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बसंत पंचमी के साथ उत्तराखंड में शुरु बैठकी होली

27/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून, संस्कृति
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
बसंत पंचमी’ हिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहते हैं। यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार माघ महीने के पांचवें दिन (पंचमी) पर हर साल मनाया जाता है।उत्तराखंड में बसंत पंचमी से बैठकी होली की शुरुआत हो जाती है। मां सरस्वती के पूजन के साथ लोग पंचमी के दिन पीले कपड़े पहनते हैं और पीला खाना खाते हैं।उत्तराखंड के ज्यादातर हिस्सों में बसंत पंचमी के दिन पीले और मीठे चावल बनाएं जाते हैं और लोग इसका सेवन करते हैं।बसंत पंचमी, ज्ञान, संगीत और कला की देवी, ‘सरस्वती’ की पूजा का त्यौहार है। इस त्यौहार में बच्चों को हिंदू रीति के अनुसार उनका पहला शब्द लिखना सिखाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करने का रिवाज़ है। बसंत पंचमी सर्दियों के मौसम के अंत का प्रतीक है।माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी से ऋतुओं के राजा वसंत का आरंभ हो जाता है। यह दिन नई ऋतु के आने का सूचक है। इसीलिए इसे ऋतुराज वसंत के आने का पहला दिन माना जाता है। साथ ही यह मां सरस्वती की जयंती का दिन है।इस दिन से प्रकृति के सौंदर्य में निखार दिखने लगता है। वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और उनमें नए-नए गुलाबी रंग की कलियां और पत्ते मन को मुग्ध करते हैं। इस दिन को बुद्धि, ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा-आराधना के रूप में मनाया जाता है। पीला शुभता, समृद्धि और खुशी का प्रतीक है. हमारे देश में ऋषि मुनि पीले रंग के परिधानों का उपयोग करते रहे हैं. पीला रंग सूर्य का भी है, जो को ऊर्जा और जोश का प्रतीक हैं, बसंत आते ही ठंड कम होने लगती है, फूलों में नए रंग और पेड़ों में नई पत्तियां नजर आती हैं. कड़कड़ाती सर्दी के बाद से सूर्य की गर्माहट महसूस होने लगती है. जैसे सावन में सब हरा हरा दिखता है, वसंत पर हर जगह पीला रंग नजर आता है.पीली सरसों, पीले परिधान, पीली पतंगे, पीले मिष्ठान. पीला रंग ज्योतिष में गुरु ग्रह से जुड़ा हुआ है जो ज्ञान, विद्या,अध्यन, विद्वता, बौद्धिक उन्नति आदि  का प्रतीक है. देवी सरस्वती की कृपा से भी व्यक्ति बुद्धिमान, कला में परांगत होता है. यही कारण है कि बसंत पंचमी पर पीला रंग पहनना, पीला चीजों का सेवन, पीली वस्तुओं का दान शुभफलदायी माना गया है.  देश के अलग-अलग राज्यों में इस त्योहार को कैसे मनाया जाता है। माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, माघ मास से हमारे पारम्पारिक त्यौहारों का आगमन बसन्त के साथ शुरु हो जाता है। वसंत पंचमी का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं। वसन्त पञ्चमी के समय सरसो के पीले-पीले फूलों से आच्छादित धरती की छटा देखते ही बनती है। मान्यता है कि सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने जीव-जंतुओं और मनुष्य योनि की रचना की, लेकिन उन्हें लगा कि कुछ कमी रह गई है। इस कारण चारों ओर सन्नाटा छाया रहता है। ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे चार हाथों वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उस स्त्री के एक हाथ में वीणा और दूसरा हाथ में वर मुद्रा और बाकि दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया, जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी मिल गई। जल धारा कलकल करने लगी और हवा सरसराहट कर बहने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणा वादनी समेत कई नामों से पूजा जाता है। वो विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी हैं। ब्रह्मा ने देवी सरस्वती की उत्पत्ति बसंत पंचमी के दिन ही की थी। इसलिए हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का जन्म दिन मनाया जाता है। बसंत पंचमी के 40 दिन बाद होली का पर्व मनाया जाता है। यही वजह है कि बसंत पंचमी से होली के त्योहार की शुरुआत मानी जाती है। मांगलिक और शुभ कार्यों के लिए बसंत पंचमी का दिन काफी खास होता है।देश के लगभग हर राज्य में बसंत पंचमी का पर्व अलग-अलग तरीके से मनाते हैं। इस दिन लोग मां सरस्वती की पूजा के दौरान पीले फल, मिठाई और मीठे पीले चावल को भोग लगाते हैं। क्योंकि मां सरवती को पीला रंग बेहद प्रिय है।प्राचीन समय से ही बसंत का लोगों का मनचाहा मौसम रहा है। पहाड़ों में पैट-अपैट को लेकर खूब मान्यता रहती है. पहाड़ियों के काज-काम पैट-अपैट के अनुसार ही होते हैं. माना जाता है कि किसी भी काज-काम के लिये पैट होना जरुरी है. पैट का शाब्दिक अर्थ हिन्दी महीने की तारीख से है. काम-काज के अर्थ में पैट का मतलब शुभ दिन है. पैट-अपैट की गणना कुंडली के अनुसार पंचांग देखकर की जाती है. यह माना जाता है कि बसंत पंचमी के दिन सभी शुभ कार्य किये जा सकते हैं. यही वजह है कि पहाड़ों में आज के जनेऊ और विवाह जैसे शुभ कार्य बिना लगन के खूब किये जाते हैं.पहाड़ी कृषि प्रधान क्षेत्र हुआ करते थे. इसलिए पहाड़ी समाज में कृषि से जुड़े बड़े प्रभाव देखने को भी मिलते हैं. बंसत पंचमी के दिन कृषक परिवारों के घरों में सुबह के समय खीर बनाई जाती है. खीर बनाने से पहले सुबह-सुबह घर की लिपाई की जाती है. घर के मुख्य दरवाजे के ऊपर टीका लगता है. घर के निजी पूजा स्थल में पूजा के बाद घर के मुख्य दरवाजे के ऊपर (स्तम्भ के दोनों ओर) गोबर के साथ जौ की हरी पत्तियों को लगा दिया जाता है. बहुत से गावों में जौ की पत्तियों को बिना गोबर के भी रखा जाता है. कुछ जगहों में घर की मुख्य देली पर सरसों के पीले फूल भी डाले जाते हैं. कई जगह लोग अपने ईष्ट देवता के मंदिर में भी सरसों के पीले फूल चढ़ाये जाते हैं. जौ की हरी पत्तियां घर के प्रत्येक सदस्य के सिर अथवा कान में रखे जाते हैं और उसे आर्शीवचन दिये जाते हैं. पहली बार बच्चियों के नाक और कान भी छेदे जाते हैं. बच्चियों के नाक-कान छेदते समय उन्हें खाज़ यानी कच्चे चावल और गुड़ खिलाया जाता है. मां सरस्वती को मां शारदे, वीणा वादिनी जैसे कई नामों से जाना जाता है। मां सरस्वती का वास विद्या के साथ होता है इसलिए खास तौर पर हर एक शैक्षणिक संस्थानों में उनकी पूजा जाती हैं। उत्तराखंड कि धरती ने पूरे विश्व को हिमालय और गंगा के रूप में उपहार दिया है तो पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया है। चिपको आंदोलन के नेता गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा इसी भूमि से ताल्लुक रखते हैं। मैती आंदोलन के जरिए कल्याण सिंह रावत ने पर्यावरण बचाने का काम किया। इसीलिए उन्हें पदम श्री से नवाजा गया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण हमारे सामने बड़ी चुनौती है। एक साथ मिलकर ही इसका मुकाबला किया जा सकता है। अगली पीढ़ी को धन दौलत नहीं बल्कि एक अच्छा पर्यावरण देने की जरूरत है। उन्होंने कहा बसंत में पुराने वक्त पर बच्चे घरों से पौधे लाकर लगाते थे। पीला वस्त्र, पीला तिलक धारण करते थे, लेकिन अब समय के साथ सब कुछ बदल गया है। वृक्ष हमें जीवन देते हैं। जीव जंतुओं को संरक्षण देते हैं। हमने इन वन प्राणियों से उनके घरों को छीन लिया है। यही कारण है कि यह आबादी में आ रहे हैं। उन्होंने ऋतुराज वसंत उत्सव पर जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान है।लेखक, के व्यक्तिगत विचार हैं दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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