डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में कैबिनेट विस्तार पिछली सरकार की तरह चुनावी साल से ठीक पहले कर भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि कांग्रेस की तर्ज पर भाजपा को भी येन केन प्रकारेण चुनाव को ही प्राथमिकता देते हुये निर्णय लेने हैं। चार वर्ष तक पांच पद खाली रखे जाना कहीं न कहीं प्रश्न अवश्य खड़े करता है। बहरहाल तमाम अटकलों के बाद कल उत्तराखंड में कैबिनेट विस्तार हुआ और एक बार फिर कुछ चौंकाने वाला परिणाम सामने आया। संभवतः इसके पीछे युवाओं को आगे करने, जातीय समीकरणों को साधने और यह संदेश देने की कोशिश भी रही कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन जैसा कुछ नहीं होगा। सीधा और स्पष्ट संदेश कि सभी मिशन 2027 के लिए जुट जाओ।
लेकिन साथ ही एक गलत संदेश कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का संकल्प लेकर सत्ता में आई भाजपा में योग्यता और अनुभव के मामले में पहले भी और आज भी कांग्रेस के डीएनए वाले माननीयों का ही बोलबाला है। समीकरणों के संतुलन के चक्कर में तमाम वे सीनियर और पार्टी के लिए तथाकथित 75+ की उम्र वाले बुजुर्ग एक बार फिर हाशिये पर आ गये लगते हैं। संभव है 2027 में इन धरतीपकड़ जनादेश पर लगातार खरे उतरकर खुद को साबित कर चुके विधायकों के टिकट काटने के लिये पर्याप्त कारण तैयार किये जा रहे हों। यह बात इसलिए कहना आवश्यक समझता हूं कि इनकी विधानसभाओं के बहुत से महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो पा रहे या फिर यह भी कह सकते हैं कि जानबूझकर नहीं किये जा रहे ताकि ग्राउंड पर उनको कमजोर साबित किया जा सके। अपने ही सिटिंग विधायकों के समानांतर कांग्रेस की शैली में यहां भी हर विधानसभा में आज एक समानांतर गुट कार्य कर रहा।
प्रचंड बहुमत के बावजूद, वर्ष भर अनेकानेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बावजूद आज मूल कैडर के नेता और कार्यकर्ता चाहकर भी कुछ कह नहीं पा रहे।
यह भी कटुसत्य है कि खुद की सीट हार जाने वाले विधायकगण भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष बना दिये गये जैसा कि अपने उत्तराखंड में भी हुआ। खुद विगत दिनों बेहद सुर्खियों में रहे उत्तराखंड प्रभारी साहब दिल्ली में अपना ही चुनाव हार गये।जनवरी 2007 में स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए इसका आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के मुद्दों को लेकर राज्य की जनता आए दिन सड़कों पर रहती है। पहाड़ी राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से उत्तराखंड में योजनाओं को लागू करने में कई तरह की समस्याएं भी आती हैं।
लेकिन जब भी सरकार की इच्छा शक्ति हुई तो योजना ने परवान चढ़ी, लेकिन जब भी राज्य सरकार वोटबैंक और अपने राजनीतिक लाभ के लिए विकास कार्यों को टालती रही तो इसका नुकसान भी जनता को उठाना पड़ा है। आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
आप सभी की योग्यता का लाभ अवश्य
लिया जायेगा।?देखते हैं आगे क्या विकास होता है या नहीं।
*लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*












