डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
अंग्रेजी फौज के कैप्टेन फ्रेडरिक यंग द्वारा मसूरी को बसाने की शुरूआत 1820 के आसपास की गयी थी। साढ़े छह हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित मसूरी शहर चारों ओर से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है जो राजधानी देहरादून से मात्र 35 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत में अंग्रेजों के कारण हिल स्टेशन बना है। दरअसल, आजादी से पहले जब गर्मियां अपने चरम पर होती थीं तो ये अंग्रेज अपने पूरे परिवार के साथ यहां आकर रुकते थे। इसके बाद उन्होंने सोचा कि ये तो बिजनेस करने का अच्छा ऑप्शन हो सकता है। उन्होंने पैसे कमाने के लिए यहां छोटी-छोटी झोपड़ियां बनवाईं जो अब रिजॉर्ट्स में तब्दील हो चुकी हैं। धीरे-धीरे यहां बाजार, चर्च, स्कूल बन गए। सड़कों का भी विकास हो गया। अब ये जगह एक मशहूर हिल स्टेशन बन गई। मसूरी की बात करें तो बादलों से घिरी पहाड़ियां, ठंडी हवा, खूबसूरत वादियां और शांत माहौल इस जगह को खास बनाती हैं। शायद इसी वजह से इसे प्यार से ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ यानी कि पहाड़ों की रानी कहा जाता है।उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में बसा मसूरी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है। ये दिल को सुकून देने वाली एक ऐसी जगह है जहां हर कोई बार-बार जाना चाहता है। ब्रिटिश राज के समय से ही मसूरी लोगों की पसंदीदा जगह रही है। यहां की हरियाली, ऊंचे पहाड़, पुराने बाजार और घूमने की ढेर सारी जगहें इसे और भी खास बना देती हैं। यहां पर जहां लोग ग्रुप्स में आना पसंद करते हैं, तो वहीं साेलाे ट्रैवलर्स की संख्या भी कम नहीं होती है। दून घाटी के ऊपर बसा, साल के ज्यादातर समय कोहरे से घिरा और औपनिवेशिक काल की पुरानी इमारतों से सजा मसूरी, लंबे समय से पहाड़ों की रानी कहलाता आया है। यह नाम पर्यटन अभियानों या आधुनिक ब्रांडिंग से नहीं मिला, बल्कि इस शहर की प्राकृतिक सुंदरता, जलवायु और आकर्षण के अद्भुत मेल से आया है। आज भी, मसूरी कई शोरगुल भरे और तेजी से विकसित हो चुके हिल स्टेशनों से अलग है। इसका आकर्षण इसकी शांत गति, समृद्ध इतिहास और पहाड़ों से परे दूर तक फैले मनोरम दृश्यों में निहित है। दूरदराज की पहाड़ी बस्तियों के विपरीत, मसूरी सुलभ होने के साथ-साथ परिष्कृत भी थी, जहाँ सैरगाहें, गिरजाघर और ऐतिहासिक होटल इसे एक विशिष्ट पहचान देते थे। समय के साथ, इसकी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन आकर्षण के संतुलन ने इसे अन्य पहाड़ी स्टेशनों से अलग कर दिया, जिससे ‘पहाड़ों की रानी’ का खिताब सार्थक और स्थायी बन गया। मसूरी के रहने वाले बिल्लू कहते हैं कि उनकी कई पुश्तें मसूरी में रही हैं. उनका बचपन भी इन हरी पहाड़ियों में बीता है. धीरे-धीरे मसूरी बदलता जा रहा है. एक दिन ऐसा आएगा कि मसूरी का सिर्फ नाम ही बचेगा. बिल्लू का कहना है कि जब से उत्तराखंड अलग राज्य बना है तब से इसके पहाड़ों को खोदा जा रहा है. हमने देखा की बरसात में अब मसूरी की सड़कों पर लैंडस्लाइड बहुत ज्यादा होने लगे हैं, लेकिन पहले इतना नहीं हुआ करता था. कंस्ट्रक्शन का काम इतना ज्यादा हुआ है, यहां पहाड़ों को काटकर होटल-रिसोर्ट बनाए गए हैं. दूसरे राज्यों के बिल्डर इनका संचालन करते हैं. यहां जो भी कूड़ा होता है उसके निस्तारण की कोई उचित व्यवस्था न होने से लोग खुले में ही इन्हें डाल देते हैं. इसे जल स्रोत बाधित होते हैं, बंद हो जाते हैं, जिस पानी को बहकर निकल जाना था वह पहाड़ों में ही अवशोषित होता रहता है. मसूरी के रहने वाले बिल्लू कहते हैं कि उनकी कई पुश्तें मसूरी में रही हैं. उनका बचपन भी इन हरी पहाड़ियों में बीता है. धीरे-धीरे मसूरी बदलता जा रहा है. एक दिन ऐसा आएगा कि मसूरी का सिर्फ नाम ही बचेगा. बिल्लू का कहना है कि जब से उत्तराखंड अलग राज्य बना है तब से इसके पहाड़ों को खोदा जा रहा है. हमने देखा की बरसात में अब मसूरी की सड़कों पर लैंडस्लाइड बहुत ज्यादा होने लगे हैं, लेकिन पहले इतना नहीं हुआ करता था. कंस्ट्रक्शन का काम इतना ज्यादा हुआ है, यहां पहाड़ों को काटकर होटल-रिसोर्ट बनाए गए हैं. दूसरे राज्यों के बिल्डर इनका संचालन करते हैं. यहां जो भी कूड़ा होता है उसके निस्तारण की कोई उचित व्यवस्था न होने से लोग खुले में ही इन्हें डाल देते हैं. इसे जल स्रोत बाधित होते हैं, बंद हो जाते हैं, जिस पानी को बहकर निकल जाना था वह पहाड़ों में ही अवशोषित होता रहता है. जब उत्तराखंड राज्य नहीं बना था, तब हमारा सपना था कि अपना राज्य होने से मसूरी समेत पहाड़ों की दशा सुधरेगी. स्वास्थ्य सुविधाओं, सड़कों से लेकर रोजगार मिलेगा. मसूरी पर्यटन स्थल तो बना लेकिन यहां बड़े-बड़े सेठों के होटल रिसोर्ट चल रहे हैं, जो उत्तराखंड के है ही नहीं. मसूरी शिवालिक रेंज में है. जिन पहाड़ों की उम्र ज्यादा नहीं होती है, वे कच्चे पहाड़ हैं. दिन पर दिन मसूरी में हो रहे कंस्ट्रक्शन से यहां के पहाड़ इतना भार नहीं झेल पाएंगे, इसलिए सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए.पहाड़ों की रानी मसूरी में ढुलमुल निर्माण और प्रशासन की अनदेखी से परेशान लोगों गुस्सा चरम पर है. सड़कें बदहाली के दौर से गुजर रही हैं. आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है. ‘पानी वाला बैंड’ के पास इसी सीजन सड़क दो बार धंसकर बह चुकी है. हादसों का खतरा भी हर पल मंडरा रहा है लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











