डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दूनागिरी पर्वत उपत्यका में बसी द्वाराहाट की नयनाभिराम कौतुक भरी पर्वत घाटी धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध होने के साथ ही सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से भी विशिष्ट बनी रही है. महाभारत कालीन इतिहास बताता है कि उत्तराखंड में उस काल में पांच मुख्य हाटक गणराज्यों की शासन व्यवस्था रही थी जिन्हें वैराट या विरहहाट, गंगोलीहाट या गंगावलीहाट, डीडीहाट, द्वाराहाट व गरुड़हाट कहा गया. द्वाराहाट के चौदह सौ वर्षों के बसाव में कत्यूरी राजा शालिवाहन का विशेष योगदान रहा. द्वाराहाट में ग्यारहवीं से सोलहवीं शताब्दी में निर्मित तीस मंदिर हैं तो तीन सौ पैंसठ नौले, प्राचीन शालदेव का पोखरा और इन के साथ कत्यूरी नरेशों के किलों के अवशेष जो उस काल के वैभव की कहानी सुनाते हैं.दूनागिरी पौराणिक दृष्टि से उन सात कुल पर्वतों में एक है जिसका उल्लेख विष्णु पुराण, वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण , मतस्य पुराण, कर्म पुराण, श्री मदभागवत -पुराण एवं देवी पुराण में मिलता है. इन सात कुल पर्वतों में द्रोणागिरी वह चौथा पर्वत है जिसे औषधि पर्वत कहा गया.
कुमुदषचौन्नतश्चेव तृतीयश्च बलाहकः
द्रोणो यत्र महौषसध्य स चतुर्थो महीधरः
द्रोणागिरी रामगंगा के बायीं ओर स्थित है जिससे द्रोणी, वैताली व नंदिनी नदियाँ निकलती हैं. सुरभि और नंदिनी नदी के संगम स्थल पर स्थित है विभाण्डेश्वर महादेव. विभाण्डेश्वर महादेव तीर्थ द्वाराहाट के दक्षिण पांच कि.मी. दूरी पर स्थित रमणीक आध्यात्मिक स्थल है. स्कन्दपुराण के मानसखंड में इसकी अवस्थिति वर्णित है :
द्रोणाद्रिपादसम्भूता नन्दिनीति महानदी
सुरभि संगमे पुत्र ययौ तीर्थें विराजिता.
तयोमध्ये विभाण्डेशं जानिहि मुनिसत्तम.
सुरभीनंदिनी मध्ये विभाण्डेशं महेश्वरं.
नागार्जुन पर्वत श्रृंखला से निकलती है सुरभि सरिता तथा द्रोणागिरी की तलहटी से निसृत है नंदिनी सरिता. सुरभि और नंदिनी के संगम पर स्थित विभाण्डेश्वर महादेव कुमाऊं में काशी की तरह मोक्षदायिनी मानी जाती है. मान्यता है कि नागार्जुन स्थल में देवधेनु सुरभि गऊ माता अपना रूप परिवर्तित कर सरिता बन प्रवाहित हुईं. विभाण्डेश्वर महादेव मंदिर शक सम्वत 376 (सन 301) में स्थापित हुआ. चंद राजाओं के शासन में मंदिर में नियमित पूजा अर्चना अनुष्ठान होते रहे. तदन्तर स्वामी लक्ष्मी नारायण महराज द्वारा यहाँ जीर्णोद्धार किया गया व अनेक मूर्तियां स्थापित की गईं. चैत्र माह के मासांत की रात्रि विमाण्डेश्वर महादेव मंदिर में ढोल, नगाड़ों और छोलिया नर्तकों के निनाद से गुंजायमान हो उठती है. शिव की भक्ति में रमे श्रृद्धालु समीपवर्ती ग्रामों से टोलियां बना अपने अपने निशान व झंडे लिए अगले दिन से शुरू बट पूजें के मेले में भागीदारी करने विमाण्डेश्वर में आ पहुँचते हैं.शिव के साथ ही ईष्ट की पूजा अर्चना कर भोग चढ़ा, भंडारे के प्रसाद व भोजन से तृप्त हो रात्रि भर कीर्तन भजन होते हैं. झोड़ा, चांचरी और भगनौला में अंचल के स्वर गूंजते हैं. सबमें स्याल्दे बिखौती के मेले में झूम जाने अपनी भक्ति की शक्ति से देवता को जाग्रत कर देने की ललक है. मेले में नौज्यूला आल और गरख दल के ग्रामवासी अपने नगाड़े निशान के साथ ओड़ा भेंटेंगे. मीना बाजार लगेगा. शीतला पुष्कर मैदान में खूब रौनक रहेगी. स्याल्दे बिखौती के मेले के साथ ही विभाण्डेश्वर महादेव में महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी तुला संक्रांति और होलिका चतुर्दशी के साथ अन्य अवसरों में संस्कृति के संस्कार पूरी धूमधाम से परंपरागत छवि लिए संपन्न होते रहे हैं. लोक विश्वास है कि सूर्य उगने पर जिस प्रकार उसकी ऊष्मा से हिम पिघलता है वैसे ही विभाण्डेश्वर महादेव के दर्शन, उसकी कृपा से मानव मन के पतित भाव तिरोहित हो जाते हैं.
तस्य कुक्षौ महादेवो विभाण्डेशेति विश्रुतः
तस्य सन्दर्शनात पुत्र मनुष्याणां दुरात्मनाम
पातकानि विलीयन्ते हिमवद भास्करोदयो.
रामगंगा नदी की एक विस्तृत घाटी में स्थित, द्वाराहाट रानीखेत से लगभग 32 किलोमीटर दूर है।और ऐतिहासिक और पुरातात्विक दोनों बिंदुओं से एक महत्वपूर्ण शहर है और यह कत्युरी राजाओं की कुछ शाखाओं की राजधानी रह चुका है। द्वाराहाट से लगभग 10 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर प्रसिद्ध दुनागिरि मंदिर स्थित है जो पौराणिक कथाओं में प्रसिद्ध है, जिसमें जड़ीबूटी औषधि संजीवनी मौजूद है। देवी दुर्गा को समर्पित मंदिर सुंदर और घने जंगल और एक चाय के बगानों के बीच में स्थित है। द्वाराहाट से कुछ दूरी पर नाथन देवी के मंदिर स्थित है। अल्मोड़ा से 38 किलोमीटर दूर सिंधुतल से 1530 मीटर ऊँचाई पर स्थित द्वाराहाट, कत्यूरी राजवंश के राजाओं के कलाप्रेम और आस्था का केन्द्र रहा है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार 11वीं तथा 12वीं सदी में इस स्थान पर 30 प्राचीन मंदिरों तथा 365 कुंडांे ;बावड़ियोंद्ध का निर्माण कराया गया था। प्रथम विश्वयु( के पश्चात् सन् 1918 में इन मंदिरों का जीर्णो(ार किया गया। इस मंदिर समूह का सर्वोत्कृष्ट मंदिर गूजरदेव का मंदिर है। सभी मंदिर आठ विशिष्ट वर्गों में चि“िनत किए गए हैं, जिन्हें क्रमशः 1. रतनदेवल 2. कचहरी 3. मन्देव 4. गूजरदेव 5. मृत्युजंय 6. बद्रीनाथ 7. केदारनाथ तथा 8. हरिसिंह देवल कहा जाता है, किंतु रतनदेवल ;रत्नदेवद्ध, कचहरी तथा मन्देव ;मनियाद्ध समूह ही प्रसि( हैं। इन मंदिरों के कारण द्वाराहाट को ‘हिमालय की द्वारिका’ कहा जाता है। वास्तव में कत्यूरी शासकों ने इसे द्वारिकापुरी बनाने का प्रयास किया था। वर्तमान में श्री बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा मृत्युंजय मंदिरों में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। द्वाराहाट को मंदिरों का नगर कहा जाता है इसके साथ साथ पुरातात्विक शब्दों में द्वाराहाट को उत्तराखंड का खजुराहो भी कहा जाता है । द्वाराहाट में कालान्तर में 365 मंदिर और 365 ही नाले और बावड़ियां हुआ करती थी। मगर आज कुछ ही मंदिर समूह बचे हैं कुछ नोले। द्वाराहाट कभी पुरातन काल में एक भब्य नगर रहा होगा। यहां पर आज भी खुदाई में मृद भांड मिलते हैं जिसमे की दैनिक उपयोग की वस्तुवें या बर्तन मिलते हैं। इसी वजह से यहाँ इन मंदिरों का निर्माण हुवा होगा।यहां पर जो मंदिर हजारों वर्षों से सैनिकों की तरह बिलकुल आकाश की ओर मुह किए खड़े हैं इनकी या इन मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनके जोड़ पर किसी प्रकार का कोई गारा या लेप नहीं लगा है। उत्तराखंड सरकार बनने के बाद पुरातत्व विभागइन मंदिरों का रख रखाव पर ज्यादा ध्यान विशेष दिलाते हैं लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











