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बेडू’ में होते हैं कई बेहतरीन औषधीय गुण

12/04/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला:

बेडू पाको बारो मासा, ओ नरणी काफल पाको चैता मेरी छैला, ये पंक्तियां उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगीत की हैं, जो दुन‍ियाभर में उत्तराखंडियों के बीच काफी पॉपुलर है। इस गीत में उत्तराखंड के फेमस फल बेडू की विशेषता बता रहा है। स्‍वास्‍थय से भरपूर बेडू के फल की सब्‍जी भी बनाई जाती है। बेडू का फल खाने से कब्ज, तंत्रिका विकार, जिगर की परेशानियों से छुटकारा मिलता है।

बेडू का फल केवल उत्तराखंड में ही नहीं बल्कि यह पंजाब, कश्मीर, ईरान, सोमानिया, हिमाचल, नेपाल, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सुडान तथा इथियोपिया में भी पाया जाता है। दुनियाभर में इसकी 800 प्रजातियां पाई जाती हैं। हिमाचल में बेडू फागो नाम से जाना जाता है।

इसे फाल्गू, पंजाबी अंजीर या अंजीरी भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे वाइल्ड फिग और इंडियन फिग कहते हैं। यह मौरेशी वंश का पौधा है। उत्तराखण्ड में बेडू, फेरू, खेमरी, आन्ध्र प्रदेश में मनमेजदी, गुजरात मे पिपरी, हिमाचल प्रदेश में फंगरा, खासरा, फागो आदि नामो से पहचान रखने वाला यह फल कई गुणों से भरपूर और बहुमूल्य औषधीय फल है।यह  उत्तराखण्ड  के निम्न ऊँचाई से मध्यम ऊँचाई तक आज भी बड़ी मात्रा में मिल जाता है।

कई जगह इसे सब्जी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उत्तराखंड में बेडू का कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता है लेकिन बहुत पहले गांव के लोग जंगल से बेडू लाकर खाते थे।बेडू का उत्तराखंड की संस्कृति से कितना लगाव था इसका अंदाजा आप पौराणिक गीतों से भी लगा सकते हैं जिसमे एक गीत ‘बेडू पाको बारोमास’ आपने जरूर सुना होगा। गीत के माध्यम से बताया गया है कि बेडू बारामास पकने वाला फल था, यह इतना स्वादिष्ट फल है कि जो एक बार खा ले वह इसे हर बार खाना चाहेगा।हालांकि आज के समय पर बेडू का महत्व समाप्त हो रहा है।

कई जगह यह आसानी से मिल जाता है लेकिन कुछ लोग इसे खाने को तरस जाते हैं।बता दें कि विश्व में बेडु की लगभग 800 प्रजातियां पाई जाती है। इसे गुणों की बात की जाय तो यह सम्पूर्ण पौधा ही उपयोग में लाया जाता है जिसमें छाल, जड़, पत्तियां, फल तथा चोप औषधियों के गुणो से भरपूर होता है।आयुर्वेद में बेडु के फल का गुदा कब्ज, फेफड़ो के विकार तथा मूत्राशय रोग विकार के निवारण में प्रयुक्त किया जाता है।

इसके प्रयोग से तंत्रिका तंत्र विकार बिमारियों से निजात मिलती है, पारम्परिक रूप से बेडु को उदर रोग, हाइपोग्लेसीमिया, टयूमर, अल्सर, मधुमेह तथा फंगस सक्रंमण के निवारण के लिये प्रयोग किया जाता रहा है।उत्तराखंड के गांवों में बेडु की पत्तियां पशुचारे के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, बताया जाता है कि जो पशु दूध कम देता है तो उसे बेडू की पत्तियां चारे में खिलाने पर पशु दूध अधिक देती है।

उत्तराखंड में आज के समय में इसका व्यवसायिक उत्पादन किया जा सकता है जो विभिन्न खाद्य एवं फार्मास्यूटिकल उद्योग में उपयोग को देखते हुये स्वरोजगार के साथ-साथ बेहतर आर्थिकी का साधन बन सकता है। इन फलों की इकोलॉजिकल और इकॉनामिकल वेल्यू है। इनके पेड़ स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, जबकि फल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।उत्तराखंड एक अलग राज्य बनने के बाद उसकी जड़ी बूटियों को हल्ला मचाया गया लेकिन उनका व्यावसायिक उपयोग बहुत कम किया गया।

आज ऐसे कई फल हैं जो लुप्त हो गए हैं। वे पौधे जंगलों में तो खूब उगते हैं, लेकिन उनका व्यावसायिक उपयोग बहुत कम होता है। बेडू उन्हीं फलों में से एक है जो उगता तो खूब अधिक मात्रा में है लेकिन उसका उपयोग बहुत कम होता है। फल की पौष्टिक गुणवत्ता का सवाल है तो इसमें प्रोटीन 4.06 प्रतिशत, फाइबर 17.65 प्रतिशत, वसा 4.71 प्रतिशत, कॉर्बोहाइड्रेट 20.78 प्रतिशत, सोडियम 0.75 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, कैल्शियम 105.4 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, पोटेशियम 1.58 मिग्रा प्रति सौ ग्राम, फॉस्फोरस 1.88 मिग्रा प्रति सौ ग्राम और सर्वाधिक ऑर्गेनिक मैटर 95.90 प्रतिशत तक पाए जाते हैं। बेडु के पके हुए फल में 45.2 प्रतिशत जूस, 80.5 प्रतिशत नमी, 12.1 प्रतिशत घुलनशील तत्व व लगभग छह प्रतिशत शुगर पाया जाता है।

उत्तराखंड के अलावा कई राज्यों व देशों में पाया जाने वाला यह फल सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है। यह केवल एक फल ही नहीं है बल्कि एक औषधि है। इसका फल, जड़, पत्ते, छाल, दूध सब उपयोग में लाया जाता है।एक परिपक्व बेडु के पेड़ से एक मौसम में लगभग 25 किग्रा तक फल प्राप्त कर सकते है तथा बेडु की पत्तियां पशुचारे के
साथ.साथ कृषि वानिकी अर्न्तगत बेहतर पेड़ माना जाता है।

राज्य के परिप्रेक्ष्य में इसका व्यवसायिक उत्पादन किया जा सकता है जो विभिन्न खाद्य एवं फार्मास्यूटिकल उद्योग में उपयोग को देखते हुये स्वरोजगार के साथ.साथ बेहतर आर्थिकी का साधन बन सकता है। इस फल को नजरअंदाज करने के बजाए इसको व्यावसायिक उपयोग में लाना चाहिए। सरकार द्वारा कृषि भूमि को पट्टे पर देने की नीति तैयार करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है। किसानों द्वारा तीस साल के लिए भूमि लीज पर देने के एवज में किसानो को भूमि का किराया दिया जाएगा। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में, खेती, कृषि, बागवानी, जड़ी- बूटियों, ऑफ-सीजन सब्जियों, दूध उत्पादन, चाय बागान, फल संकरण और सौर ऊर्जा के लिए भूमि पट्टे की
बाधाओं को नीति से हटा दिया गया है।

अब कोई भी संस्था, कंपनी, फर्म या एनजीओ 30 साल की लीज पर अधिकतम 30 एकड़ कृषि भूमि को पट्टे पर ले सकती है। विशेष परिस्थितियों में अधिक भूमि लेने का प्रावधान भी रखा गया है। यदि खेत के आसपास सरकारी जमीन है, तो जिला मजिस्ट्रेट की अनुमति से शुल्क का भुगतान करके इसे पट्टे पर लिया जा सकता है। राज्य सरकार ने भूमि के चकबंदी में कठिनाइयों के मद्देनजर यह नीति बनाई है। उत्तराखंड देश में पहला ऐसा राज्य हो गया है जिसने खेती की जमीन को लीज पर देने के लिए पॉलिसी बनाई है। लीज पर जमीन देने के बदले संबंधित काश्तकारों को जमीन का किराया देना होगा।

किसान विजय जड़धारी कहते हैं कि यह कदम पहाड़ के हित में नहीं है। सरकार लोगों को खेती के लिए प्रशिक्षित नहीं कर सकी। जब वे पलायन कर रहे थे और उन्हें इकट्ठा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जड़धारी पूछते हैं कि स्टार्टअप योजना, कौशल प्रशिक्षण केंद्र पर दी जा रही ट्रेनिंग का क्या हुआ। आप गांव के लोगों को सोलर पैनल लगाने की ट्रेनिंग देते। उन्हें एकजुट करके चाय बगान लगवाते।

जड़धारी चंबा के आगे कौठिया क्षेत्र में बने बंदरबाड़े का उदाहरण देते हैं। जहां बंदरों को नसबंदी करायी जानी थी। लेकिन वहां सिर्फ इमारत खड़ी नजर आती है। पूरा बंदरबाड़ा सूना है। ऐसे ही खेती को नुकसान पहुंचा रहे कुछ जगहों पर जंगली सूअर को मारने के आदेश जारी किए। लेकिन क्या लोग इस काम को करेंगे। ये लोगों के बस की बात कृषि वानिकी बेडु इस बंजर को आबाद करने की ताकत यहां के स्थानीय आदमी में है। इसलिए मौजूदा हालात में ये मॉडल जरूरी है।

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