के फैसले की भले बहुत आलोचना हुई लेकिन सारी आलोचना जेटली ने अपने जिम्मे ली और प्रधानमंत्री के इस फैसले का पूरी तरह बचाव किया। यही नहीं नोटबंदी के बाद हो रही परेशानियों से निजात दिलाने के लिए जेटली ने दिन-रात मेहनत की और जल्द ही हालात सामान्य हो गये। इसी प्रकार जीएसटी को लागू करने, उसका सरलीकरण करने का काम जिस कम समय में अरुण जेटली ने कर दिखाया वह काबिलेतारीफ है। लोकसभा चुनाव 2019 के चुनाव परिणाम आने के एक दिन पहले तक अरुण जेटली अपने मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठकें कर के काम निपटाने में लगे हुए थे जबकि उनका स्वास्थ्य उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता था। जब नयी सरकार के गठन से पहले जेटली ने ट्वीट कर नयी सरकार में शामिल नहीं होने का ऐलान किया तो प्रधानमंत्री मोदी तुरंत उनके घर गये थे।पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अरुण जेटली को काफी मानते थे। वह उनकी विद्वता और कार्यक्षमता और प्रतिबद्धता के कायल थे। बहुत वर्षों पहले जब अटलजी से एक साक्षात्कार में पूछा गया था कि उनके और आडवाणी के बाद वह भाजपा का भविष्य किसमें देखते हैं तो उन्होंने प्रमोद महाजन और अरुण जेटली का नाम लिया था। अटलजी ने जब अरुण जेटली को पहली बार अपनी कैबिनेट में बतौर सूचना प्रसारण राज्यमंत्री शामिल किया था तो वह उनके काम को देखकर हतप्रभ रह गये थे और जल्द ही जेटली का प्रमोशन कर उन्हें वाणिज्य एवं उद्योग, विनिवेश, नौवहन, कंपनी मामले और कानून मंत्रालय जैसे अहम विभागों का कैबिनेट मंत्री बना दिया था। यही नहीं जब 2004 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा संगठन को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई तो तत्कालीन मंत्री वेंकैया नायडू और अरुण जेटली को संगठन में भेज दिया गया था। संगठनकर्ता के रूप में भी जेटली ने अपनी कार्यकुशलता का लोहा मनवाया। एक समय तो ऐसा भी आया था जब जेटली को जिस राज्य का प्रभार मिलता वहां पार्टी का प्रदर्शन सुधर जाता और सरकार तक बन जाती थी। कर्नाटक में भी पहली भाजपा सरकार तब बन पायी थी जब अरुण जेटली वहां के चुनाव प्रभारी थे।अरुण जेटली ने बतौर वित्त मंत्री कालेधन के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाया था और कई देशों के साथ इस संबंध में नये समझौते किये गये, अनेकों लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गयी और कार्रवाई करते वक्त यह नहीं देखा गया कि वह व्यक्ति अपनी पार्टी से संबंधित है या दूसरी पार्टी से। डिजिटल लेन-देन की दिशा में भारत दो-तीन सालों में ही दस साल आगे बढ़ गया है तो यह जेटली की ही मेहनत का प्रतिफल है। हमें याद होना चाहिए कि यह जेटली का ही वित्त मंत्री के रूप में कार्यकाल था जब अमेरिका की रेटिंग एजेंसी मूडीज ने 13 साल बाद भारत की क्रेडिट रेटिंग को सुधारा था। वाकई अरुण जेटली जैसे नेता कम ही हुए हैं जो लंबे समय तक सत्ता में रहे लेकिन किसी भी प्रकार का दाग उनको छू नहीं पाया। जेटली के गुणों के बारे में जितना बताया जाये, उतना कम है। हमेशा ईमानदार करदाता रहे जेटली के बारे में शायद कम ही लोग जानते होंगे कि अपने बच्चों को खर्चे के लिए भी वह भुगतान चेक से ही करते थे ताकि पूरी पारदर्शिता रहे। केंद्र में मोदी सरकार-2 में उन्होंने चूँकि कोई पद नहीं लिया था इसलिए नयी सरकार बनते ही उन्होंने कैबिनेट मंत्री के रूप में खुद को मिला बंगला भी खाली कर दिया था। जबकि एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में 200 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने अपने बंगले या फ्लैट अब तक खाली नहीं किये हैं। मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली उत्तराखंड में भी एक जाना पहचाना चेहरा थे। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जेटली ने ही देहरादून में पार्टी के चुनाव घोषणपत्र, जिसे विजन डॉक्यूमेंट नाम दिया गया  था, जारी किया था। भाजपा खास तौर पर चुनाव के वक्त जेटली के जरिये सूबे के  बौद्धिक वर्ग से संवाद कायम करने की रणनीति अमल में लाती थी।जेटली की एक खास बात और थी कि भले वह कितने भी बड़े से बड़े पद पर क्यों ना रहे हों उनके घर और कार्यालय के दरवाजे हमेशा आम कार्यकर्ताओं और जनता के लिए खुले रहते थे। । देश के वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली की कहानी राजनीति के उस पहलू को दर्शाती है, जिसमें वे सियासत की बुलंदियों तक तो पहुंचे लेकिन कभी चुनावी राजनीति की बिसात से तालमेल नहीं बिठा सके। उनकी ईमानदार और साफ छवि लोगों के दिलों में घर जरूर कर चुकी थी लेकिन वे अपने चार दशक से अधिक लंबे राजनीतिक करियर में कभी कोई आम चुनाव नहीं जीत सके। ऐसी महान शख्सियत को हमारी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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