डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मुनस्यारी-मल्ला जौहर क्षेत्र से अपने पशुधन के साथ लौट रहे भेड़ पालकों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है। मपांग के पास लगातार बारिश, भूस्खलन और कड़ाके की ठंड की चपेट में आने से लगभग 70 से 80 भेड़-बकरियों की दर्दनाक मौत हो गई है।पशुपालन पर निर्भर इन परिवारों के सामने अब आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा लीलम, मामा होटल, रलगाड़ी व स्युनी के पास मलबा आने से मोटर मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है।इसके चलते मोहन सिंह, मोहन सिंह धामी और करन सिंह सहित कई पशुपालक पिछले दो दिनों से रास्ते में ही फंसे हुए हैं और मदद का इंतजार कर रहे हैं। इस घटना पर मदकोट-मुनस्यारी के जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि विक्रम दानू ने चिंता जताते हुए अपना बयान जारी किया है।मुनस्यारी-मल्ला जौहर क्षेत्र से अपने पशुधन के साथ लौट रहे भेड़ पालकों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है। मपांग के पास लगातार बारिश, भूस्खलन और कड़ाके की ठंड की चपेट में आने से लगभग 70 से 80 भेड़-बकरियों की दर्दनाक मौत हो गई है।पशुपालन पर निर्भर इन परिवारों के सामने अब आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा लीलम, मामा होटल, रलगाड़ी व स्युनी के पास मलबा आने से मोटर मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है।इसके चलते मोहन सिंह, मोहन सिंह धामी और करन सिंह सहित कई पशुपालक पिछले दो दिनों से रास्ते में ही फंसे हुए हैं और मदद का इंतजार कर रहे हैं। इस घटना पर मदकोट-मुनस्यारी के जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि विक्रम दानू ने चिंता जताते हुए अपना बयान जारी किया है।सीमांत क्षेत्र के ये भेड़ पालक अत्यंत मेहनतकश हैं और पशुधन ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। प्रशासन को मानवीय आधार पर तत्काल मदद करनी चाहिए। मल्ला जौहर क्षेत्र में लगातार बारिश, भूस्खलन और कड़ाके की ठंड से लगभग 80 भेड़-बकरियों की मौत हो गई है,मुनस्यारी-मल्ला जौहर क्षेत्र से अपने पशुधन के साथ लौट रहे भेड़ पालकों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है। मपांग के पास लगातार बारिश, भूस्खलन और कड़ाके की ठंड की चपेट में आने से लगभग 70 से 80 भेड़-बकरियों की दर्दनाक मौत हो गई है। पशुपालन पर निर्भर इन परिवारों के सामने अब आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा लीलम, मामा होटल, रलगाड़ी व स्युनी के पास मलबा आने से मोटर मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है। इसके चलते मोहन सिंह, मोहन सिंह धामी और करन सिंह सहित कई पशुपालक पिछले दो दिनों से रास्ते में ही फंसे हुए हैं और मदद का इंतजार कर रहे हैं। इस घटना पर मदकोट-मुनस्यारी के जिला पंचायत सदस्य प्रतिनिधि विक्रम दानू ने चिंता जताते हुए अपना बयान जारी किया है। उन्होंने कहा,”सीमांत क्षेत्र के ये भेड़ पालक अत्यंत मेहनतकश हैं और पशुधन ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। प्रशासन को मानवीय आधार पर तत्काल मदद करनी चाहिए।हमारी मांग है कि राजस्व व पशुपालन विभाग की संयुक्त टीम मौके पर भेजकर मृत पशुओं का पंचनामा कराया जाए और प्रभावितों को उचित मुआवजा दिया जाए। साथ ही फंसे पशुपालकों के लिए भोजन व राहत सामग्री की व्यवस्था कर मार्ग को युद्धस्तर पर खोला जाए।पिथौरागढ़ में चीन सीमा के ओल्ड दुंग में बर्फबारी से फंसी सर्वे टीम, सेना ने दी सुरक्षित पनाह विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपणन, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो पहाड़ी ऊन और ऑर्गेनिक मांस को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर बाजार मिल सकता है. पर्वतीय राज्यों में पशुपालन आधारित सूक्ष्म उद्योग, ऊन प्रसंस्करण इकाइयां और डेयरी सहकारी समितियां रोजगार के नए अवसर खोल सकती हैं. स्थानीय नस्लों के संरक्षण और जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग से यह क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम साबित हो सकता है. ह महीने सुरम्य मखमली बुग्यालों में प्रवास करने वाले भेड़ पालकों ने गावों की ओर रूख करना शुरू कर दिया है. दीपावली तक सभी भेड़ पालकों के अपने गांव वापस लौटने की परंपरा है. पहले भेड़ पालकों के गांव से बुग्यालों की ओर रवाना होने और छह महीने बुग्यालों में प्रवास के बाद गांव लौटने पर भव्य स्वागत किया जाता था, लेकिन भेड़ पालन व्यवसाय धीरे-धीरे कम होने के साथ ही यह परंपरा भी खत्म हो चुकी है. प्रदेश सरकार की ओर से भेड़ पालकों को प्रोत्साहन न देने और ऊंचाई वाले इलाकों में ज्यादा कठिनाई होने के कारण भेड़ पालन व्यवसाय में लगातार गिरावट आना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है. जबकि, युवा पीढ़ी भी इस व्यवसाय से मुंह मोड़ रही है. वहीं, छह महीने बुग्यालों में प्रवास करने के बाद इन दिनों भेड़ पालकों ने गांव की ओर रूख करना शुरू कर दिया है. कुछ भेड़ पालक अभी भी करीब सात हजार फीट की ऊंचाई पर प्रवास कर रहे हैं, जो दीपावली तक गांव लौट सकते हैं.. बर्फ की पहाड़ी का कुछ हिस्सा टूटकर गिर गया. जिसकी वजह से बकरियां उसमें दब गई. जब तक बर्फ से उनको निकाला जाता तब तक 35 बकरियों की मौत हो चुकी थी.
गोविंद सिंह ने प्रशासन से उचित मुआवजे की मांग की है. उसका कहना है कि बकरियां ही उसके जीविका की सहारा थीं. उनके मरने की वजह से बहुत नुकसान हुआ है. प्रशासन से मांग है कि उचित मुआवजा दिया जाए नहीं तो मेरा परिवार भुखमरी के कागार पर आ जाएगा.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











