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शराब माफिया का शिकार बने थे निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल

21/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जब उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र से शुरू हुआ नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन एक छोटे से कस्बे बसभीड़ा से शुरू होकर सभी पर्वतीय जिलों में फैल चुका था। आंदोलन की ताप से झुलसी उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार को इन पर्वतीय क्षेत्रों में मदिरा निषेध का फैसला लेना पड़ा था। 1988 आते.आते आंदोलन ठंडा पड़ा तो शराब लॉबी की सक्रियता बढ़ी। उत्तर प्रदेश सरकार ने पुनः इन इलाकों में शराब के ठेके शुरू करवा डाले। मुरादाबाद के शराब कारोबारी कुलवंत चड्ढ़ा की उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार में तूती बोला करती थी। उमेश डोभाल ने पौड़ी जिले में अवैध शराब के फल.फूल रहे कारोबार की बाबत फिर से कलम उठा ली। उनकी खबरों का सीधा असर स्थानीय शराब व्यवसायी मनमोहन सिंह नेगी के काले कारोबार पर पड़ा। नतीजा रहा डोभाल की 25 मार्च, 1988 के दिन रहस्यमय गुमशुदगी।शुरुआती दौर में स्थानीय पुलिस ने डोभाल के परिजनों की शिकायत पर कोई संज्ञान नहीं लिया। बाद में जब पत्रकार संगठनों ने आवाज उठाई तो पहले सीआईडी और बाद में सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी गई। सीबीआई ने मनमोहन नेगी समेत तेरह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, लेकिन कोर्ट से सभी 1994 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए। उमेश का पता केंद्र की शीर्ष जांच एजेंसी भी न लगा सकी। 17 फरवरी 1952 को उत्तराखंड के पौड़ी जिले में जन्मे उमेश डोभाल को एक निर्भीक पत्रकार के रूप में याद किया जाता है। एक पत्रकार होने के अलावा वे अच्छे कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। पहाड़ में बढ़ रहे अवैध शराब के प्रचलन के खिलाफ चल रहे तमाम आन्दोलनों में उनकी भागीदारी रहती थी, जिसके चलते वे इस धंधे में लगे माफिया की नज़रों में काँटा बन कर खटने लगे थे।यह कुमाऊं क्षेत्र से शुरू हुए नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के बाद का समय था, जब शराब पर नकेल कसने की मांग बसभीड़ा नाम की एक छोटी सी बसासत से तत्कालीन उत्तर प्रदेश के पहाडी इलाकों में आग की तरह फ़ैल चुकी थी। विवश हो कर सरकार को पर्वतीय जिलों में शराब पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा था। 1987-88 के आसपास शराब माफिया की सक्रियता और दबाब के चलते सरकार को शराब के ठेके फिर से करवाने पड़े। इस फैसले से आहत उमेश डोभाल ने पौड़ी जिले में अवैध शराब के कारोबार को लेकर धारदार लेख लिखना शुरू किया। इस कारण स्थानीय शराब व्यवसायी के कारोबार पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ने लगा। 25 मार्च 1988 को शराब माफिया के लोगों ने उनकी नृशंस ह्त्या कर डाली। इस घटना से समूचा उत्तराखंड बुरी तरह दहल गया था। जिसके विरोध में राज्य भर के पत्रकार एकजुट हुए। 1980 के दशक में चले नशा नहीं.रोजगार दो आंदोलन का भी प्रमुख स्तम्भ रहे। पत्रकारिता को हर तरह के माफिया राज के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए भी जाना जाता है।1989 में जब पौड़ी के पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई और शराब माफिया के खौफ के चलते कोई आवाज़ नहीं उठा पा रहा था, तब कुमायूं से पौड़ी पहुंचे और चंद लोगों के साथ जुलूस निकाला। इसके बाद पहाड़ से लेकर मैदान तक बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ और सरकार को पत्रकार हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी थी।पच्चीस मार्च का दिन उत्तराखण्ड के पत्रकारों को हमेशा याद रखते हुए, इस दिन विशेष रूप से सतर्कता बरतनी चाहिए। यूं तो जैसे हालात इस समय विश्वभर के हैं, पत्रकारों पर हर क्षण जान का खतरा बना रहता है। मैं बात उन पत्रकारों की कर रहा हूं जो खुद को सत्ता प्रतिष्ठानों, पूंजीपतियों और नाना प्रकार के माफियाओं का चारण.भाट बनाने से बचे हुए हैं। 25 मार्च, 1988 के दिन दैनिक अमर उजाला के पत्रकार उमेश डोभाल शराब माफियाओं के षड्यंत्र का शिकार हो गए थे। साप्ताहिक बिजनौर टाइम्स से अपनी पत्रकारिता यात्रा शुरू करने वाले उमेश डोभाल उन दिनों लगातार पहाड़ में परोसी जा रही शराब संस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। अड़तीस वर्षीय उमेश बिजनौर टाइम्स के बाद पौड़ी टाइम्स साप्ताहिक से जुड़े। उनकी धारदार कलम शराब संस्कृति के खिलाफ आग उगलती थी। यह वह दौर था, जनता के बीच मुक्ति और अधिकारों की अलख जगाने वाले उमेश डोभाल को आज भी उनके विचारों और पक्षधरता के लिए बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है। उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में उमेश डोभाल सम्मान की स्थापना की गयी। जिसमें पुरस्कार के तौर पर हर वर्ष एक युवा पत्रकार को सम्मानित किया जाता है।लोकतंत्र पत्रकारिता से ही जिंदा है, लेकिन सच को कहने और लिखने का साहस कम ही लोगों में होता है। पत्रकारिता से ही मानवता का संरक्षण होता है और उमेश डोभाल ने अपना जीवन न्यौछावर कर पत्रकारिता के जो मानदंड स्थापित किए उन पर युवा पीढ़ी को चलना चाहिए। सद्चरित्रता ही चिरंजीवी रहती है, जबकि अनीतिपूर्वक धन कमाने वालों का पतन हो जाता है। उमेश डोभाल को पत्रकारिता का आदर्श बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर पत्रकारिता के धर्म का निर्वाह किया। आज देश को उमेश डोभाल जैसे पत्रकारों की आवश्यकता है।’ चौथे खंबे पर खड़ा होने का दंभ नहीं होना चाहिए। शेष तीन खंभों की तरह यह लोकतंत्र का चौथा खंभा भी समाज पर खड़ा है। जन को आधार बनाकर खड़ा है। संपादकों या मालिकों के दबाव में न आने की बात भी इसमें शामिल है। सरकार, संपादक, मालिक या किसी अन्य के कहने पर किसी के बारे में कुछ भी लिखने वाला पत्रकार कहलाने लायक नहीं हो सकता है। आज पत्रकारिता ने संस्थागत स्वरूप ले लिया है लेकिन कोई भी संस्था तभी तक रहती है जब तक उसके मूल्यों में गिरावट नहीं आती है। उम्मीद है उत्तराखंड में पत्रकारिता की मशाल लेकर चलने वाले इसे याद रखेंगे।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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