डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है. चारधाम के अलावा, हेमकुंड साहिब यात्रा, हरिद्वार-ऋषिकेश, नैनीताल, मसूरी और दूसरे पर्यटन स्थलों तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं. लेकिन पर्यटकों की बढ़ती आमद के साथ एक दूसरा आंकड़ा भी लगातार चिंता बढ़ा रहा है. ये आंकड़ा पहाड़ों में बढ़ते कचरे का है.पहाड़ों में एक प्लास्टिक की बोतल या पैकेट को नीचे लाकर निस्तारित करना मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. हरिद्वार जैसे धार्मिक शहरों में कुछ ही दिनों में हजारों टन कचरा जमा हो जाता है. यानी पर्यटन जिस रफ्तार से उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को गति दे रहा है, उसी के साथ उसका पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ रहा है. सितंबर 2026 में केंद्र की ओर से उत्तराखंड के ठोस कचरा में भी चारधाम और पर्यटन क्षेत्रों के लिए विशेष ठोस प्रबंधन योजना की जरूरत पर जोर दिया गया. इससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि पहाड़ों से लेकर मैदान के पर्यटक स्थलों में कूड़ा कितनी बड़ी समस्या बनता जा रहा है. चारों धाम नगर पंचायतों आंकड़ों के मुताबिक, इस साल (2026) यात्रा शुरू होने से 27 सितंबर तक केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री से कुल मिलाकर करीब 798 टन कचरा एकत्र किया गया. इसमें अकेले बदरीनाथ में 393 टन, केदारनाथ धाम क्षेत्र में 32 टन और केदारनाथ पैदल मार्ग पर करीब 270 टन ठोस कचरा शामिल है. गंगोत्री में 98 टन कचरा और यमुनोत्री यात्रा क्षेत्र में 4.85 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किए जाने का आंकड़ा सामने आया है. इन आंकड़ों में सबसे बड़ा सवाल केवल ये नहीं है कि कितना कचरा जमा हुआ, बल्कि ये भी है कि इतनी ऊंचाई वाले संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों से इस कचरे को नीचे लाकर अलग-अलग करना, उसका परिवहन करना और फिर वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना कितना कठिन है. चारधाम क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित हैं. कई स्थानों पर यात्रा सीमित महीनों में होती है, इसलिए थोड़े समय में पैदा होने वाला भारी कचरा स्थानीय व्यवस्था पर अचानक बड़ा दबाव डालता है. कचरे का असर सिर्फ इंसानों और नदियों तक सीमित नहीं है. जंगलों के आसपास जमा प्लास्टिक और भोजन का कचरा वन्यजीवों को भी मानव बस्तियों और कूड़ा स्थलों की ओर आकर्षित कर सकता है. हाल में संस्थान की टीम ने देहरादून के आशारोड़ी और मोहंड क्षेत्र में किए अध्ययन में पाया कि हाथियों के मल में पॉलिथीन थी. इसके अलावा, साल 2022 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की टीम ने उत्तराखंड के कई वन प्रभाग से हाथियों और अन्य वन्यजीवों के नमूने लिए थे. उस दौरान जांच में 32 प्रतिशत नमूनों प्लास्टिक एल्युमिनियम के अवशेष और एक में कांच के अंश भी मिले थे. हालांकि, बाद में वन विभाग ने इस पर सख्ती तो बरती लेकिन उसका असर कितना हुआ, ये कहा नहीं जा सकता. उत्तराखंड में बढ़ता पर्यटन जहां अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है वहीं उसके साथ कचरे का बढ़ता बोझ हिमालय, नदियों और जंगलों के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है. अनियंत्रित पर्यटन और तीर्थाटन के कारण पहाड़ों और मैदानी धार्मिक स्थलों पर कचरे का पर्यावरणीय दबाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. यह संकट सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है बल्कि गोमुख ग्लेशियर और वन्यजीवों तक प्लास्टिक का पहुंचना पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर रहा है. अब जरूरत सिर्फ कूड़ा उठाने की नहीं बल्कि एक पर्यटक कितना कचरा छोड़ रहा है उसे कम करने और हर श्रद्धालु को कूड़ा वापस लाने की जिम्मेदारी समझाने की है, तभी भविष्य में पहाड़ और यहां की सुंदरता बच पाएगी. हालांकि, बाद में वन विभाग ने इस पर सख्ती तो बरती लेकिन उसका असर कितना हुआ, ये कहा नहीं जा सकता. इन हालात में हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसे अनाशीय कचरे को लेकर हम स्वयं सचेत व जागरुक बनें। इससे होने वाले नुकसान तथा इनके दूरगामी परिणामों को खुद अच्छी तरह समझें तथा इनके समूल नाश का स्वयं पुख्ता उपाय ढूंढें। हमारी लापरवाही तथा अज्ञानता ही हमारे लिए पर्यावरण असुंतलन,बाढ़,बीमारी तथा अन्य कई प्रकार की तबाही का कारण बनती है। जहां तक हो सके हम अपने घरों में ऐसे अनाशीय कचरों को एकत्रित कर उन्हें स्वयं या तो समाप्त करें या रिसाईकल होने हेतु उसे किसी कबाड़ी की दुकान तक पहुंचाने के उपाय करें। नाली,नालों व सड़कों पर न तो स्वयं ऐसे कचरे फेंके न ही दूसरों को फेंकने दें। हम इस बात की प्रतीक्षा कतई न करें कि सरकार इन अनाशीय कचरों पर स्वयं प्रतिबंध लगाएगी। हमें स्वयं जागरुक होना होगा तथा ऐसी नकारात्मक परिस्थितियों से स्वयं ही जूझना होगा पहाड़ी धार्मिक स्थलों पर पीने के पानी के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक बोतलें इस्तेमाल के बाद कूड़े का हिस्सा बनती हैं. उनके वापस नीचे आने की पूरी व्यवस्था न होने पर यही प्लास्टिक रास्तों, नालों, नदी-नालों और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुंच जाती है. उत्तराखंड सरकार ने 2026 में चारधाम यात्रा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की थी. इनमें प्लास्टिक बोतलों को खत्म करने के लिए वाटर एटीएम और आरओ प्लांट, कचरा फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई, प्लास्टिक वेस्ट के लिए मनी-बैक व्यवस्था और ड्रोन से कचरे की निगरानी जैसे उपाय शामिल कीए थे.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











