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उत्तराखंड में दरकते पहाड़: हे सरकारअनियोजित विकास से आ रही आपदा

18/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
आपदा के लिए शहर का अनियोजित विकास भी प्रमुख कारण है। राज्य के समुचित विकास के लिए मास्टर प्लान का न होना या इसका ठीक से क्रियान्वयन न होना विपदा को जन्म देता है। उत्तराखंड निर्माण के 25साल पर हैं लेकिन राज्य की दिशा और दशा सही मायने में अब तक तय नहीं हो पाई है। आलम यह है कि आज भी राज्य के कई क्षेत्रों में सुनियोजित विकास के लिए मास्टर प्लान है ही नहीं। जहां है भी तो वह अप्रासंगिक हो चुका है। इसमें बदलाव की जरूरत है। इस वक्त नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर सहित सिर्फ 18 नगरों में ही मास्टर प्लान लागू है। राज्य के समुचित विकास, मॉडल प्रदेश, पर्यटन प्रदेश, ऊर्जा प्रदेश, शिक्षा हब और जड़ी बूटी प्रदेश बनाने के दावे हर सरकार करती है लेकिन इसे परवान चढ़ाने की ईमानदार कोशिश नहीं हो पाई है। मास्टर प्लान लागू न होने और भवन निर्माण के नियमों में कई विसंगतियां होने से पूरे पहाड़ में अनियोजित और मनमाने तरीकों से भवन निर्माण हो रहे हैं। व्यावहारिक निर्माण नियमावली अभाव साफ झलक रहा है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय वर्ष 2018 में देहरादून और मसूरी के लिए प्रस्तावित मास्टर प्लान को रद्द कर चुका है। इस मास्टर प्लान की अधिसूचना 2008 और 2013 में जारी की गई थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि नया मास्टर प्लान तैयार करते समय दून में चाय बागान के तहत निर्धारित जमीन का किसी अन्य उपयोग में परिवर्तन नहीं किया जाएगा। मास्टर प्लान तैयार करने के लिए चीफ टाउन प्लानर उत्तराखंड ने आवास विभाग के अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए हैं। मास्टर प्लान तैयार होने के बाद उन्हें जन सुनवाई के लिए रखा जाएगा। इसके बाद डीडीए बोर्ड मंजूरी देगा। इसके लिए 18 महीने का लक्ष्य रखा गया है। आरईपीएल संस्था इससे पहले स्मार्ट सिटी, ऑनलाइन नक्शा प्रणाली, प्रधानमंत्री आवास योजना, जल आपूर्ति प्रणाली जैसी योजनाओं पर काम कर रही है।  63 नगरों में भी लागू होना है मास्टर प्लानअल्मोड़ा, रानीखेत, भतरौंजखान, भिकियासैंण, द्वाराहाट, कपकोट, धारचूला, डीडीहाट, पिथौरागढ़, बेरीनाग, गंगोलीहाट, टनकपुर, बनबसा, मंगलौर, भगवानपुर, झबरेड़ा, लंढौरा, रामनगर, कालाढूंगी, लालकुआं, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, खटीमा, जसपुर, सितारगंज, दिनेशपुर, गुलरभोज, केलाखेड़ा, महुआडाबरा, नानकमत्ता, शक्तिगढ़, सुल्तानपुर पट्टी, कोटद्वार, दुगड्डा, श्रीनगर, सतपुली, चमोली, जोशीमठ, पीपलकोटी, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, पोखरी, थराली, रुद्रप्रयाग, अगस्त्यमुनि, तलवाड़ी, ऊखीमठ, टिहरी, नरेंद्र नगर, चंबा, देवप्रयाग, चमियाला, गजा, कीर्तिनगर, घनसाली, लंबगांव, बड़कोट, चिन्यालीसौंड़, गंगोत्री, पुरोला, उत्तरकाशी, नौगांव सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि दैवीय आपदा के लिए अनियोजित या अनियंत्रित विकास जिम्मेदार है। आपदा को देखते हुए उससे बचाव और जान-माल का नुकसान कम करने को नीति नियोजन का हिस्सा बनाया गया है। राज्य का तकरीबन पूरा भू-भाग भूकंपीय जोन में होने की वजह सरकारी और गैर सरकारी भवनों को आपदारोधी बनाना अनिवार्य किया जा चुका है। प्रदेश में अनियोजित विकास बहस का मुद्दा बनता रहा है। पर्यावरणविद इस मुद्दे को शिद्दत से उठाते रहे हैं। लंबे अरसे से यह मांग की जा रही है कि अनियोजित विकास को रोकने के लिए नीति तय की जानी चाहिए। इससे आपदाओं को भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। खासतौर पर भूस्खलन जैसी घटनाओं को इस तरह से रोका जा सकेगा। सरकार आपदाओं के लिए अनियोजित विकास को वजह नहीं मानती।सरकार की नीति आपदा के प्रति संवेदनशील उत्तराखंड में नुकसान को कम करने की है। इसे ध्यान में रखकर ही आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के अंतर्गत आपदा प्रबंधन और न्यूनीकरण केंद्र स्थापित किया गया है। मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव का कहना है कि आपदा से बचाव के लिए तंत्र को विकसित किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि उत्तराखंड भूकंप के प्रति अति संवेदनशील जोन-चार और जोन-पांच में है। भूकंप से जान-माल की बड़े पैमाने पर क्षति के अंदेशे को देखते हुए प्रदेश में सरकारी और निजी भवनों को भूकंपरोधी बनाने का आदेश लागू है। विभिन्न विकास प्राधिकरणों के माध्यम से इसे अमल में लाया जा रहा है। सड़कें बनाने के लिए अब ब्लास्टिंग नहीं होती। चट्टानों की कटिंग की जा रही है। लेकिन पिछले दशक में आई आपदाओं और आसन्न भविष्य के आपदा जोखिम को याद करने से पता चलता है कि अनियोजित विकास के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान की तुलना में अल्पकालिक आर्थिक लाभ कम हैं।मजबूत पर्यावरण नीतियों के समर्थन से पर्यावरण और भूमि उपयोग योजना आगे बढ़ने का एक संभावित तरीका है।लेखक के अपने विचार हैंलेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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