डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देवीधुरा की ख्याति भले ही विश्व में बग्वाल मेले के लिए हो, लेकिन मां बाराही के मन्दिर में रखी एक ताम्र पेटी भी अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है. आस्था के चलते जहां अभी तक कोई भी श्रद्धालु माँ की मूर्ति को खुली आँखों से नहीं देख पाया है. वहीं जिस श्रद्धालु ने कोशिश की उसकी आँखों की रोशनी चली गई. यही वजह हैं कि ताम्रपेटिका में रखी मूर्ति को नहीं देखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.
देवीधुरा में बसने वाली माँ बाराही का मंदिर 52 पीठों में से एक माना जाता है. मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां बाराही देवी की मूर्ति है, मगर पेटिका में रखी इस देवी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी ने नहीं किए हैं. हर साल भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को बागड़ जाती के क्षत्रीय वंशज द्वारा ताम्र पेटिका को मुख्य मंदिर से नंद घर में लाया जाता है, जहां आंखों में पट्टी बांध कर मां का स्नान कर श्रगार किया जाता है.
यह भी मान्यता है कि जिसने माँ की मूर्ति के दर्शन खुली आँखों से किए, मूर्ति के तेज से उसकी आँखों की रोशनी चली जाती है. वही दुनीया में अपने तरह की पहली बग्वाल परम्परा के चलते स्पीकर गोविन्द कुंजवाल भी गढ़वाल के चार धामो की तरह ही कुमाऊँ में देवीधुरा को भी एक बड़ा धाम मानते हैं.
माँ की मूर्ति की तरह देवीधुरा में दिख रही ये भीम शीला पत्थरों को जहाँ पुराने समय के बग्वाल युद्ध से जोड़कर देखा जाता है. वहीं माँ का मुख्य मंदिर भी गुफा के अंदर है.मान्यता है कि चम्याल खाम की एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर बलि बंद हो गई और बग्वाल की परम्परा शुरू हुई. इस बग्वाल में चार खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया के रणबांकुरे बिना जान की परवाह किये एक इंसान के रक्त निकलने तक युद्ध लड़ते हैं. भले ही तीन साल से बग्वाल फल-फूलो से खेली जा रही हो, लेकिन उसके वावजूद योद्धा घायल होते हैं और उनके शरीर रक्त निकलतादिखताहै.वहीं मन्दिर के पुजारी और बग्वाल के रंबकारों का कहना है कि फल फूल आसमान में पत्थर का रूप ले लेते हैं . अपने आप में देवीधुरा का प्रसिद्ध माँ बाराही का धाम भलेही अपने कई रहस्यों को छिपाये हुए हैं. आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के रंग में देवीधुरा धाम एक बार फिर सराबोर हो उठा है. ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक छलिया नृत्य और भव्य कलश यात्रा के बीच विश्व प्रसिद्ध देवीधुरा बग्वाल मेले का रविवार को विधिवत शुभारंभ हुआ. मां वाराही के जयकारों से गूंजे धाम में उत्तराखंड सरकार के मंत्री ने मेले का उद्घाटन किया. अब सबकी निगाहें 28 अगस्त को होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल पर टिकी हैं. इस दिन चारों खामों के योद्धा सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत करेंगे. विश्व प्रसिद्ध मां वाराही धाम के वार्षिक मेले का शुभारंभ करना उनके लिए सौभाग्य की बात है. उन्होंने कहा कि देवीधुरा धाम उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. उन्होंने मां वाराही धाम से अपने बचपन के जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि देवीधुरा उनके लिए विशेष आस्था और आत्मीयता का केंद्र रहा है. उन्होंने प्रदेश और देशवासियों से अधिक से अधिक संख्या में देवीधुरा पहुंचकर मां वाराही के दर्शन करने तथा मेले को शांतिपूर्ण एवं भव्य बनाने में सहयोग की अपील की. यह पाषाण युद्ध काली-कुमाऊँ के क्षत्रियों के चार खामों (घरानों) के बीच युद्ध की शक्ल में होता है. ये चार ‘खाम’ हैं – 1. चमियाल, 2. गहड़वाल, 3. लमकणियाँ और 4. लमगढ़िया. पूर्णिमा के दिन 12 बजे से लेकर 2 बजे तक मंदिर में पुरोहितों व पुजारियों द्वारा देवी की पूजा संपन्न की जाती है. मंदिर का प्रधान पुजारी मंदिर से शंखध्वनि करके बगवाल का उद्घोष कर देता है. इसके साथ ही मंदिर के पंडे-पुरोहित देवी से संबंधित पूजा के मंत्रों का जोर-जोर से उच्चारण करके वातावरण में अत्यधिक उत्तेजना भर देते हैं. शंखध्वनि कानों में पड़ते ही बगवाली देवी के भक्त अपने सामने पड़ने वाली दूसरी ओर की खामों पर पत्थरों की वर्षा आरंभ कर देते हैं. ये पत्थर सौ ग्राम से लेकर पाँच-छः सौ ग्राम तक भार के होते हैं. बगवालियों के लिए नियम है कि वे दूसरे पक्ष के किसी व्यक्ति को लक्ष्य करके पत्थर नहीं चलाएंगे और न शत्रु-मित्र किसी की पहचान रखेंगे. चोट लग जाने पर भी किसी के प्रति द्वेष भाव नहीं रखा जाता, उसे देवी की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया जाता है. देखते-देखते दोनों ओर से पत्थरों की अंधाधुंध वर्षा होने लगती है. बगवाल जब अपने चरम पर होती है, दोनों ओर से बगवाली फर्रों (ढालों) की आड़ लेकर प्रांगण के केंद्र की ओर बढ़ते हैं. जो केंद्र पर पहुँच जाता है, उसे विजयी मान लिया जाता है. दोनों पक्षों के खामों के लोग प्रतिपक्षी खाम वालों के फर्रे व लाठियाँ छीनने का प्रयास करते हैं. जिस पक्ष की लाठियाँ तथा फर्रे छीने जाते हैं उसे हारा हुआ माना जाता है. 15-20 मिनट के बगवाल के निमित्त निर्धारित समय के व्यतीत हो जाने पर मंदिर के पुजारी बगवालियों के बीच जाकर देवी का तांबे का छत्र सिर पर ओढ़े, एक हाथ से चँवर (गाय की पूंछ) हिलाते हुए बगवाल की समाप्ति का संकेत करते हैं. जनपद के विश्व प्रसिद्ध मां वाराही धाम देवीधुरा में आज रक्षा बन्धन के अवसर पर आयोजित ऐतिहासिक बग्वाल मेले में आस्था, परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस अवसर पर फल और फूलों से जमकर बग्वाल खेली गयी और लाखों लोग इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने ।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











