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सीमांत के लोगों को नेपाली नेटवर्क का सहारा

16/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जहां दुनिया आज डिजिटल दौर में है, ऐसा लगता है कि हम आदि युग में चल रहे हैं. गांव, जिला मुख्यालय से केवल 18 किलोमीटर की ही दूरी पर है. बड़ी आबादी है. मटकोड़ा, बसेड़ा, सिरकुच, जाखपंत, मजिरकांडा, च्यौड़ी, जरकानी, ढोलाखोल, कटियानी के लोगों को मोबाइल सिग्नल नहीं होने से सबसे अधिक समस्या होती है.  पड़ोसी देश नेपाल के साथ बॉर्डर शेयर करने वाले उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के कई गांवों में भारत के नहीं बल्कि नेपाल की संचार कंपनियों के सिग्नल आ रहे हैं. जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से केवल 18 से 20 किलोमीटर दूरी पर कुछ गांवों में जहां पर भारतीय मोबाइल सेवा नहीं चलती है, भारतीय मोबाइल कंपनियों के सिग्नल नहीं आने से उपभोक्ता परेशान हो रहे हैं. सीमांत पिथौरागढ़ जिले का ब्लाक मूनाकोट नेपाल सीमा से लगा हुआ है. वड्डा, बड़ालू सहित झूलाघाट के आसपास के गांवों से नेपाल का इलाका सामने नजर आता है. भारतीय क्षेत्र में जिन कंपनियों के टावर हैं उनकी रेंज कम होने से अधिकांश गांवों में कमजोर सिग्नल आते हैं. इसके उलट सामने नेपाल में लगे टावरों के सिग्नल साफ आते हैं. इसके चलते लोग न तो ठीक से बातचीत कर पाते हैं और न ही इंटरनेट का उपयोग कर पाते हैं. इंटरनेट नहीं आने से स्टूडेंट ऑनलाइन पढ़ाई भी नहीं कर पाते हैं. गैस बुकिंग भी नहीं हो पाती है. ग्रामीणों का कहना है कि वीडियो कॉलिंग आज भी उनके लिए सपना ही है  जिले के नेपाल से लगे कनालीछीना और धारचूला विकासखंडों की हजारों की आबादी आज भी बेहतर संचार सुविधा से वंचित है. धारचूला से पंचेश्वर तक 100 किलोमीटर के क्षेत्र में में आज भी कई गांव हैं, जहां भारतीय मोबाइल कंपनियों के बजाय नेपाल की संचार कंपनियों के सिग्नल आते हैं. ज्यादातर हिस्सों में बीएसएनएल सहित निजी कंपनियां अब टावर लगा चुकी हैं. फिर भी लोगों को लाभ नहीं मिल रहा है. अब देखना होगा कि 5जी के इस युग में इस क्षेत्र के लोग कब भारतीय नेटवर्क का प्रयोग कर पाते हैं. आम तौर पर हर देश अपनी सीमा पर जैमर लगाकर दूसरे देश के मोबाइल सिग्नल को जाम कर देता है. विदेशी मोबाइल सिग्नल सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा जोखिम होता है. इससे गोपनीयता के उल्लंघन का खतरा रहता है. क्योंकि इससे पड़ोसी देश दूसरे देश के महत्वपूर्ण लोगों की लोकेशन और एक्टिविटी पर नजर रख सकता है. अगर आपका फोन अपने देश की बजाय दूसरे देश के मोबाइल नेटवर्क से जुड़ जाता है तो डिवाइस की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है. अपराधियों और आतंकवादियों को देश विरोधी कृत्य करने में विदेशी मोबाइल नेटवर्क सहायक हो सकता है. लिपुलेख तक सड़क पहुंचाकर भारत ने भले ही खुद को सामरिक नजरिए से मजबूत कर लिया हो, लेकिन चीन और नेपाल सीमा से सटे इन इलाकों में संचार सेवाओं का नामोनिशान तक नहीं है. जबकि बॉर्डर इलाकों में संचार के मामले में पड़ोसी मुल्क नेपाल भारत से आगे है. इसी का फायदा उठाकर नेपाली टेलीकॉम कंपनियां भारत में घुसपैठ कर रही हैं.जानकर हैरानी होगी कि इन इलाकों में अवैध तरीके से नेपाली सिम इस्तेमाल किए जा रहे हैं. लोग न चाहते हुए भी यहां नेपाली कंपनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल कराने को मजबूर हैं. सीमांत इलाकों में नेपाली संचार पर भारत की निर्भरता सुरक्षा के लिहाज से कभी भी बड़ा खतरा पैदा कर सकती है. नेपाली संचार सेवा भले ही बॉर्डर पर लोगों को कुछ राहत पहुंचा रही हो, लेकिन कड़वी हकीकत यह भी है कि इसके जरिए भारतीय सुरक्षा में आसानी से सेंध लगायी जा सकती है, क्योंकि नेपाल में जो भी मोबाइल कंपनियां काम कर रही हैं उनका संचालन चीन से हो रहा है. पिथौरागढ़ के डीएम ने बताया कि-बीएसएनएल को इस संबंध में निर्देशित किया गया है. जिले के जिन इलाकों में संचार सेवा नहीं है, वहां पर जल्दी बीएसएनएल ने टावर लगाने की बात कही है. जहां भी टावर लगे हैं, संचार कंपनियों को उनके संचालन के निर्देश दिए गए हैं. नेपाल सीमा से लगे गांवों में बीएसएनएल के साथ ही जियो से भी बात चल रही है. जल्दी इन इलाकों में संचार सेवा सुचारू होगी. केंद्र सरकार ने अपने बजट 5जी सेवा शुरू करने की बात कही है। यह शिक्षा, संचार के क्षेत्र में काफी कारगर साबित हो सकती है लेकिन पिथौरागढ़ जिले के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में आज भी लोगों को 2जी नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं है। यहां के लोग आज भी नेपाल के सिम का उपयोग कर रहे हैं। पिछले वर्षों में बीएसएनएल के अधिकारियों, प्रशासन और क्षेत्रीय सांसद के सामने कई बार मांग रखी जा चुकी है, लेकिन टावर को चालू करने की दिशा में कोई पहल नहीं हुईलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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