उत्तराखंड समाचार डाट काम
भाजपा से निष्कासित चर्चित विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन और झबरेड़ा से भाजपा विधायक देशराज कर्णवाल के बीच एक और सुलह समझौता हुआ है। यह समझौता कितने दिनों टिक पाएगा, यह कहना मुश्किल है। क्यों लतागार बच्चों की तरह लड़ते-झगड़ते रहने वाले ये दोनों विधायकों के बीच यह सार्वजनिक तौर पर कम से कम तीसरा समझौता है। हर बार भाजपा प्रदेश हाईकमान के निर्देश पर समझौता होता है, फिर एक दूसरे के खिलाफ गालियां शुरू हो जाती हैं और साथ ही मुकदमेबाजी भी शुरू हो जाती है।
इस बार भी मुख्यमंत्री के निर्देश पर मुख्यमंत्री के दो ओएसडी और एक मीडिया समन्वयक के समक्ष दोनों विधायकों के बीच समझौता कराया गया है। यहां पर इस बात पर जोर दिया गया है कि समझौता कराया गया है, दोनों ने मन से समझौता करने की पहल नहीं की है। पिछली बार हुए समझौते भी इसी तरह कराए गए, लेकिन टिक नहीं पाए। इस समझौते पर भी नेतृत्व का दबाव है। क्यों के सत्तारूढ़ पार्टी के एक ही जिले के दो विधायकों के बीच बच्चों की तरह बार-बार हो रही लड़ाई का प्रभाव पार्टी पर पड़े बिना नहीं रह सकता है। इससे पार्टी की न केवल उत्तराखंड के अंदर किरकिरी हो रही है, बल्कि हाई कमान के सामने भी पार्टी को जवाब देते नहीं बन रहा है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री के स्टाफ ने दोनों को बैठाकर समझौता करने के लिए तैयार किया है।
दोनों ने मन से समझौता मान लिया होगा, कम से कम कुंवर प्रणव सिंह के मामले में ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हरिद्वार में एक होटल में दोनों विधायक गले मिलकर मनमुटाव दूर होने की बात कर रहे थे, लेकिन उनकी बाडी लेंग्वेज जो प्रदर्शित कर रही थी, वह इसकी गवाही नहीं दे रही थी। प्रणव सिंह तो औपचारिकता के लिए ही वहां आए हुए लग रहे थे। ज्यों ही प्रेस वार्ता खत्म हुई, दोनों के गले मिलने की औपचारिकता पूरी हुई, वह ज्यादा देर वहां रुके बिना चल दिए। हालांकि वह यह भी कहते हुए सुने गए कि उन पर किसी का दबाव नहीं है। लेकिन यह कैसे माना जा सकता है बिना दबाव के वह न चाहकर भी समझौते के लिए मीडिया के सामने आए।
अपेक्षा की जाती है कि दोनों एक दूसरे के खिलाफ दायर मुकदमों को वापस लेंगे। यदि ऐसा हुआ तो इसे सुलह की पहल माना जा सकता है। तभी माना जा सकता है कि दोनों आपस में एक दूसरे को कोसेंगे नहीं। इस समझौते की पहल को चुनाव से पहले प्रणव सिंह चैंपियन की घर वापसी की तैयारी के तौर पर भी देखा जा रहा है। संभव है इस दबाव में इस बार समझौता लागू हो जाए।











