डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड में परंपरागत रूप से पैदा की जानी वाली फसल है। इसकी खेती राज्य के चंपावत, पिथौरागढ़, बागेश्वर, अल्मोड़ा व नैनीताल के पर्वतीय हिस्सों तथा गढ़वाल के अन्य पर्वतीय जिलों में हो रही है। यह खरीफ की फसल है इसका उपयोग मुख्यत: जाड़ों में किया जाता है। सूखा सहन करने की क्षमता रखने वाली मडुवे की पैदावार प्राचीन समय से ही राज्य के पर्वतीय अंचलों में होती रही है। इसकी खेती ढालू, कम उपजाऊ व बारिश पर आश्रित भूमि पर की जाती है। मडुवा विपरीत परिस्थितियों में भी पैदा किया जा सकता है, यही कारण है कि सिंचाई के साधनों के अभाव वाले क्षेत्रों में किसान इसकी उपज आसानी से कर सकते हैं मडुआ बच्चों से लेकर वृद्धजनों तक सभी के लिये समान रूप से उपयोगी है।अनाजों में राजा माना जाने वाला मंडुवा आज से ही नहीं ऋषि मुनियों के काल से ही अपने महत्वपूर्ण गुणों के लिए जाना जाता है। भारत वर्ष में मंडुवे का इतिहास 3000 ई0पूर्व से है। पाश्चात्य की भेंट चढनें वाले इस अनाज को सिर्फ अनाज ही नही अनाज औषधि भी कहा जा सकता है।इन्ही अनाज औषधीय गुणों के कारणः वापस आधुनिक युग में इसे पुनः राष्ट्रीय एंव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान मिलने लगा है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय journals तथा मैग्जीन्स इसे आज पावर हाउस नाम से भी वैज्ञानिक तथा शोध जगत में स्थान दे रहे है। इसका वैज्ञानिक नाम इल्यूसीन कोराकाना जो कि पोएसी कुल का पौधा है। इसे देश दुनिया में विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे कि अंग्रजी में प्रसिद्व नाम फिंगर मिलेट, कोदा, मंडुवा, रागी, मारवा, मंडल नाचनी, मांडिया, नागली आदि। भारत मे मडुवें की मुख्य रुप से 2 प्रजातियां पायी जाती है जिसे Eleusine indica जंगली तथा Eleusine coracana प्रमुख रुप से उगाई जाती है, जो कि सामान्यतः 2,300 मीटर (समुद्र तल से) की ऊंचाई तक उगाया जाता है। मंडवें की खेती बहुत ही आसानी से कम लागत, बिना किसी भारीभरकम तकनीकी के ही सामान्य जलवायु तथा मिटटी में आसानी से उग जाती है। उत्तराखण्ड में तो मंडुवे के आटे से रोटी के अलावा बर्फी और बिस्कुट भी बनना शुरू हो गया है। साफ है कि उत्तराखण्ड में धीरे-धीरे मण्डुवा जैसे मोटे अनाज की माँग बढ़ती जा रही है और यह यहाँ के किसानों की आमदानी का भी जरिया बनता जा रहा है।उत्तराखण्ड में मोटे अनाजों की 12 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिसे आम बोल-चाल की भाषा में बारहनाजा कहते हैं। इनमें शामिल मण्डुवा कभी बच्चों के अन्नप्रास में प्रयोग में लाया जाने वाला मुख्य आहार था। समय बदला, देश के सभी क्षेत्रों में खेती के पैटर्न में बदलाव हुए और मोटे अनाज की जगह नए अनाजों ने ले लिया। उत्तराखण्ड की वादियों में रचे-बसे किसान भी पारम्परिक अनाजों को त्यागकर गेहूँ का उत्पादन करने लगे।इस तरह गेहूँ के उत्पादन में इजाफा हुआ और मण्डुवा की जगह गेहूँ की रोटी ने ले ली। समय के साथ गेहूँ के उत्पादन में तेजी आई लेकिन उत्पादन में कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग के कारण इसके सेवन से लोग विभिन्न प्रकार की बिमारियों की चपेट में आने लगे। इन्हीं सब कारणों से यहाँ के लोग मण्डुवा सहित अन्य मोटे अनाजों की तरफ फिर से मुड़ गए। इस तरह उत्तराखण्ड में धीरे-धीरे मोटे अनाजों की मंडी में तब्दील होने लगा। राज्य में मंडुआ का बाजार काफी तेजी से विकसित हुआ है।उत्तराखण्ड का कोदो यानी मंडुआ लोगों को नगदी फसल के रूप में आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाएगा। अतएव अब कोदो एक बार फिर से उत्तराखण्डियों के खेतों में लहलहाएगा। इसकी शुरुआत केन्द्र सरकार की तरफ से हो गई है। इस पहल से फिलहाल बागेश्वर जनपद के मोनार गाँव सहित 20 गाँवों के 952 परिवार जुड़ गए हैं। ये लोग मण्डुवा के आटे से बिस्कुट बनाएँगे।
इस बिस्किट को हिलांस नाम से बाजार में उतारा जाएगा। भारत सरकार के अनुसूचित जनजाति मंत्रालय की टीम ने मोनार में कोदो से बनने वाले उत्पाद का परीक्षण भी कर लिया है। खबर है कि मंत्रालय का ‘माँ चिल्टा आजीविका स्वायत्त सहकारिता लोहारखेत’ के साथ अनुबन्ध होगा। आपको बता दें कि मन की बात में पीएम मोदी खुद कोदो की तारीफ कर चुके हैं। क्षेत्र के लोग इस पहल से खासे उत्साहित हैं और कहते हैं कि इस प्रकार यदि स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के साधन उपलब्ध होंगे तो स्वतः ही पलायन पर रोक लग जाएगी।उतराखण्ड के मंडुवे की माँग विदेशों में भी है। अब मण्डुवा लोगों की आजीविका का साधन बनने जा रहा है। मंडुवे की रोटी लोगों के घरों में फिर से जगह बनाने लगी है। इसका इस्तेमाल दवा के रूप में भी किया जाता है। उदाहरण के तौर पर दूधमुहें बच्चों को जब जुकाम आदि की समस्या होती है तो मंडुवे के आटे को गर्म पानी में डालकर उसका भाप लेने से आराम मिलता है।
कभी मंडुवे के आटे से स्थानीय स्तर पर सीड़े, डिंडके जैसे पारम्परिक नामों से कई प्रकार के व्यंजन तैयार होते थे जो ना तो तैलिय होती और ना ही स्पाईसी होती थीं। लोग इसे अतिपौष्टिक मानते थे। इन्हें हल्की आँच के सहारे दो बर्तनों में रखकर भाप से पकाया जाता है। इसमें चीनी गुड़ और मंडुवे के आटे के अलावा और अन्य किसी चीज का प्रयोग नहीं किया जाता था।स्थानीय लोग और वैज्ञानिक संस्थाएँ मंडुवे के आटे और मंडुवे के दाने को लेकर विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं। देहरादून स्थित कटियार एकमात्र बेकरी है जहाँ मंडुवे के आटे से बनी डबल रोटी आपको मिल जाएगी। कटियार बेकरीवालों का कहना है कि मंडुवे के आटे से बनी डबल रोटी की माँग तेजी से बढ़ रही है और वे माँग के अनुरूप पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कृषि विज्ञान केन्द्र रानीचौरी ने मंडुवे के आटे से बर्फी बनाने का सफल प्रयोग किया है।मंडुवे की उत्पति इथूपिया हॉलैंड से माना जाता है लेकिन भारत विश्व का सबसे ज्यादा मडुवा उत्पादक देश है, जो विश्व मे 40 प्रतिशत का योगदान रखता है तथा विश्व का 25प्रतिशत सर्वाधिक क्षेत्रफल भारत में पाया जाता है। भारत के अलावा मंडवे की खेती प्रतिशतमे अफ्रीका से जापान और ऑस्ट्रेलिया तक की जाती है। दुनिया में लगभग 2.5 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन किया जाता है। भारत में मुख्य फसलों मे शामिल मंडुवे की खेती लगभग 2.0 मिलियन हेक्टेयर पर की जाती है जिसमे औसतन 2.15 मिलियन टन मंडुवे का उत्पादन होता है जो कि दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग 40 से 50 प्रतिशत है।पोषक तत्वों से भरपूर मंडुवे मे औसतन 329 किलो0 कैलोरी, 7.3 ग्राम प्रोटीन, 1.3 ग्राम फैट, 72.0 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 3.6 ग्राम फाइबर, 104 मि0ग्राम आयोडीन, 42 माइक्रो ग्राम कुल कैरोटीन पाया जाता है। इसके अलावा यह प्राकृतिक मिनरल का भी अच्छा स्रोत हैद टाइम्स ऑफ इण्डिया के अनुसार इण्डिया की सबसे सस्ती फसल (मडुवा) इसके न्यूट्रिशनल गुणों के कारण अमेरिका में सबसे महंगी है। मंडुवा अमेरिका मे भारत से 500 गुना मंहगा बिकता है। यू0एस0ए0 मे इसकी कीमत लगभग 10US डॉलर प्रति किलोग्राम है जो कि यहां 630 रू0 के बराबर है। जैविक मडुवे का आटा बाजार में 150 किलोग्राम तक बेचा जाता है। भारत से कई देशो -अमेरीका, कनाडा , नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, ओमान को मंडुवा निर्यात किया गया। केन्या में भी बाजरा तथा मक्का की अपेक्षा मंडुवे की कीमत लगभग दुगुनी है जबकि यूगाण्डा में कुल फसल उत्पादित क्षेत्रफल के आधें में केवल मंडुवे का ही उत्पादन किया जाता है। जबकि भारत में इसका महत्व निर्यात की बढती मांग को देखते हुए विगत 50 वर्षो से 60 प्रतिशत उत्पादन मे बढोतरी हुयी है जबकि नेपाल में मंडुवा उत्पादित क्षेत्रफल 8 प्रतिषत प्रतिशत की दर से बढ रहा है।चूँकि उत्तराखण्ड प्रदेश का अधिकतम खेती योग्य भूमी असिंचित है तथा मडुवा असिंचित देशो मे उगाये जाने के लिये एक उपयुक्त फसल है जिसका राष्ट्रीय एवम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पोष्टिक उत्पाद बनाने मे प्रयोग किया जाता है। मंडुवा प्रदेश की आर्थिकी का बेहतर स्रोत है। तो निश्चित तौर पर पहाड़ की मंदिर पुरानी रौनक वापस लौट सकती है।
लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।











