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बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुटे छात्र-छात्राएं

18/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड कक्षा 10वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी करने
बोर्ड कक्षा दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के नज़दीक आते ही पूरा देश मानो परीक्षा-बुखार की चपेट में आ जाता है। वर्षों से फरवरी और मार्च भय, चिंता और भावनात्मक तनाव के चरम महीने बन गए हैं—और यह तनाव केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों और पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
हर कोई जिंडी को लेकर चिंतित है, जो इस वर्ष कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षा दे रहा है। उसकी माँ, बड़ा भाई, दादी, ताऊजी, ताईजी, उनके बच्चे और यहाँ तक कि उनके जीवनसाथी भी पूरी तरह सतर्क हैं। यह सामूहिक चिंता भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था की उस निकटता को दर्शाती है, जहाँ किसी एक व्यक्ति की शैक्षणिक यात्रा पूरे परिवार की साझा ज़िम्मेदारी बन जाती है। ज़िंदी के आसपास के लोग लगातार उसकी पढ़ाई की समय-सारिणी, पुनरावृत्ति की योजना और यह कि उसने परीक्षा के लिए कितना याद कर लिया है—इन्हीं विषयों पर चर्चा करते रहते हैं।
यह चिंता केवल कमजोर छात्रों तक सीमित नहीं है। मेधावी और बुद्धिमान छात्र—और उनके माता-पिता—भी इस बुखार से अछूते नहीं हैं। “परीक्षा वायरस” सर्वव्यापी है। निकट परिवार और रिश्तेदारों से आगे बढ़कर पड़ोसी तक इससे संक्रमित हो जाते हैं। कई वयस्कों के लिए यह समय उनकी अपनी परीक्षा-संबंधी पीड़ादायक स्मृतियों को फिर से जीवित कर देता है। जाने-अनजाने हममें से अनेक लोग इस अधूरे तनाव को आज भी ढोते रहते हैं, जो हमारी मानसिक सेहत पर असर डालता है और यह भी तय करता है कि आज हम बच्चों पर पड़ने वाले ऐसे दबावों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।
भारत में शिक्षा नीति में कई सुधार हुए हैं, जिनमें नवीनतम सुधार व्यापक और महत्वाकांक्षी है। फिर भी, इन सुधारों के बावजूद शिक्षा व्यवस्था अब भी मुख्यतः परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। दशकों से स्कूली शिक्षा परीक्षाओं, रैंकिंग और सफलता की एक संकीर्ण परिभाषा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यह व्यवस्था रटंत विद्या और पाठ्यपुस्तकों व उत्तरों की यांत्रिक याददाश्त को बढ़ावा देती है, जबकि आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और समग्र विकास की उपेक्षा करती है।
हालाँकि नई शिक्षा नीति व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास पर ज़ोर देती है, लेकिन ये विचार अभी तक विद्यालयी पाठ्यक्रमों और व्यावहारिक प्रशिक्षण ढाँचों में ठोस रूप नहीं ले पाए हैं। नृत्य, नाटक, रंगमंच, संगीत, कला और खेल जैसी गतिविधियाँ आज भी गैर-शैक्षणिक या सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के रूप में देखी जाती हैं—जिन्हें मानसिक और बौद्धिक विकास में सार्थक योगदान देने के बजाय केवल मनोरंजन माना जाता है। दुर्भाग्य से, नई पीढ़ी के माता-पिता भी तेजी से शिक्षा की इसी सीमित समझ को अपनाते जा रहे हैं।
कुछ दशक पहले ट्यूशन कक्षाएँ मुख्यतः कमजोर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के लिए होती थीं। आज ट्यूशन और कोचिंग सामान्य चलन बन चुकी हैं, जिनका उद्देश्य केवल अधिकतम अंक और ग्रेड हासिल करना है। छात्रों को एक के बाद एक परीक्षाओं का सामना करना पड़ता हैपहले स्कूल में और फिर प्रतिष्ठित संस्थानों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के लिए। राहत की कोई गुंजाइश नहीं रहती। जो छुट्टियाँ ट्रेकिंग, कैंपिंग, साइक्लिंग, यात्रा या ग्रामीण इलाकों की खोज में बिताई जा सकती थीं, वे अब कोचिंग कक्षाओं और पुनरावृत्ति कार्यक्रमों में खप जाती हैं। प्रतिस्पर्धी दबावों के कारण बचपन और किशोरावस्था धीरे-धीरे केवल तैयारी का समय बनकर रह जाते हैं।
नई शिक्षा नीति के आलोक में सरकार को गुरुकुल आधारित शिक्षा और होमस्कूलिंग जैसे वैकल्पिक शिक्षण मॉडलों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि सत्रह वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका कोई भी व्यक्ति किसी भी राज्य या केंद्रीय बोर्ड के अंतर्गत सीधे कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में सम्मिलित हो सके। छात्रों को नृत्य, नाटक, रंगमंच, संगीत, कला, खेल और व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे विषय चुनने का विकल्प मिलना चाहिए, जिनका समुचित मूल्यांकन और ग्रेडिंग हो, ताकि वे सार्थक करियर मार्ग अपना सके
यह अत्यंत चिंताजनक है कि ज्ञान और कौशल प्रदान करनेलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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