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दिग्गजों में शुमार थे स्व. सोबन सिंह जीना

02/08/25
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
आजादी के बाद वह सक्रिय राजनीति की ओर उन्मुख हुए। देशभक्ति तथा भारतीय परंपराओं के प्रति अनुराग से ओतप्रोत जीना जी जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे। जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी का एक प्रमुख घटक था।उन्होंने तीन बार वर्षः 1952, 1971 तथा 1977 में अल्मोड़ा बारामण्डल चुनाव क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में लड़ा। लेकिन उन्हें केवल एक बार वर्ष 1977 में विजयश्री प्राप्त हुई और जनता दल सरकार में पर्वतीय विकास के कैबिनेट मंत्री बना गए ।सोबन सिंह जीना का सर्वाधिक चिरकालीन योगदान शिक्षा के क्षेत्र में था। उन्होंने वर्ष 1949 में श्री अम्बादत्त पंत तथा श्री मोहन लाल वर्मा के साथ मिलकर अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज की स्थापना की थी और इसकी संबद्धता आगरा विश्वविद्यालय के साथ प्राप्त की। इस त्रिमूर्ति ने अपने अथक प्रयासों से कॉलेज के लिए जमीन तथा वित्तीय संसाधन जुटाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि माऊँ के लोगों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु बाहर न जाना पड़े। बाद में यह कॉलेज 1972 में सरकार द्वारा ग्रहण कर लिया गया तथा 1973 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद इसका एक संघटक महाविद्यालय बना। समय की गति के साथ इसका नाम, इसके प्रेरणास्रोत के सम्मान में सोबन सिंह जीना परिसर रखा गया।कुमाऊँ में एक नए विश्वविद्यालय के सृजन की बढ़ती मांग के दृष्टिगत राज्य सरकार ने सोबन सिंह जीना, परिसर को उच्चीकृत कर, इसे अब सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय का उपयुक्त नाम देकर पिथौरागढ़ तथा बागेश्वर के राजकीय महाविद्यालयों को इसका परिसर बना दिया है।इस धरती के इस महान लाल का 1989 में स्वर्गवास हुआ। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक सेठ गोडिन का कथन है , ‘नेतृत्व वह कला है जो लोगों को विचारों को कार्यरूप देने का मंच प्रदान करती है।’ सोबन सिंह जीना ने इस उक्ति को सजीव रूप में चरितार्थ किया। चार अगस्त 1909 को सुनौली (ताकुला ब्लॉक) में जन्मे सोबन सिंह जीना की प्राथमिक शिक्षा पैतृक गांव में ही हुई। 1926 में हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में पास कर जीआइसी अल्मोड़ा में दाखिला लिए। 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद इलाहाबाद से स्नातक फिर कानून की पढ़ाई पूरी किए। पहाड़ से लगाव ही था कि अल्मोड़ा लौट आए। यहां वकालत करने लगे। 1936 से 1948 तक जिला परिषद सदस्य चुने गए। जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में शुमार पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री (उत्तर प्रदेश सरकार में) स्व. सोबन सिंह जीना महज राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि कुशल वक्ता, कूटनीतिज्ञ, कानूनविद के साथ पर्वतीय विकास के पैरोकार भी रहे। खास बात कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी होने के बावजूद बड़ी राजनीति के लिए पहाड़ का मोह नहीं छोड़ा। गुलामी के दौर में जिला परिषद के सदस्य चुने जाने पर सबसे पहले पर्वतीय क्षेत्रों में विद्यालय स्थापित कराए ताकि बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके 1977 में पहली बार बारामंडल क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए विधायक चुने गए स्व. सोबन सिंह जीना ने आपातकाल का दौर भी झेला था। अटल जी जब भी कटु अनुभव भुलाने के बहाने पहाड़ की यात्रा पर अल्मोड़ा पहुंचे तो जीना से जरूर मिले। तब सोबन सिंह ने अटल जी के सामने अविकसित पहाड़ की तस्वीर बदलने की इच्छा जाहिर की। पिता व अन्य बुजुर्गों के हवाले से संस्मरण सुनाते हुए स्व. जीना के पोते बताते हैं कि अटल जी तब आवास पर कई दिन ठहरे थे। सोबन सिंह के पहाड़ के प्रति लगाव के मद्देनजर भोजन के दौरान अटल जी ने पहाड़ की चुनौतियों पर एक काव्य रचना भी की। पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री स्व. सोबन सिंह जीना ने समाज में एक प्रेरक के रूप में कार्य किया है। जिन्होंने सदैव हर वर्ग व राजनैतिक दलों के लोगों को सम्मान की दृष्टि से देखा और विकास के साथ ही शिक्षा और समाज के उन्नयन में उल्लेखनीय योगदान दिया। स्व. जीना को विराट व्यक्तित्व बताते हुए उन्होंने कहा कि वे हमेशा समाज के लिए समर्पित रहे। स्व. जीना उन ऐसे मंत्री रहे, जिन्होंने मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों की तुलना में सबसे अधिक दौरे किए लेकिन उनके दौरों का खर्चा सबसे कम था, मगर आज दौरा कम व खर्च अधिक हो रहा है, जो विडंबना है। ने अलग उत्तराखंड राज्य के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को मनाने में स्व. जीना ने अहम् भूमिका निभाई। उन्होंने इस बात को प्रमुखता से रखा था कि उत्तराखंड की राजधानी चौखुटिया से गैरसैण के मध्य होनी चाहिए और तब सभी राजनैतिक दलों ने स्व. जीना की इस बात का समर्थन भी किया था। उन्होंने कहा कि स्व. जीना की मंशा के अनुसार राज्य की राजधानी बनाये जाने के संबंध में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी एवं रमेश पोखरियाल निशंक से भी वार्ता की थी, लेकिन आज तक चौखुटिया से गैरसैण के मध्य राजधानी नहीं बन पा रही है। उन्होंने कहा कि स्व. जीना को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनका यह सपना साकार होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी जनहित के मुद्दे को किसी भी राजनैतिक दल द्वारा राजनीति के चश्मे से नहीं बल्कि जनभावना के अनुसार देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्व. जीना की प्रखरता के कई उदाहरण भी प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि स्व. जीना उच्च कोटि के अधिवक्ता के साथ ही राजनीतिज्ञ, पत्रकार एवं प्रखर वक्ता भी थे। जिसके कारण उन्होंने पहाड़ के विकास के लिए अनेक कार्य किए। उन्होंने वन संरक्षण अधिनियम 1980 तथा बिंसर वन्य जीव विहार की पुरजोर खिलाफत भी की थी स्व. सोबन सिंह जीना के प्रयासों से ही आज अल्मोड़ा में ​विश्वविद्यालय का रुप देखने को मिला है। पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री स्व. सोबन सिंह जीना का पैतृक गांव सुनौली बुनियादी सुविधाओं से महरूम है। सुनौली गांव में शिक्षा व्यवस्था बदहाल है। हालात यह हैं कि उच्चीकरण के 10 दस साल बाद भी इंटर कॉलेज के लिए भवन नहीं बना और जूनियर हाईस्कूल के भवन में इंटर की कक्षाएं संचालित हो रही हैं। जर्जर हो चुके भवन मं विद्यार्थी पढ़ने के लिए मजबूर हैं। पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री स्व. सोबन सिंह जीना की जयंती को राजकीय कार्यक्रम घोषित करने की दो-दो मुख्यमंत्रियों ने घोषणा की थी, जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ है। पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री स्व. सोबन सिंह जीना का पैतृक गांव सुनौली आज भी विकास को तरस रहा है। उनके गांव को जोड़ने वाली बसौली-सुनौली सड़क बदहाल है और लोग जान हथेली पर लेकर सफर करने को मजबूर हैं। सोबन सिंह जीना के पैतृक गांव में समस्याओं का अंबार, सांसद भी गोद लेने के बाद भूले! कुमाऊं में स्वर्गीय सोबन सिंह जीना का नाम सबसे बड़ी हस्तियों में गिना जाता है. जीना बीजेपी के संस्थापक सदस्य भी रहे, लेकिन विडंबना ये है कि उनके पैतृक गांव सुनौली में समस्याओं का अंबार लगा है. इतना ही नहीं सुनौली गांव को सांसद आदर्श गांव के रूप में भी गोद लिया गया. इसके बावजूद भी न तो सूरत बदली न ही सीरत. यही वजह है कि आज विभिन्न संगठनों को धरना देना पड़ रहा है.जीना के गांव को विकास की दरकार हैंकर्मयोगी सोबन सिंह जीना द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए कार्य अविस्मरणीय हैं। वे एक महान जननेता के रूप में सदैव जनता से जुड़े रहे। पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री स्व. सोबन सिंह जीना की जयंती पर शत्-शत् नमन। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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