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मौत को इतने करीब से पहले कभी महसूस नहीं किया

08/05/21
in उत्तराखंड, हेल्थ
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शंकर सिंह भाटिया
मृत्यु सास्वत सत्य है, जो भी जीव जन्म लेता है अवश्य मृत्यु को प्राप्त करता है। लेकिन मृत्यु का क्रम बहुत धीमा होता है। इसलिए मनुष्य जीते जी जीवन को इंजाय भी करता है। मनुष्य की आयु 60-100 वर्ष तक मानी जाती है। इसके अतिरिक्त अल्पायु में किसी बीमारी, दुर्घटना आदि से भी मृत्यु हो जाती है। मृत्यु के इस क्रम में जब श्यमशान घाट में चिता जलती है, तब अधिकांश लोगों को क्षणिक ज्ञान प्राप्त होता है, एक दिन सब कुछ यहीं रह जाना है, सबकुछ छोड़कर खाली हाथ चले जाना है, लेकिन श्यमशान घाट से घर आने तक यह ज्ञान विलुप्त हो जाता है। व्यक्ति फिर उसी आपाधापी में जुट जाता है।

सन् 2020 से लेकर अब तक कोरोना महामारी ने मनुष्य को मृत्यु का एक विभत्स रूप दिखाया है। वह बहुत ही अधिक डरावना है। जिसका भी इससे सामना हो रहा है, उसे अपने सिर पर मौत मडराते हुए दिखाई दे रही है। यह भी पता नहीं चल रहा है कि कोई व्यक्ति अस्पताल में कब भर्ती हुआ? सीधे उसकी मौत की खबर आ रही है। अपने निकट संबंधियों तथा जानने वाले मित्रों, दोस्तों को, जिन्हें न तो कोई ऐसी बीमारी है और न ही जिनकी आयु अधिक है, सीधे उनकी मृत्यु की सूचना एक अजीब तरह की बेचैनी, एक गले को सुखा देने वाली टीस पैदा कर रही है।

कोरोना के क्रूर हाथ किस तरह जीवन छीन रहे हैं, इसका एक निजी उदाहरण दूं। इसी साल मार्च में मैं परिवार सहित खटीमा गया था। वहां बहुत सारे सगे संबंधियों के घर होकर आया। चचेरे भाई पूरन से भी मुलाकात हुई। करीब 47 साल का हट्टा-कट्टा जवान पूरन बोला भाई इस जीवन में बहुत आपाधापी देख ली है। इस बार भतीजे की शादी में पत्नी के साथ जरूर देहरादून आउंगा। पूरन खुश लग रहा था, कहीं से भी लेश मात्र बीमार नहीं लग रहा था। दो दिन पहले खबर आई कि कोरोना ने उसे लील लिया है। इसी तरह पत्रकार मित्र राजेंद्र जोशी, उक्रांद नेता धर्मेंद्र कठैत, पत्रकार गोविंद कपटियालजी की पत्नी समेत तमाम उन लोगों का अचानक चले जाना कुछ इसी तरह की घटनाएं हैं।

मौत का यह तांडव आगे जाकर कब थमेगा किसी को पता नहीं है। जानकार इसे कोरोना की दूसरी लहर कह रहे हैं, जो पहली लहर के मुकाबले कहीं अधिक मारक है। तीसरी लहर की भी आशंका जताई जा रही है, जो न जाने और कितनी डरावनी होगी? इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में अब तक दो करोड़ 18 लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं, जबकि कोरोना से मरने वालों की संख्या दो लाख 38 हजार से अधिक है। लेकिन जानकारों का कहना है कि मौत का आंकड़ा बताए जा रहे आंकड़े के मुकाबले पांच से दस गुना अधिक हो सकता है।

वर्तमान पीढ़ी ने मौत का इस तरह का तांडव अपनी जिंदगी में पहली बार देखा है, लेकिन महामारी के विश्व इतिहास के अनुसार अब तक नौ से अधिक बार दुनिया ने महामारी देखी है, जिसमें लाखों करोड़ों की मौत हुई। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जब बहुत सारी बीमारियों पर जीत का दावा करता है, वह अभी तक कोरोना का पुख्ता इलाज नहीं ढूुढ पाया है। यूरोप अमेरिका जैसे विकसित देश जहां चिकित्सा सेवा के विकास की बुलंदियों तक पहुंचने का दावा किया जाता है, कोरोना की पहली ही लहर के सामने वे सभी धराशायी हो गए थे।

इस तरह की भयावह महामारी में किसी व्यक्ति विशेष का कोई महत्व नहीं रह जाता है। इससे लड़ने का माद्दा कोई सरकार ही रख सकती है, वह भी विश्व के दूसरे देशों के सहयोग से यह लड़ाई जीती जा सकती है। लेकिन यदि सरकार की प्राथमितकताएं प्रधानमंत्री आवास, नया संसद भवन, चुनाव और कुंभ जैसे आयोजन हों तो महामारी की दूसरी क्या तीसरी लहर भी आकर तांडव मचाएगी, उसे कौन रोक सकता है?

एक बात और है सरकारें व्यवस्था कर सकती हैं, संसाधन जुटा सकती है। लेकिन कोरोना की चेन को अकेले सरकार नहीं तोड़ सकती है। चेन को तोड़ने में सरकार की देखरेख में प्रत्येक व्यक्ति के योगदान का महत्व है। यदि प्रत्येक व्यक्ति कोरोना प्रोटोकाल को अपना ले, कोरोना से बचने की विशेषज्ञों द्वारा बताई गई सामान्य जानकारियों को जीवन में लागू कर ले तो कोरोना की चेन को आसानी से तोड़ा जा सकता है। लेकिन चुनावों, धार्मिक आयोजनों, बाजारों की खरीददारी करते हुए लग रही भीड़ यह साबित करती है कि समाज में बहुत सारे लोगों को कोरोना की चेन तोड़ने में कोई रूचि नहीं है। ऐसा कर वे इसे और बढ़ाने का काम ही कर रहे हैं।

कोरोना संकट के इस दौर में एक बहुत बड़ा वर्ग जरूरी दवाओं, जीवन रक्षक उपकरणों, आक्सीजन गैस आदि उन तमाम वस्तुओं की कालाबाजारी करने में जुटा है। इन दलालों ने यह साबित कर दिया है कि मानव जीवन, मानवता जैसे शब्द उनके लिए सिर्फ मजाक की तरह हैं। वह पैसा कमाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मानवता के विद्रूप का यह एक नंगा रूप है।

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